सामग्री पर जाएँ
भारतकोश
बृहन्नारदीय पुराण (संस्कृत मूल व हिन्दी व्याख्या)

बृहन्नारदीय पुराण (संस्कृत मूल व हिन्दी व्याख्या)

Brihan Naradiya Purana with Sanskrit & Hindi Commentary

महर्षि व्यास द्वारा

स्रोत: चौखम्बा संस्कृत संस्थान · चौखम्बा संस्कृत संस्थान (उद्गम)

DevanagariSanskritpublished1,008 पृष्ठ

पृष्ठ 945, कुल 1008 में से

संदर्भ में पढ़ें
पृष्ठ 945

६२६ नारदीयपुराणम् सर्वासु च चतुर्थीषु शुक्लास्त्वथसितासु च । विघ्नेश एव देवेशः संपूज्यो भक्तितत्परैः ॥९१॥ इति श्रीबृहन्नारदीयपुराणे पूर्वभागे बृहदुपाख्याने चतुर्थपादे द्वादशमासचतुर्थीव्रत निरूपणं नाम त्रयोदशाधिकशततमोऽध्यायः ॥११३॥ चतुर्दशाधिकशततमोऽध्यायः सनातन उवाच शृणु विप्र प्रवक्ष्यामि पंचम्यास्ते व्रतान्यहम् । यानि भक्त्या समास्थाय सर्वान्कामानवाप्नुयात् ॥१॥ प्रोक्ता मत्स्यजयंती तु पंचमी मधुशुक्लगा । अस्यां मत्स्यावतारार्चा भक्तैः कार्यों महोत्सवः ॥२॥ श्रीपंचमीति चैवोक्ता तत्र कार्यं श्रियोऽर्चनम् । गंधाद्यैरुपचारैस्तु नैवेद्यैः पायसादिभिः ॥३॥ यो लक्ष्मीं पूजयेच्चात्र तं वै लक्ष्मीर्न मुञ्चति । पृथ्वीव्रतं तथा चांद्रं हयग्रीवव्रतं तथा ॥४॥ कार्यं तत्तद्विधानेन तत्सिद्धिमभीप्सुभिः । अथ वैशाखपंचम्यां शेषं चाभ्यर्च्य मानवः ॥५॥ सर्वैर्नागगणैर्युक्तमभीष्टं लभते फलम् । तथा ज्येष्ठस्य पंचम्यां पितॄनभ्यर्चयेत्सुधीः ॥६॥ _____________________________________________________________________: पक्ष की हो या कृष्ण पक्ष की, भक्तिपरायण मनुष्य विघ्नेश की ही अर्चना करे ॥८६-९१॥ श्री नारदीयपुराण के पूर्वार्ध में बृहदुपाख्यानयुक्त चतुर्थपाद में बारह मासों की चतुर्थी तिथि का व्रत निरूपण नामक एक सौ तेरहवाँ अध्याय समाप्त ॥११३॥ अध्याय ११४ बारह मासों का पंचमी-व्रत । सनातन बोले--विप्र ! सुनो, अब मैं पञ्चमी तिथि के व्रतों को बताता हूँ, जिनकी भक्तिपूर्वक आराधना करने से सकल कामनाओं की प्राप्ति होती है । चैत्र-शुक्ल-पञ्चमी में मत्स्यजयन्तीव्रत करना चाहिए । उस तिथि को भक्त लोग भगवान् के मत्स्यावतार का पूजन एवं महोत्सव करें ॥१-२॥ उस तिथि का नाम श्रीपंचमी है । उसमें गंध आदि उपचार तथा पायस आदि के नैवेद्य से श्री की अर्चना करनी चाहिए । (उस दिन) जो लक्ष्मी की अर्चना करता है, उसे लक्ष्मी कभी भी नहीं छोड़ती । सिद्धि के इच्छुक व्यक्ति उस तिथि में पृथ्वीव्रत, चांद्व्रत हयग्रीवव्रत को विधिपूर्वक संपन्न करे । वैशाख की पञ्चमी में समस्त नागगणों से युक्त अनन्तशेष की अर्चना करने से मानव को अभीष्ट-सिद्धि होती है । ज्येष्ठ की पञ्चमी में जो विद्वान् पितरों का पूजन करके ब्राह्मण भोजन कराता है उसकी समस्त अभिलाषायें पूर्ण होती हैं ॥३-६½॥ मुने ! आषाढ़ की पञ्चमी में