बृहन्नारदीय पुराण (संस्कृत मूल व हिन्दी व्याख्या)
Brihan Naradiya Purana with Sanskrit & Hindi Commentary
महर्षि व्यास द्वारा
स्रोत: चौखम्बा संस्कृत संस्थान · चौखम्बा संस्कृत संस्थान (उद्गम)
पृष्ठ 948, कुल 1008 में से
संदर्भ में पढ़ेंनैवेद्यं विपचेद्धोमान्छ्यामाकाद्यैश्च कृष्टकैः । तन्निवेद्य विसृज्येमान्स्वयं चाद्यात्तवेव हि ॥३६॥ अनेन विधिना सप्त वर्षाणि प्रतिवत्सरम् । कृत्वा व्रतान्ते वरयेदाचार्यान् सप्त वेदिकान् ॥४०॥ प्रतिमाः सप्त कुर्वीत सुवर्णत स्वशक्तितः । जटिलाः साक्षसूत्राश्च कमण्डलुसमन्विताः ॥४१॥ संस्थाप्य कलशेष्वेतांस्ताम्रोषु मृन्मयेषु वा । स्नापयेद्विधिवद्भक्त्या पृथक्पंचामृतेरपि ॥४२॥ उपचारैः षोडशभिस्ततः संपूज्य भक्तितः । अर्घ्यं दत्वा ततो होमं तिलव्रीहियवान्नैः ॥४३॥ 'सहस्तोमा' इति ऋचा नाममन्त्रैस्तु वा पृथक् । पुण्यैमन्त्रैस्तथैवान्यैर्हुत्वा पूर्णाहूतिं चरेत् ॥४४॥ ततस्तु सप्त गा दद्याद्वस्त्राद्यलंकारसंयुताः । आचार्यं पूजयेत्तच्च वस्त्रालंकारभूषणैः ॥४५॥ अनुज्ञा गुरुरीः पश्चान्मूर्तीर्विप्रेषु द्यापयेत् । भोजयित्वा तु तान्भक्त्या प्रणिपत्य विसर्जयेत् ॥४६॥ ततश्चेष्टैः सहासीनः स्वयं ब्राह्मणसेवितम् । भुक्त्वा वै षड्रसोपेतं प्रमुद्यात्सह बन्धुभिः ॥४७॥ एतत्कृत्वा व्रतं सांगं भोगान्न्रुक्त्वाथ वाञ्छितान् । सप्तर्षीणां प्रसादेन विमानवरगो भवेत् ॥४८॥ आश्विने शुक्लपञ्चम्यामूपांगललिताव्रतम् । ॥४९॥ तस्याः स्वर्णमयीं मूर्ति शक्त्या निर्माय नारद । उपचारैः षोडशभिः पूजयेत्तां विधानतः ॥५०॥ पक्वान्नं फलसंयुक्तं सघृतं दक्षिणान्वितम् । द्विजवर्याय दातव्यं व्रतसंपूतिहेतये ॥५१॥ "सवाहना शक्तियुता वरदा पूजिता मया । मातर्गमानुगृह्याय गम्यतां निजमंदिरम् ॥५२॥ कार्तिके शुक्लपंचम्यां जयाव्रतमनुत्तमम् । कर्तव्यं पापनाशाय श्रद्धया द्विजसत्तम ॥५३॥ पूजयित्वा अयां विप्र यथाविधि समाहितः । उपचारैः षोडशभिस्ततः शुचिरलंकृतः ॥५४॥
पश्चात् उनका विसर्जन करके स्वयं भोजन करे । इस विधि से सात वर्षों तक प्रतिवर्ष व्रत करके अन्त में सात वैदिक आचार्यों का वरण करे ॥३६-४०॥ अपनी शक्ति के अनुसार सात सुवर्ण की प्रतिमा बनाकर उन्हें जटा, रुद्राक्षमाला तथा कमंडलुओं से विभूषित करे । फिर उन्हें तांबे अथवा मिट्टी के कलशों पर स्थापित कर पंचामृत से भक्ति-पूर्वक स्नान कराये । अनन्तर भक्ति से षोडशोपचार पूजन कर अर्घ्य देकर तिल, व्रीहि, यव आदि से हवन करे । "सहस्तोमा" इस ऋचा से वा अन्य पवित्र मन्त्रों से पृथक्-पृथक् नाम ग्रहणपूर्वक पूर्णा- हुति दे ॥४०-४४॥ तदुपरात्त वस्त्रों एवम् अलंकारों से आभूषित सात गायों का दान करे । वस्त्र तथा आभूषणों से आचार्य की पूजा कर गुरु की आज्ञा से प्रतिमा विप्रों को दे दे । उन द्विजों को भोजन कराकर भक्तिपूर्वक उन्हें प्रणाम कर विदा करे । पश्चात् ब्राह्मणों के खिलाने से बचे षड्रस अन्न को इष्ट-मित्रों के साथ स्वयं प्रसन्नतापूर्वक भोजन करे । इस व्रत को सांगोपांग करने वाला व्यक्ति वांछित भोगों को भोगकर सप्तर्षियों की कृपा से उत्तम विमान पर बिहार करता है ॥४५-४८॥ आश्विन-शुक्ल-पंचमी में उपांगललिता व्रत करना चाहिये । नारद ! उसकी सुवर्णमयी प्रतिमा बनाकर विधिपूर्वक षोडशोपचार पूजन करे । व्रत की पूर्णता के लिये पक्वान्न, फल, घृत, तथा दक्षिणा उत्तम ब्राह्मण को देकर "सवाहना .............। इस मन्त्र से देवी का विसर्जन करे । जिसके बाद कार्तिक-शुक्ल-पंचमी से पापनाश के लिये श्रद्धापूर्वक अनुत्तम जयाव्रत करना चाहिये ॥४९-५२१/२॥ विप्र ! उस दिन स्नान आदि से विशुद्ध हो सावधानी से विधिपूर्वक जया का षोडशोपचार पूजन कर उत्तम ब्राह्मण को भोजन कराये । तदन्तर उसे दक्षिणा देकर विदा करे और स्वयं ... *१७ मा० पु०