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भारतकोश
बृहन्नारदीय पुराण (संस्कृत मूल व हिन्दी व्याख्या)

बृहन्नारदीय पुराण (संस्कृत मूल व हिन्दी व्याख्या)

Brihan Naradiya Purana with Sanskrit & Hindi Commentary

महर्षि व्यास द्वारा

स्रोत: चौखम्बा संस्कृत संस्थान · चौखम्बा संस्कृत संस्थान (उद्गम)

DevanagariSanskritpublished1,008 पृष्ठ

पृष्ठ 946, कुल 1008 में से

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पृष्ठ 946

सर्वकामफलावाप्तिर्भवेद्वै विप्रभोजनैः । अथवाषाढस्य पंचम्यां वायुं सर्वगतं नुने ॥७॥ ग्रामाद्बहिर्विनिर्गत्य धरोवस्थे समास्थितः । ध्वजं च पंचवर्णं तु वंशदंडाप्रसंस्थितम् ॥८॥ समुच्छ्रितं निदध्यात् कल्पिताब्जे तु मध्यतः । ततस्तन्मूलदेशे तु दिक्षु सर्वासु नारद ॥६॥ लोकपालान्समभ्यर्च्य कुर्याद्वायुपरीक्षणम् । प्रथमादिषु यामेषु यो यो वायुःप्रवर्तते ॥१०॥ तस्मै तस्मै दिगीशाय पूजां सम्यक् प्रकल्पयेत् । एवं स्थित्वा निराहारस्तत्र यामचतुष्टयम् ॥११॥ सायमागत्य गेहं स्वं भुक्त्वा स्वल्पं समाहितः । लोकपालान्नमस्कार्य स्वप्याद्भूतले शुचौ ॥१२॥ यः स्वप्नो जायते तस्यां रात्रौ यामे चतुर्थके । स एव भविता नूनं स्वप्न इत्याह वै शिवः ॥१३॥ अशुभे तु समुत्पन्ने शिवपूजापरायणः । सोपवासो नयेदष्टयामं तद्दिनमेव वा ॥१४॥ भोजयित्वा द्विजानष्टौ ततः शुभफलं लभेत् । व्रतमेतत्समुदितं शुभाशुभनिदर्शनम् ॥१५॥ नृणां सौभाग्यजनकमिह लोके परत्र च । श्रावणे कृष्णपंचम्यां व्रतं ह्यन्नसमृद्धिवम् ॥१६॥ चतुर्थ्यां दिनशेषे तु सर्वाण्यन्नानि नारद । पृथक् पात्रेषु संस्थाप्य जलैराप्लावयेत्सुधीः ॥१७॥ ततो पात्रांतरे तत्तु निष्कास्यांबु निधापयेत् । प्रातर्भानौ समुदिते पितृश्चैव तथा ऋषीन् ॥१८॥ देवांश्चाभ्यर्च्य सुस्नातं कृत्वा नैवेद्यमग्रतः । तदन्नं याचकेभ्यस्तु प्रयच्छेत्प्रीतमानसः ॥१९॥ सर्वं दिनं क्षिपेदेवं प्रदोषे तु शिवालय । गत्वा संपूजयेद्देवं लिंगरूपिनमीश्वरम् ॥२०॥ गंधपुष्पादिभिः सम्यक्पूजयित्वा महेश्वरम् । जपेत्पञ्चाक्षरी विद्यां शतं चापि सहस्त्रकम् ॥२१॥ जपं निवेद्य देवाय भवाय भवरूपिणे । स्तुत्वा सर्वैवैदिकैश्च पौराणिकैश्चाप्यनाकुलः ॥२२॥

सर्वगामी वायु का पूजन करना चाहिए । उस दिन गांव से बाहर पवित्र जगह में ध्वजारोपण करे । वंशदंड के अग्रभाग में पाँच रंगों वाली पताका बाँधकर वंश को भूमि में गाड़ दे । तदनन्तर उसके मूल में समस्त दिशाओं के लोकपालों की पूजा कर वायु की परीक्षा करे । प्रथम आदि प्रहरों में जिस जिस दिशा का पवन बहे, उस-उस दिशा के स्वामी की अच्छी तरह पूजा कर चारों पहर निराहार ही रहना चाहिए ॥७-११॥ संध्याकाल होने पर अपने घर में आकर अल्प भोजन करे । फिर समाहित चित्त से लोकपालों का स्मरण कर भूमि पर शयन करे । उस रात्रि के चौथे पहर में जो स्वप्न दिखाई देता है वह होकर रहता है ऐसा शिव ने कहा है। यदि अशुभ वस्तु दीख पड़े तो शिव पूजा-परायण होकर उपवास करते हुए आगे आठो पहर या मात्र उस दिन को बिताये । पश्चात् आठ विप्रों को भोजन कराये । ऐसा करने से शुभ फल मिलता है ॥१२-१४½॥ यह व्रत शुभ अशुभ बतलाने वाला तथा मनुष्यों को इस लोक में एवम् परलोक में सौभाग्य देने वाला है । श्रावण-कृष्ण-पञ्चमी में अन्नसमृद्धिदायक व्रत करना चाहिए । नारद ! चतुर्थी तिथि के दिनावसान में समस्त अन्नों को पृथक्-पृथक् पात्रों में रखकर जल से धो डाले ।१५-१७। दूसरे पहर में अन्नों को निकालकर पुनः जल में ही रखे । प्रातः काल अच्छी तरह स्नान कर सूर्योदय होने पर देव, पितर तथा ऋषियों की पूजा करके नैवेद्य चढ़ाये । वह अन्न याचकों को प्रसन्न मन से दे दे । सम्पूर्ण दिन को इस तरह बिता कर प्रदोष काल में शिवालय जाकर शिवलिंग का पूजन करना चाहिए । गंध, पुष्प आदि से सम्यक्तया महेश्वर की अर्चना कर पंचाक्षर मंत्र का एक लाख जप करे । भव रूपी शंकर देव को जल अर्पित करके पौराणिक एवम् वैदिक मंत्रों से वाग्गद्गद होकर उनकी स्तुति करे ॥१८-२२॥ सदा सब प्रकार के अन्नों