सामग्री पर जाएँ
भारतकोश
बृहन्नारदीय पुराण (संस्कृत मूल व हिन्दी व्याख्या)

बृहन्नारदीय पुराण (संस्कृत मूल व हिन्दी व्याख्या)

Brihan Naradiya Purana with Sanskrit & Hindi Commentary

महर्षि व्यास द्वारा

स्रोत: चौखम्बा संस्कृत संस्थान · चौखम्बा संस्कृत संस्थान (उद्गम)

DevanagariSanskritpublished1,008 पृष्ठ

पृष्ठ 952, कुल 1008 में से

संदर्भ में पढ़ें
पृष्ठ 952

पञ्चदशाधिकशततमोऽध्यायः २२३ वस्त्रालंकरणैर्भक्त्यैः कात्यायिन्याः प्रतुष्टये । कन्यावरं प्राप्नुयाच्च वांछितं पुत्रमंगना ॥३६॥ कात्यायिनीप्रसादाद्वै नात्र कार्या विचारणा । कार्तिके शुक्लषष्ठ्यां तु षण्मुखेन महात्मना ॥३७॥ देवसेना महाभागा लब्धा सर्वसुरार्पिता । अतस्तस्यां सुरश्रेष्ठां देवसेनां च षण्मुखम् ॥३८॥ संपूज्य निखिलैरेव उपचारैर्मनोहरैः । प्राप्नुयादतुलां सिद्धिं मनोभीष्टां द्विजोत्तम ॥३९॥ अत्रैव वह्निपूजोक्तां तां च सम्यक्समाचरेत् । विविधद्रव्यहोमैश्च वह्निपूजापुरःसरम् ॥४०॥ मार्गशीर्षे शुक्लषष्ठ्यां निहतस्तारकासुरः । स्कंदेन सत्कृतिः प्राप्ता ब्रह्माद्यैः परिकल्पिता ॥४१॥ ततोऽस्यां पूजयेत्स्कंदं गंधपुष्पाक्षतैः फलैः । वस्त्रैराभूषणैश्चापि नैवेद्यैर्विविधैस्तथा ॥४२॥ रविंवारेण संयुक्ता तथा शतभिषान्विता । यदि चेत्सा समुद्दिष्टा चंपाहा मुनिसत्तम ॥४३॥ तस्यां विश्वेश्वरो देवो द्रष्टव्यः पापनाशनः । पूजनीयो वेदनीयः स्मर्तव्यः सौख्यमिच्छता ॥४४॥ स्नानदानादिकं चात्र सर्वमक्षयमुच्यते । पौषमासे शुक्लषष्ठ्यां देवो दिनपतिर्द्विज ॥४५॥ विष्णुरूपी जगस्त्राता प्रदुभूतः सनातनः । ॥४६॥ स तस्मात्पूजनीयोऽस्यां द्रव्यैर्गन्धपुरस्कृतैः । नैवेद्यैर्वस्त्रभूषाद्यैः सर्वसौख्यमभीप्सुभिः ॥४७॥ माघमासे सिता षष्ठी वारुणाह्वा स्मृता तु सा । तस्यां वरुणमभ्यर्च्यद्विष्णुरूपं सनातनम् ॥४८॥ रक्तैर्गंधांशुकैः पुष्पैर्नैवेद्यैर्धूपदीपकैः । एवमभ्यर्च्यं विविधद्यद्यच्चाभिमलंवेन्नरः ॥४६॥ तत्तच्च फलतो लब्ध्वा मोदते तत्प्रसादतः । फाल्गुने शुक्लषष्ठ्यां तु देवं पशुपति द्विज ॥५०॥ मृन्मयं विधिना कृत्वा पूजयेदुपचारकैः । संस्नाप्य शतरुद्रेण पृथक्पंचामृतैर्जलैः ॥५१॥ गन्धैरालिप्य सुश्वेतैरक्षतैः श्वेतपुष्पकैः । विल्वपत्रैश्च धत्तूरकुसुमैश्च फलैस्तथा ॥५२॥ संपूज्य नानानैवेद्यैर्नीराज्य विधिवत्ततः । क्षमाप्य प्रणिपत्येनं कैलासाय विसर्जयेत् ॥५३॥ पर विसर्जन करना चाहिए । कात्यायनी की तुष्टि के लिये सुन्दर वस्त्र-आभूषणों से मृत्तिका की मूर्ति या ब्राह्मण की पतिव्रता स्त्री की पूजा करे । ऐसा करने से कन्या वर को ओर नारी पुत्र को प्राप्त करती है, इसमें विचार करने को आवश्यकता नहीं । कार्तिक-शुक्ल-षष्ठी में महात्मा स्कंद को अमरों ने महाभाग्यवती देवसेना अर्पित की थी । इसलिए मनोहर उपचारों से सुरश्रेष्ठ देवसेना तथा कार्तिकेय की पूजा करने से वांछित एवम् अतुलनीय सिद्धि की प्राप्ति होती है । उस दिन विविध मांगलिक द्रव्य तथा हवन से अच्छी तरह अग्नि पूजा भी करनी चाहिये ॥३४-४०॥ अगहन-शुक्ल-षष्ठी में स्कंद ने तारकासुर को निहत कर ब्रह्मा आदि देवों से सम्मान प्राप्त किया था । इस लिए उस दिन गन्ध, पुष्प, अक्षत, फल, वस्त्र, आभूषण तथा विविध प्रकार के नैवेद्यों से उनकी पूजा करनी चाहिये । उसी तिथि में जब रविवार तथा शतभिषा नक्षत्र का योग था तब जगत्-रक्षक सनातन विष्णु अवतीर्ण हुए थे । इसलिये सब प्रकार के सुखों की अभिलाषा करने वाला व्यक्ति उक्त तिथि में गन्ध, मांगलिक द्रव्य नैवेद्य, वस्त्र तथा आभूषणों से उनकी अर्चना करे ॥४१-४७॥ माघ मास के शुक्ल पक्ष की षष्ठी तिथि वारुणा कहलाती हैं। उसमें रक्त वस्त्र, गन्ध, पुष्प धूप, दीप नैवेद्य से सनातन विष्णु रूपी वरुण की विधिपूर्वक अर्चना करने से मानव को अभिलषित फल की प्राप्ति होती है ॥४८-४९३॥ द्विज ! फाल्गुन-शुक्ल-षष्ठी में पशुपति देव की मृन्मय प्रतिमा बनाकर उपचार पूर्वक पूजन करना चाहिए। शतरुद्री का पाठ करते हुए पंचामृत से उनका स्नपन कर चन्दन लेप करके अक्षत, श्वेत पुष्प, बिल्वपत्र, धतूरे के कुसुम, फल, विविध नैवेद्य तथा नीराजन से विधिपूर्वक