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भारतकोश
बृहन्नारदीय पुराण (संस्कृत मूल व हिन्दी व्याख्या)

बृहन्नारदीय पुराण (संस्कृत मूल व हिन्दी व्याख्या)

Brihan Naradiya Purana with Sanskrit & Hindi Commentary

महर्षि व्यास द्वारा

स्रोत: चौखम्बा संस्कृत संस्थान · चौखम्बा संस्कृत संस्थान (उद्गम)

DevanagariSanskritpublished1,008 पृष्ठ

पृष्ठ 942, कुल 1008 में से

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पृष्ठ 942

त्रयोदशाधिकशततमोऽध्यायः ६२३-

स्त्रीणामेवाधिकारोऽत्र तद्विधानमुदीर्यते । पूजयेच्च गणाधीशं स्नाता स्त्री समलंकृता ॥४४॥ तदग्रे पूर्णपक्वान्नं विन्यसेत्करकान्दश । समर्प्य देवदेवाय भक्त्या प्रयतमानसा ॥४५॥ देवो मे प्रीयतामेवमुच्चार्याथ समर्पयेत् । सुवासिनीभ्यो विप्रेभ्यो यथाकामं च सादरम् ॥४६॥ ततश्चंद्रोदये रात्रौ दत्त्वार्धं विधिपूर्वकम् । भुञ्जीत मिष्टमन्नं च व्रतस्य परिपूर्तये ॥४७॥ यद्वा क्षीरेण करकं पूर्णं तोयेन वा मुने । सपूगाक्षतरत्नाढ्यं द्विजाय प्रतिपादयेत् ॥४८॥ एतत्कृत्वा व्रतं नारी षोडशद्वादशाब्दकम् । उद्यापनं विधायाथ व्रतमेतद्विसर्जयेत् ॥४६॥ यावज्जीवं तु वा नार्या कार्यं सौभाग्यवांछया । व्रतेनानेन सदृशं स्त्रीणां सौभाग्यदायकम् ॥५०॥ विद्यते भुवनेष्वन्यत्तस्मान्नित्यमिति स्थितिः । ऊर्जशुक्लचतुर्थ्यां तु नागव्रतमुदाहृतम् ॥५१॥ प्रातर्व्रतं तु संकल्प्य धेनुशृंगजलं शुचि । पीत्वास्नात्वाय मध्याह्ने शंखपालादिपन्नगान् ॥५२॥ शेषं चाह्वानपूर्वैस्तु पूजयेदुपचारकैः । क्षीरेणाप्यायनं कुर्यादितन्नागव्रतं स्मृतम् ॥५३॥ एवंकृते तु विप्रेन्द्र नृभिर्नागव्रते शुभे । विषाणि नश्यंत्यचिरात्न दशंति च पन्नगाः ॥५४॥ मार्गशुक्लचतुर्थ्यां तु वर्षं यावन्मुनीश्वर । क्षपयेदेकभक्तेन नक्तैनाथ द्वितीयकम् ॥५५॥ अयाचितोपवासाभ्यां तृतीयकचतुर्थके । एवं क्रमेण विधिवच्चत्वार्यब्दानि मानवः ॥५६॥ समाप्य च ततोऽस्यांते व्रतस्नातो महाव्रती । कारयेद्धेमघटितं शूणैमूषकं रथम् ॥५७॥ अशक्तो वर्णकेनैव शुभ्रं चाब्जं सुपत्त्रकम् । तस्योपरि घटं स्थाप्य ताम्रपात्रेण संयुतम् ॥५८॥ रयेत्तंडुलैः शुभ्रैस्तस्योपरि गणेश्वरम् । न्यसेद्वस्त्रयुगाच्छन्नं गंधाद्यैः पूजयेच्च तम् ॥५६॥

विधान बता देता हूँ । उस दिन नारी स्नान कर अलंकृत हो गणाधीश की पूजा करे । उसके आगे पर्याप्त पक्व- वान्न तथा दस कमंडलु रखकर 'देवो में प्रीयताम्' यह कहते हुए समर्पित करे । अनन्तर वे सब चीजें सौभाग्यवती महिलाओं एवम् विप्रों में बाँट दे । फिर रात्रि में चन्द्रोदय होने पर विधिपूर्वक अर्घ्य देकर व्रत पूर्ति के लिए मिष्टान्न भोजन करे ॥४३-४७॥ मुने ! अथवा दूध या जल से परिपूर्ण कमंडलु, पूगीफल, अक्षत तथा रत्न ब्राह्मण को दे दे । यह व्रत सोलह या बारह वर्षों तक करना चाहिये । अन्त में उद्यापन करके विसर्जन करे । अथवा सौभाग्य को इच्छुक वनिता आजीवन इस व्रत को करती रहे । नारियों के लिए ऐसा सौभाग्यदायक व्रत तीनों लोक में कोई नहीं है ॥४८-५०॥ कार्तिक-शुक्ल-चतुर्थी में नागव्रत किया जाता है । उस दिन प्रातःकाल ही व्रत का संकल्प कर गाय के सींग से स्पृष्ट जल का पान करे और मध्याह्न में स्नानोत्तर शंखपाल आदि नागों का आवाहन कर सोपचार पूजन करे । उस दिन दूध से नागों को परितृप्त करना चाहिये । यही नागव्रत है । विप्रेन्द्र ! इस कल्याणकारक नागव्रत के करने से विष शीघ्र नष्ट हो जाता है और सांप कभी नहीं काटता । मुनीश्वर ! अगहन-शुक्ल-चतुर्थी से प्रारम्भ कर वर्ष पर्यन्त एक ही बार भोजन करे । भोजन अयाचित अन्न का बना हुआ करना चाहिये और वह भी दिन में ही (रात्रि में नहीं) इस क्रम से चार वर्षों तक विधिवत् व्रत का संपादन कर अन्त में महाव्रती मानव स्नान करके गणेश के लिये सुवर्ण का रथ एवम् चूहा बनवाये ॥५१-५७॥ यदि सोने का न बनवा सके तो हरिताल या चन्दन आदि काष्ठों का बनवा सकता है । व्रती श्वेत-कमल के ऊपर ताम्रपात्रयुक्त घट को स्थापित कर उसे स्वच्छ चावल से भर दे । उसके ऊपर गणेश्वर की प्रतिष्ठा कर-