बृहन्नारदीय पुराण (संस्कृत मूल व हिन्दी व्याख्या)
Brihan Naradiya Purana with Sanskrit & Hindi Commentary
महर्षि व्यास द्वारा
स्रोत: चौखम्बा संस्कृत संस्थान · चौखम्बा संस्कृत संस्थान (उद्गम)
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संदर्भ में पढ़ें६२२ नारदीयपुराणम् आवाहनादिभिः सर्वैरुपचारैः समर्चनम्। एकाग्रमानसो भूत्वा ध्यायेत्सिद्धिविनायकम् ॥२८॥ एकदंतं शूर्पकर्ण गजवक्त्रं चतुर्भुजम्। पाशांकुशधरं देवं तप्तकांचनसंन्निभम् ॥२९॥ एकविंशति पत्राणि चैकविंशतिनामभिः। समर्पयेद्भक्तियुक्तस्तानि नामानि मे शृणु ॥३०॥ सुमुखाय शमीपत्रं गणाधीशाय भृंगजम्। उमापुत्राय बेल्वं तु दूर्वा गनमुखाय च ॥३१॥ लंबोदराय बदरीं धत्तूरं हरसूनवे। शूर्पकर्णाय तुलसीं वक्रतुंडाय शिबिजम् ॥३२॥ गुहप्रजायापामार्गमेकदंताय बाहंतम्। हेरम्बाय तु सिंदूरम् चतुर्हत्रे च पत्रजम् ॥३३॥ सर्वेश्वरायागस्त्यस्य पत्रं प्रीतिविवर्द्धनम्। दूर्वायुग्मं ततो गृह्य गंधपुष्पाक्षतैर्युतम् ॥३४॥ पूजां निवेदयेद्भक्तियुक्तो मोदकपंचकम्। आचम्यञ्च नमस्कृत्य संप्राथ्यै च विसर्जयेत् ॥३५॥ विनायकस्य प्रतिमां हैमीं सोपस्करं मुने। निवेदयेच्च गुरवे द्विजेभ्यो दक्षिणां वदेत् ॥३६॥ एवं कृताचंनो भूत्वा पंच वर्षाणि नारद। उपास्य लभते कावानेहिकामुष्मिकान् शुभान् ॥३७॥ अस्यां चतुर्थ्यां शशिनं न पश्येच्च कदाचन। पश्यन् मिथ्याभिशापं तु लभते नात्र संशयः अथ तद्दोषनाशाय मन्त्रं पौराणिकं पठेत्। ॥३८॥ "सिंहः प्रसेनमवधीत्सिंहो जांबवता हतः। सुकुमारक मा रोदोस्तव ह्येष स्यमंतकः ॥३९॥ इषशुक्लचतुर्थ्यां तु कपर्दीशं विनायकम्। ॥४०॥ पौरुषेण तु सूक्तेन पूजयेदुपचारकैः। अकारणान्मुष्टिगतांस्तं डुलात्सकपदिकान् ॥४१॥ विप्राय बटवे दद्याद्गंधपुष्पार्चिताय च। तंडुला वैश्वदेवस्य हरदेवस्यमिश्रिताः ॥४२॥ कपर्दिगणनाथोऽसौ प्रीयतां तैः समर्पितैः। चतुर्थ्यां कार्तिके कृष्णे करवाख्यं व्रतं स्मृतम् ॥४३॥ से सिद्धिविनायक का इस प्रकार ध्यान करे—"उनके एक दांत है, सूप के समान कान हैं, गज का मुख है, चार भुजायें हैं, हाथों में पाश एवम् अंकुश सुशोभित हैं, शरीर की कान्ति तप्त सुवर्ण के सदृश है ॥२६-२९॥” पश्चात् इक्कीस नामों से इक्कीस पत्र उन्हें भक्तिपूर्वक समर्पित करे। उन नामों को सुन लो। सुमुख को शमीपत्र, गणाधीश को भृंगपत्र, उमापुत्र को बिल्वपत्र, गजमुख को दूर्वा, लम्बोदर को बेर का पत्र हरसूनु को धतूर का पत्र, शूर्पकर्ण को तुलसीपत्र, वक्रतुंड को शिविपत्र, कार्तिकेयाग्रज को अपामार्ग, एकदन्त को जामुन का पत्र, हेरंब को सिंधुवार का पत्र, चतुर्हता को तेजपात और सर्वेश्वर को अगस्त्यपत्र प्रिय हैं ॥३०-३३॥ तदुपरांत दो दूर्वाओं को लेकर गन्ध, पुष्प, अक्षत से गणेश का पूजन कर भक्ति से उन्हें पांच लड्डू चढ़ाये। फिर आचमन कर उन्हें नमस्कार तथा प्रार्थना करके विसर्जित करे। मुने! विनायक की सौवर्णी प्रतिमा उपकरण सहित गुरु को समर्पित कर द्विजों को दक्षिणा दे ॥३४-३६॥ नारद ! पांच वर्षों तक भक्तिपूर्वक इस व्रत की आराधना करने से मनुष्य ऐहलोकिक एवम् पारलोकिक समस्त सुखों को प्राप्त करता है ॥३७॥ भाद्र-शुक्ल- चतुर्थी को कभी भी चन्द्र दर्शन नहीं करना चाहिये। वैसा करने से निःसंदेह मिथ्या अभिशाप लगता है। इसलिये उसके दोष को दूर करने के लिये “सिंह, ....................स्यमंतकः” इस पौराणिक मन्त्र को पढ़ना चाहिये। आश्विन-शुक्ल की चतुर्थी में पुरुष सूक्त से कपर्दीश विनायक की स्तुति कर उनका सोपचार पूजन करे। पश्चात् “तंडुलः........समर्पितैः” यह मन्त्र पढ़कर गन्ध, पुष्प आदि से पूजित विप्रबटु को योंही एक मुट्ठी चावल तथा कौड़ी दे ॥३८-४२३॥ कार्तिक-कृष्ण-चतुर्थी में करक व्रत किया जाता है, स्त्रियों को ही यह व्रत करने का अधिकार है। इसका