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भारतकोश
बृहन्नारदीय पुराण (संस्कृत मूल व हिन्दी व्याख्या)

बृहन्नारदीय पुराण (संस्कृत मूल व हिन्दी व्याख्या)

Brihan Naradiya Purana with Sanskrit & Hindi Commentary

महर्षि व्यास द्वारा

स्रोत: चौखम्बा संस्कृत संस्थान · चौखम्बा संस्कृत संस्थान (उद्गम)

DevanagariSanskritpublished1,008 पृष्ठ

पृष्ठ 947, कुल 1008 में से

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पृष्ठ 947

३२८ नारदीयपुराणम् प्रार्थयेद्देवमीशानं शाश्वतान्नप्रसिद्धये । शारदीयानि चान्नानि तथा वासन्तिकान्यपि ॥२३॥ यानि स्युस्तैः समृद्धोऽहं भूयां जन्मनि जन्मनि । एवं संप्रार्थ्य देवेशं गृहायातं वि स्वकम् ॥२४॥ दत्त्वान्नं ब्राह्मणादिभ्यः पश्चाद्भुञ्जीत वाग्यतः । एतदन्नव्रतं विप्र विधिनाऽऽचरितं नृभिः ॥२५॥ सर्वान्नसंपदज्जनकं परलोके गतिप्रदम् । श्रावणे शुक्लपञ्चम्यां नृभिरास्तिक्यतत्परैः ॥२६॥ द्वारस्योभयतो लेख्या गोमयेन विषोल्वणाः । गन्धैः पूजयेत्नांश्च तथैन्द्राणीमनन्तरम् ॥२७॥ संपूज्य स्वर्णरूप्याविदध्यक्षतकुशांबुभिः । गन्धैः पुष्पैस्तथा धूपैर्दीपनैवेद्य संचयैः ॥२८॥ ततः प्रदक्षिणीकृत्य तद्द्द्रव्यं सम्प्रणम्य च । संप्रार्थ्य भक्तिभावेन विप्राग्रयेषु समर्पयेत् ॥२६॥ यदिदं स्वर्णरौप्यादि द्रव्यं वै विप्रसात्कृतम् । तदनंतफलं ज्ञेयमन्नम जन्मनि जन्मनि ॥३०॥ इत्येवं ददतो द्रव्यं भक्तिभावेन नारद । प्रसन्नः स्याद्धनाध्यक्षः स्वर्णादिकसमृद्धिदः ॥३१॥ एतद्व्रतं नरः कृत्वा विप्रान्संभोज्य भक्तितः । पश्चात्स्वयं च भुञ्जीत दारापत्यसुहृद्वृतः ॥३२॥ भाद्रे तु कृष्णपंचम्यां नागान् क्षीरेण तर्पयेत् । ॥३३॥ यस्तस्याऽऽसप्तमं यावत्कुलं सर्पात्तु निर्भयम् । भाद्रस्य शुक्लपंचम्यां पूजयेदृषिसत्तमान् ॥३४॥ प्रातर्नद्यादिके स्नात्वा कृत्वा नित्यम तंद्रितः गृहागत्य यत्नेः वेदिकां कारयेन्मृदा ॥३५॥ गोमयेनोपलिप्यथ कृत्वा पुष्पोपशोभिताम् तत्रास्तीर्य कुशान्विप्र ऋषीन्सप्त समर्चयेत् ॥३६॥ गन्धैश्च विविधैः पुष्पैर्धूपैर्दीपैः सुशोभनैः । कश्यपोऽत्रिर्भरद्वाजो विश्वामित्रोऽथ गौतमः ॥३७॥ जमदग्निर्वसिष्ठश्च सत्तैते ऋषयः स्मृताः । इत्येवाऽर्घ्यं प्रविधेयत्कल्पयित्वा प्रदाय च ॥३८॥ की प्राप्ति के लिए महादेव की इस प्रकार स्तुति करे । 'हे शिव !) शरद ऋतु, वसन्त ऋतु एवम् अन्य ऋतुओं में जितने प्रकार के अन्न होते हैं, वे सब मुझे प्रत्येक जन्म मे मिला करें ।' देवेश की प्रार्थना करने के उपरान्त अपने घर जाये और ब्राह्मण को अन्न देकर वाक्संयम पूर्वक स्वयं भोजन करे । विप्र ! जो मनुष्य इस अन्नव्रत को विधिवूर्वक सम्पन्न करता है, उसे सकल अन्नों की प्राप्ति होता है तथा परलोक में उत्तम गति मिलती है ॥२३-२५३॥ श्रावण-शुक्ल-पंचमी में आस्तिक मनुष्य घर के द्वार पर गोबर के सर्प बना कर गन्ध आदि से पूजन करे । अनन्तर सुवर्ण, चांदी, दधि, अक्षन, कुश, जल, गन्ध, पुष्प, धूप, दीप और नैवेद्य से इंद्राणी की अर्चना, प्रदक्षिणा एवम् प्रणाम करके ब्राह्मणों को भक्तिभाव से द्रव्य दे। सुवर्ण, चांदी आदि जो द्रव्य विप्रों को दिया जाता है, उसका अनंतफल जन्म-जन्मान्तर में मिलता रहता है। २६-३०॥ नारद ! इस प्रकार भक्तिभाव से द्रव्य देने वाले को कुबेर प्रसन्न होकर स्वर्ण आदि संपत्त देते हैं । इस व्रत का अनुष्ठान करने वाला मनुष्य भक्ति से ब्राह्मणों को भोजन कराकर स्त्री, पुत्र तथा लघुवर्ग के साथ स्वयं भोजन करे। भादों के कृष्ण पक्ष को पंचमी में नागों को दूध से परितृप्त करने स मनुष्य को सात कुलों तक सर्प का भय नहीं रहता । भादों की शुक्ल-पंचमी में ऋषि पूजन करना चाहिये ॥३१-३४॥ प्रातःकाल निरालस्यपूर्वक नदी आदि में स्नान कर घर आकर मृत्तिका की बेदी बनाये । उसे गोबर से लीप कर पुष्पों से सुसज्जित करे । विप्र ! उस पर कुशों को बिछा कर विविध गंध, पुष्प, धूप, दीप आदि से सप्तर्षियों की अर्चना करे । कश्यप, अत्रि, भरद्वाज, विश्वामित्र, गौतम, जमदग्नि और वसिष्ठ-ये सप्तर्षि कह- लाते हैं । इनको विधिवत् अर्घ्य प्रदान कर धीमान् व्यक्ति श्यामाक (सावां) का खीर उन्हें समर्पित करे ।