बृहन्नारदीय पुराण (संस्कृत मूल व हिन्दी व्याख्या)
Brihan Naradiya Purana with Sanskrit & Hindi Commentary
महर्षि व्यास द्वारा
स्रोत: चौखम्बा संस्कृत संस्थान · चौखम्बा संस्कृत संस्थान (उद्गम)
पृष्ठ 943, कुल 1008 में से
संदर्भ में पढ़ें६२४ नारदीयपुराणम् नैवेद्यं मोदकं कल्प्यं गणेशः प्रीयतामिति । जागरैर्गीतवाद्याद्यैः पुराणाख्यानकैश्ररेत् ॥६०॥ प्रभाते विमले स्नात्वा होमं कृत्वा विधानतः । तिलव्रीहियवश्वेतसर्षपाज्यैः सखंडकैः ॥६१॥ गणो गणाधिपश्चैव कूष्मांडस्त्रिपुरांतकः । लंबोदरैकदंतो च रुक्मदंष्ट्रश्च विघ्नपः ॥६२॥ ब्रह्मा यमोऽथ वरुणः सोमसूर्यहुताशनाः । गन्धमादी परमेष्ठीत्येवं षोडशनामभिः ॥६३॥ प्रणवाद्यैर्नमोंऽतैः प्रत्येकं वह्नने हुनेत् । वक्रतुंडेति हृत्तेन वर्मानेनाष्टयुक्छतम् ॥६४॥ ततो व्याहृतिभिः शक्त्या हुत्वा पूर्णाहुतिं चरेत् । दिक्पालान्पूजयित्वा च ब्राह्मणान्भोजयेत्ततः ॥६५॥ चतुर्विंशतिसंख्याकान् मोदकैः पायसैस्तथा । सवत्सां गां ततो दद्यादाचार्याय सदक्षिणाम् ॥६६॥ अन्येभ्योऽपि यथाशक्ति भूयसीं च ततो ददेत् । प्रणम्य दक्षिणीकृत्य प्रविसृज्य द्विजोत्तमान् ॥६७॥ बन्धुभिः सह भुञ्जीत स्वयं च प्रीतमानसः । एतद्व्रतं नरः कृत्वा भुक्त्वा भोगानिहोत्तमान् ॥६८॥ सायुज्यं लभते विष्णोर्गणेशस्य प्रसादतः । केचिद्वरव्रतं नाम प्राहुरेत्तस्य नारद ॥६९॥ विधानेने तदेवापि फलं चापीह तत्समम् । पौषमासचतुर्थ्यां तु विघ्नेशं प्रार्थ्य भक्तितः ॥७०॥ विप्रैकं भोजयेच्छ्रैवं मोदकैर्दक्षिणां ददेत् । एवं कृते मुने भूयाद्व्रती संपत्तिभाजनम् ॥७१॥ माघकृष्णचतुर्थ्यां तु संकटव्रतमुच्यते । तत्रोपवासं संकल्प्य व्रती नियमपूर्वकम् ॥७२॥ चंद्रोदयमभिव्याप्य तिष्ठेत्प्रयतमानसः । ततश्चंद्रोदये प्राप्ते मृण्मयं गणनायकम् ॥७३॥ विधाय विन्यसेत्पीठे सायुधं च सवाहनम् । उपचारैः षोडशभिः समभ्यर्च्य विधानतः ॥७४॥ मोदकं चापि नैवेद्यं सगुडं तिलकुट्टकम् । ततोऽर्घ्यं ताम्रजे पात्रे रक्तचंदनमिश्रितम् ॥७५॥
एक जोड़ा वस्त्र, गन्ध, पुष्प आदि से उनका पूजन करे ॥५८-५९॥ "गणेशः प्रीयताम्" यह कहकर उन्हें लड्डू चढ़ाये । गीत-वाद्य, कथा-पुराण आदि से उत्सव मनाते हुए रात्रि में जागरण करे । प्रातःकाल स्नान कर तिल, व्रीहि, यव, श्वेत सरसों तथा घी से विधिवूवर्क हवन करे । गण, गणाधिप, कूष्मांड, त्रिपु तंक, लम्बोदर, एकदन्त, रुक्मदंष्ट्र, विघ्नप, ब्रह्मा, यम, वरुण, सोम, सूर्य, हुताशन, गन्धमादी और परमेष्ठी इन सोलहों नामों से आहुतियां देनी चाहिए । "प्रणवाद्यैर्दे नमः..........." इस मन्त्र से एक सौ आठ बार हवन कर व्याहृतियों से यथाशक्ति होम करे ॥६०-६४३॥ पश्चात् पूर्णाहुति देकर दिक्पालों का पूजन कर चौबीस ब्राह्मणों को खीर तथा लड्डू खिलाये। तदनन्तर आचार्य को दक्षिणा सहित सवत्सा गो देकर अन्य ब्राह्मणों को भी यथाशक्ति भूयसी दे । फिर विप्रों को प्रदक्षिणा कर उन्हें प्रणाम करके विदा करे । पश्चात् प्रसन्न मन से भाई- बन्धुओं के साथ स्वयं भोजन करे । इस व्रत को करने वाला मानव ऐहलौकिक उत्तम भोगों को भोग कर गणेश की कृपा से विष्णुसायुज्य मोक्ष को प्राप्त करता है । नारद ! कोई इस व्रत को 'वरव्रत' कहते हैं ॥६५-६६॥ उसका भी विधान एवम् फल यही है । पौष मास की चतुर्थी में भक्तिपूर्वक विघ्नेश की प्रार्थना कर एक विप्र को लड्डू खिलाये तथा दक्षिणा दे । मुने ! ऐसा करने से व्रती संपत्तिशाली होता है । माघ-कृष्ण-चतुर्थी में संकटव्रत किया जाता है । उस दिन व्रती नियमपूर्वक शुद्ध मन से उपवास करते हुए चन्द्रोदय के उपरान्त- मृत्तिका के गणेश को आयुध एवम् वाहन सहित आसन पर अवस्थित कर विधि से षोडशोपचार पूजन करे ॥७०- ७४॥ उन्हें मोदक तथा तिल का लड्डू नैवेद्य चढ़ाये । तदनन्तर तांबे के पात्र में रक्तचन्दन, दूर्वा, पुष्प, अक्षत,