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भारतकोश
बृहन्नारदीय पुराण (संस्कृत मूल व हिन्दी व्याख्या)

बृहन्नारदीय पुराण (संस्कृत मूल व हिन्दी व्याख्या)

Brihan Naradiya Purana with Sanskrit & Hindi Commentary

महर्षि व्यास द्वारा

स्रोत: चौखम्बा संस्कृत संस्थान · चौखम्बा संस्कृत संस्थान (उद्गम)

DevanagariSanskritpublished1,008 पृष्ठ

पृष्ठ 944, कुल 1008 में से

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पृष्ठ 944

त्रयोदशाधिकशततमोऽध्यायः ६२५

सकुशं च सदूर्वं च पुङ्पाक्षतसमन्वितम् । सशमीपलदधि च कृत्वा चंद्राय दापयेत् ॥७६॥ गगनार्णवमाणिक्यं चंद्र दाक्षायणीपते । गृहाणार्घ्यं मया दत्तं गणेशप्रतिरूपक ॥७७॥ एवं दत्त्वा गणेशाय दिव्यार्घ्यं पापनाशनम् । शक्त्या संभोज्य विप्राग्र्यान्स्वयं भुञ्जीत चाज्ञया ॥७८॥ एवं कृत्वा व्रतं विप्र संकष्टाख्यं शुभावहम् । समृद्धो धनधान्यैः स्यान्न च संकटमाप्नुयात् ॥७९॥ माघशुक्लचतुर्थ्या तु गौरीव्रतमनुत्तमम् । तस्यां तु गौरी संपूज्या संयुक्ता योगिनीगणैः ॥८०॥ नरैः स्त्रीभिविशेषेण कुन्दपुष्पैः सकुंकुमैः । रक्तसूत्रे रक्तपुष्पैस्तथैदालक्तकेन च ॥८१॥ धूपैर्दीपैश्च बलिभिः सगुडेनाईकेण च । पयसा पायसेनापि लवणेन च पालकः ॥८२॥ पूज्याश्चाविधवा नार्यस्तथा विप्राः सुशोभनाः । सौभाग्यवृद्धये देयो भोक्तव्यं बंधुभिः सह ॥८३॥ इदं गौरीव्रतं विप्र सौभाग्यारोग्यवर्धनम् । प्रतिवर्षं प्रकर्त्तव्यं नारीभिश्च नरैस्तथा ॥८४॥ ढुंढि व्रतं परैः प्रोक्तं कैश्चित्कुण्डव्रतं स्मृतम् । ललिताव्रतमित्यन्यैः शांतिव्रतमथापरैः ॥८५॥ स्नानं दानं जपो होमः सर्वमस्यां कृतं मुने । भवेत्सहस्रगुणितं प्रसादाद्दंतिनः सदा ॥८६॥ चतुर्थ्यां फाल्गुने मासि ढुंढिराजव्रतं शुभम् । तिलपिष्टैर्द्विजान् भोज्य स्वयं चाश्नीत मानवः ॥८७॥ गणेशाराधनपरो दानहोमजपपूजनैः । तिलैरेवकृतैः सिद्धि प्राप्नुयात्तत्प्रसादतः ॥८८॥ सौवर्णं गजवक्त्रं च कृत्वा संपूज्य यत्नतः । द्विजाग्र्याय प्रदातव्यं सर्वसंपत्समृद्धये ॥८६॥ यस्मिन्कस्मिन्भवेन्मासि चतुर्थी रविवारयुक् । सांगारका वा विप्रेन्द्र सा विशेषफलप्रदा ॥६०॥

शमीपत्र तथा दधि डाल कर “गगनार्णवमाणिक्य !.........” इस मन्त्र को पढ़ते हुए कुश से अध्यदान करे ॥७५-७७॥ इस प्रकार गणेश को पापनाशी दिव्य अर्घ्य देकर यथाशक्ति उत्तम ब्राह्मणों को भोजन कराकर उनकी आज्ञा से स्वयं भोजन करे । विप्र ! जो व्यक्ति इस कल्याणकारक सकष्ट नामक व्रत को करता है, वह धनधान्य से सम्पन्न होता है, विपत्ति में वह कभी नहीं पड़ता । माघशुक्ल-चतुर्थी में अत्युत्तम गौरीव्रत करना चाहिये । उस दिन नर और विशेष करके नारी कुन्दपुष्प, कुंकुम, रक्तसूत्र, रक्तपुष्प, अलता, धूप, दीप, बलि, गुड, अदरक, दूध, खीर, लवण, तथा पालक से योगिनीगण समेत गोरी की पूजा करे। सौभाग्यवृद्धि के लिये सधवा नारियों एवम् उत्तम ब्राह्मणों की भी पूजा करक इष्ट-मित्रों के साथ भोजन करे ॥७८-८३॥ द्विज ! यह गौरीव्रत सौभाग्य तथा आरोग्य को बढ़ाने वाला है । नर-नारियों को प्रतिवर्ष यह व्रत करना चाहिए । कोई कहते हैं कि उस दिन ढुंढिव्रत करना अच्छा है तो कोई कहते हैं कुंडव्रत ! किन्हीं के मत में ललिता व्रत अच्छा है तो कोई शान्तिव्रत को ही अच्छा समझते हैं ॥८४-८५॥ उस दिन स्नान, दान, जप तथा होम जो कुछ किया जाता है, उसका सहस्रगुण अधिक फल मिलता, है यह गणपति की कृपा है। फाल्गुन की चतुर्थी में शुभदायक ढुंढिराजव्रत करना चाहिए। उस दिन मानव ब्राह्मणों का तिल के लड्डू खिलाकर स्वयं भी वही खायें । दान, होम, पूजन आदि से गणेश की आराधन। में निरत होकर तिल से ही सब कर्म करे। ऐसा करने से विघ्नेश की कृपा से सिद्धि प्राप्ति हो जाती है ॥८६-८८॥ यत्नपूर्वक गजनायक की सुवर्णमयी प्रतिमा बनाकर पूजन करे और सकल संपत्ति की प्राप्ति के लिए वह प्रति ब्राह्मणो को दे दे । विप्र ! जिस किसी मास में यदि चतुर्थी तिथि रविवार या मंगलवार से युक्त हो तो वह विशेष फल को देती है। समस्त चतुर्थियों में, चाहे शुक्ल