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भारतकोश
बृहन्नारदीय पुराण (संस्कृत मूल व हिन्दी व्याख्या)

बृहन्नारदीय पुराण (संस्कृत मूल व हिन्दी व्याख्या)

Brihan Naradiya Purana with Sanskrit & Hindi Commentary

महर्षि व्यास द्वारा

स्रोत: चौखम्बा संस्कृत संस्थान · चौखम्बा संस्कृत संस्थान (उद्गम)

DevanagariSanskritpublished1,008 पृष्ठ

पृष्ठ 951, कुल 1008 में से

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पृष्ठ 951

[Page Header] ६३२ नारदीयपुराणम्

सखीभिः सहिता साध्वी तां रात्रि प्रसमं नयेत् । न च संमीलयेन्नेत्रे नारी यामचतुष्टयम् ॥२१॥ दुर्भगा दुष्कृता वंध्या नेत्रसंमीलनाद्भवेत् । एवं जागरणं कृत्वा सप्तम्यां सरितं नयेत् ॥२२॥ गन्धपुष्पैस्तथाभ्यर्च्य गीतवाद्यपुरःसरैः । तच्च दद्याद्विजेन्द्राय नैवेद्यादि द्विजोत्तम ॥२३॥ स्नात्वा गृहं समागत्य हुत्वा वैश्वानरं ततः । देवान्पितॄन्मनुष्यांश्च पूजयित्वा सुवासिनीः ॥२४॥ कन्यकाश्चैव संभोज्य ब्राह्मणान्वश पंच च । मन्नपमोजयेद्बहुविधैर्दत्वा दानानि भूरिशः ॥२५॥ ललिता मेऽस्तु सुप्रीता इत्युक्त्वा तान्विसर्जयेत् । यः कश्चिदाचरेदेतद्व्रतं सौभाग्यदं परम् ॥२६॥ नरो वा यदि वा नारी तस्य पुण्यफलं शृणु । यद्व्रतैश्च तपोभिश्च दानैर्वा नियमैरपि ॥२७॥ तवेतेनेह लभ्येत किं बहुक्तेन नारद । मृतेरनंतरं प्राप्य शिवलोकं सनातनम् ॥२८॥ मोदते ललितादेव्या शंभो वै सखिवच्चिरम् । नभस्ये मासि या शुक्ला षष्ठी सा चंदनाह्वया ॥२९॥ तस्यां देवीं समभ्यर्च्य लभते तत्सलोकताम् । रोहिणी पातभौमैस्तु संयुता कपिला भवेत् ॥३०॥ तस्यां रवि समभ्यर्च्य व्रती नियमतत्परः । लभते वांछितान्कामान्भास्करस्य प्रसादतः ॥३१॥ अन्नदानं जपो होमं पितृदेवर्षितर्पणम् । सर्वमेवाक्षयं ज्ञेयं कृतं देवर्षिसत्तम् ॥३२॥ कपिलां धेनुमभ्यर्च्य वस्त्रमाल्यानुलेपनैः । प्रदद्याद्वेदविदुषे द्वादशात्मप्रतुष्टये ॥३३॥ अष्वेशुक्लवषष्ठ्यां तु पूज्या कात्यायनी द्विज । गंधाद्यैर्मंगलद्रव्यैर्नैवेद्यैर्विविधैस्तथा ॥३४॥ ततः क्षमाप्य देवेशीं प्रणिपत्य विसर्जयेत् । पूज्यात्र संकती मूर्तिर्यद्वा द्विजसती बुदा ॥३५॥

[Hindi Translation] सती स्त्री सखियों के साथ मनोविनोद करती हुई रात बिताये । किन्तु चारों पहर कभी भी आँख न मूंदे क्योंकि (उस समय) आँख मूंदने से नारी दुर्भगा, दीना तथा वन्ध्या होती है । इस प्रकार जागरण कर सप्तमी में प्रतिमा को नदी में प्रवाहित करने के लिये ले जाय । वहाँ भी गन्ध, पुष्प, गीत, वाद्य आदि से देवी की पूजा कर नैवेद्य आदि वस्तु उत्तम ब्राह्मण को प्रदान करे ॥२१-२३॥ स्नानोत्तर घर लौटने पर हवन तथा देव-पितरों का पूजन कर सधवा स्त्रियों, कुमारिकाओं तथा पन्द्रह ब्राह्मणों को अच्छी तरह भोजन कराकर प्रचुर दान दे। अन्त में 'ललिता देवी मेरे ऊपर प्रसन्न हों' यह कहकर उनको विदा करे । जो नर या नारी इस सौभाग्यदायक व्रत का अनुष्ठान करती है, उसका पुण्यफल सुनो ॥२४- २६३॥ नारद ! बहुत क्या कहा जाय ? तप, व्रत, दान या नियम करने से जो फल मिलता है, वह इससे प्राप्त होता है और मृत्यु के पश्चात् सनातन शिवलोक की प्राप्ति होती है । वहाँ वह व्रती मित्रभाव से ललिता देवी के साथ या शंकर के साथ चिरकाल तक आनन्द करता है । भादों के शुक्ल पक्ष की षष्ठी का नाम चन्दना है । उसमें देवी की अर्चना करने से सालोक्य मोक्ष की प्राप्ति होती है ॥२७-२९३॥ उस दिन रोहिणी नक्षत्र यदि पात-भौम नामक योग से संयुक्त हो तो उस तिथि का नाम कपिल होता है। उसमें जो नियम-निष्ठापूर्वक दिनकर की आराधना करता है, उसकी समस्त कामनायें सूर्य की कृपा से सफल होती है । देवर्षिश्रेष्ठ ! कपिला तिथि में अन्नदान, जप, होम और देवता ऋषि तथा पितरों के तर्पण करने का फल अक्षय माना गया है। (उस तिथि में) सूर्य की तुष्टि के लिए वस्त्र, माला, चन्दन आदि से कपिलाधेनु की अर्चना कर वेदवेत्ता ब्राह्मण को सब वस्तुएं समर्पित करनी चाहिये ॥३०-३३॥ द्विज ! आश्विन-शुक्ल-षष्ठी को गन्ध आदि, मांगलिक द्रव्य तथा विविध प्रकार के नैवेद्यों से कात्यायनी की पूजा कर क्षमा प्रार्थना करके प्रणामो