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भारतकोश
बृहन्नारदीय पुराण (संस्कृत मूल व हिन्दी व्याख्या)

बृहन्नारदीय पुराण (संस्कृत मूल व हिन्दी व्याख्या)

Brihan Naradiya Purana with Sanskrit & Hindi Commentary

महर्षि व्यास द्वारा

स्रोत: चौखम्बा संस्कृत संस्थान · चौखम्बा संस्कृत संस्थान (उद्गम)

DevanagariSanskritpublished1,008 पृष्ठ

पृष्ठ 950, कुल 1008 में से

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पृष्ठ 950

पञ्चदशाधिकशततमोऽध्यायः ६३१

पुत्रं सर्वगुणोपेतं प्राप्नुयाच्चिरजीविनम् । वैशाखशुक्लषष्ठ्यां च पूजयित्वा च कार्तिकम् ॥३॥ लभते मातृजं सौख्यं नात्र कार्या विचारणा । ज्येष्ठमासे शुक्लषष्ठ्यां विधिनेष्ट्वा दिवाकरम् ॥४॥ लभते वाञ्छितान्कामांस्तत्प्रसादान्न संशयः । आषाढशुक्लषष्ठ्यां वै स्कंदव्रतमनुत्तमम् ॥५॥ उपोष्य पूजयित्वैनं शिवयोःप्रियमात्मजम् । लभतेऽभीप्सितान्कामान्पुत्रपौत्रादिसंततीः ॥६॥ श्रावणे शुक्लषष्ठ्यां तु शरजन्मानमर्चयेत् । उपचारैः षोडशभिर्भक्त्या परमयान्वितः ॥७॥ लभतेऽभीप्सितार्थान्षण्मुखस्य प्रसादतः । भाद्रमासे कृष्णषष्ठ्यां ललिताव्रतमुच्यते ॥८॥ प्रातः स्नात्वा विधानेन नारी शुक्लाम्बरावृता । शुक्लमाल्यधरा वापि नद्याः संगमवालुकाम् ॥६॥ गृहीत्वा वंशपात्रे तु धृत्वा पिंडाकृतिं च ताम् । पञ्चधा ललितां तत्र ध्यायेद्वनविलासिनीम् ॥१०॥ पङ्कजं करवीरं च नेपालीं मालतीं तथा । नीलोत्पलं केतकीं च संगृह्य तगरं तथा ॥११॥ एकैकाष्टशतं ग्राह्यमष्टाविंशतिरेव च । अक्षताः कलिका गृह्य ताभिर्देवीं प्रपूजयेत् ॥१२॥ प्रार्थयेदग्रतः स्थित्वा देवीं तां गिरिशप्रियाम् । गंगाद्वारे कुशावर्ते बिल्वके नीलपर्वते ॥१३॥ स्नात्वा कनखले देवि हरिं लब्धवती पतिम् । ललिते सुभगे देवि सुखसौभाग्यदायिनि ॥१४॥ अनंतं देहि सौभाग्यं मह्यं तुभ्यं नमो नमः । मंत्रेणानेन कुसुमैश्चंपकस्य सुशोभनैः ॥१५॥ अभ्यर्च्य विधिवत्तस्या नैवेद्यं पुरतो न्यसेत् । त्रपुषैरपि कूष्माण्डैर्नारिकेरैः सुदाडिमैः ॥१६॥ बीजपूरैः सुतुंडीरैः कारवेल्लैः सविंभवैः । फलैस्तत्कालसम्भूतैः कृत्वा शोभां तदग्रतः ॥१७॥ विरूढधान्यांकुरकैः सुदीपावलिभिस्तथा । सार्धैः सगणकैश्चैवः सौहालककरंजकैः ॥१८॥ गुडपुष्पैः कर्णवेष्टैर्मोदकैश्चापमोदकैः । बहुप्रकारैर्नैवेद्यैर्यथाविभवसारतः ॥१९॥ एवमभ्यर्च्य विधिवद्रात्रौ जागरणोत्सवम् । गीतवाद्यनटनृत्यैः प्रोक्षणीयैरनेकधा ॥२०॥

वैशाख-शुक्ल-षष्ठी में कार्तिकेय की अर्चना करने से मातृ-सुख की प्राप्ति होती है, इसमें विचार करने की आवश्यकता नहीं। ज्येष्ठ-शुक्ल-षष्ठी में विधिपूर्वक दिनकर की पूजा करने से अभिलषित फलों की प्राप्ति होती है, इसमें संशय नहीं ॥३-४३॥ आषाढ़-शुक्ल-षष्ठी में जो व्यक्ति अत्युत्तम स्कंदव्रत करता है, वह पुत्र-पौत्र आदि वांछित कामनाओं को प्राप्त करता है। श्रावण-शुक्ल-षष्ठी में परम भक्तिपूर्वक स्कंद की षोडशोपचार पूजा करने से उनकी कृपा से अभीप्सित फलों की प्राप्ति होती है। भादों की कृष्ण-षष्ठी में ललिताव्रत करना चाहिये ॥५-८॥ उस दिन नारी विधिपूर्वक स्नान कर शुक्ल वस्त्र तथा शुक्ल माला धारण करके नदी के संगम से बाँस के पात्र में पिण्डाकृति वालू लाकर उसकी मूर्ति बनावे। उस मूर्ति में वनविलासिनी ललिता देवी के पाँच रूपों का ध्यान करे । कमल, करवीर, नेपाली, मालती, नीलकमल, केतकी और तगर—इस पुष्पों में से प्रत्येक को एक सौ आठ या अट्ठाईस ही बिन मुरझाई कलियों को लेकर उनसे देवी की पूजा करे । फिर उनके आगे खड़े होकर शंकर-प्रिया देवी की इस प्रकार प्रार्थना करे—देवि ! आपने हरिद्वार, कुशावर्त, बिल्वक नीलपर्वत तथा कनखल में स्नान कर पति को प्राप्त किया ॥६-१३३॥ ललिते ! सुभगे ! देवि ! सुखसौभाग्यदायिनि ! मुझे अनंत सौभाग्य दीजिये । आपको नमस्कार है।' इस तरह प्रार्थना कर सुन्दर चम्पा पुष्पों से विधिवत् अर्चना करके ककड़ी, कुम्हड़ा, नारियल, दाड़िम, बिजौरा, तुंडीर, करेला और सामयिक फलों का नैवेद्य चढ़ाये। यथाशक्ति धूप, दीप तथा विविध प्रकार की मिठाइयों का भोग लगाकर रात्रि में नर्तकों के नृत्य, गीत आदि साधनों से जागरणोत्सव करे ॥१४-२०॥