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भारतकोश
बृहन्नारदीय पुराण (संस्कृत मूल व हिन्दी व्याख्या)

बृहन्नारदीय पुराण (संस्कृत मूल व हिन्दी व्याख्या)

Brihan Naradiya Purana with Sanskrit & Hindi Commentary

महर्षि व्यास द्वारा

स्रोत: चौखम्बा संस्कृत संस्थान · चौखम्बा संस्कृत संस्थान (उद्गम)

DevanagariSanskritpublished1,008 पृष्ठ

पृष्ठ 953, कुल 1008 में से

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पृष्ठ 953

६३४ नारदीयपुराणम् एवं कृतशिवाचंस्तु नरो नार्यथवा मुने । इह भुक्त्वा वरान्भोगानान्ते शिवगतिं लभेत् ॥५४॥ इति श्रीबृहन्नारदीयपुराणे पूर्वभागे बृहदुपाख्याने चतुर्थपादे द्वादशमासस्थितषष्ठीव्रत- निरूपणं नाम पञ्चदशाधिकशततमोऽध्यायः ॥११५॥

षोडशाधिकशततमोऽध्यायः सनातन उवाच शृणु नारद वक्ष्यामि सप्तम्यास्ते व्रतान्यहम् । यानि कृत्वा नरो भक्त्या सूर्यसायुज्यमाप्नुयात् ॥१॥ चैत्रे तु शुक्लसप्तम्यां बहिः स्नानं समाचरेत् । स्थंडिले गोमयालिप्ते गौरमृत्तिकयास्तृते ॥२॥ लिखित्वाष्टदलं पद्मं कणिकायां विभावसुम् । विन्यसेत्पूर्ववक्त्रे तु देवौ द्वौ कृतधातुकौ ॥३॥ आग्नेयं च न्यसेत्पत्रे गंधर्वौ कृतकारको । दक्षिणे च न्यसेत्पत्रे तथैव राक्षसद्वयम् ॥४॥ आकृती द्वौ न्यसेत्पत्रे नैर्ऋते मुनिसत्तम । काद्रवेयौ महानागौ पश्चिमे कृतचारकौ ॥५॥ वायव्ये यातुधानौ द्वौ उत्तरे च ऋषिद्वयम् । ऐशान्ये विन्यसेत्पत्रे ग्रहमेको द्विजोत्तम ॥६॥ तेषां संपूजनं कार्यं गन्धमाल्यानुलेपनैः । दीपैर्धूपैःसनैवेद्यैस्तांबूलक्रमुकादिभिः ॥७॥

अर्चना करे । अनन्तर क्षमा-प्रार्थना कर प्रणाम करके कैलाश के लिये उनका विसर्जन करे ॥५०-५३॥ मुने ! इस प्रकार शंकर की आराधना करने वाला नर अथवा नारी इह लोक में उत्तम भोगों को भोग कर अन्त में शिवगति को प्राप्त करते हैं ॥५४-५५। श्री नारदीयपुराण के पूर्वार्ध में बृहदुपाख्यानयुक्त चतुर्थपाद में द्वादशमासस्थितषष्ठीव्रतनिरूपण नामक एक सौ पन्द्रहवां अध्याय समाप्त ॥११५॥

अध्याय ११६ बारह मासों का सप्तमी-व्रत सनातन बोले-नारद ! सुनो, मैं सप्तमी तिथि के व्रतों को बता देता हूँ, जिनके आचरण से मनुष्य सूर्यसायुज्यमोक्ष को प्राप्त करता है । चैत्र-शुक्लकी सप्तमी में बाहर (नदी आदि में) स्नान कर भूमि को गोबर, तथा स्वच्छ मिट्टी से लीपे । उस पर अष्टदल कमल लिखकर उसकी कणिका के ऊपर सूर्य, पूर्वाभिमुख पत्र पर दो धातुनिर्मित देवों, आग्नेयाभिमुख पत्र पर दो यजमाधक गन्धर्वों, दक्षिणाभिमुख पत्र पर दो राक्षसों, नैर्ऋता- भिमुख पत्र पर दो आकृतियों, पश्चिमाभिमुख पत्र पर दो कद्रू-पुत्र महानागों वायव्याभिमुख पत्र पर दो यातुधानों, उत्तराभिमुख पत्र पर दो ऋषियों और ईशानाभिमुख पत्र पर एक ग्रह को स्थापित करे । द्विजवर्य ! गन्ध, माला, चन्दन, धूप, दीप, नैवेद्य, सुपारी पान आदि वस्तुओं से उसकी पूजा करे ॥१-७॥