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भारतकोश
बृहन्नारदीय पुराण (संस्कृत मूल व हिन्दी व्याख्या)

बृहन्नारदीय पुराण (संस्कृत मूल व हिन्दी व्याख्या)

Brihan Naradiya Purana with Sanskrit & Hindi Commentary

महर्षि व्यास द्वारा

स्रोत: चौखम्बा संस्कृत संस्थान · चौखम्बा संस्कृत संस्थान (उद्गम)

DevanagariSanskritpublished1,008 पृष्ठ

पृष्ठ 954, कुल 1008 में से

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पृष्ठ 954

षोडशाधिकशततमोऽध्यायः ६३५ एवं संपूज्य होमं तु घृतेनाष्टशतं चरेत् । सूर्यस्याष्टाष्ट चान्येषां प्रदद्यादाहुतीः क्रमात् ॥८॥ नाममंत्रेण वेद्यां वा ततः पूर्णाहुति ददेत् । दक्षिणा च ततो देया द्विजेभ्यः शक्तितो द्विज ॥९॥ एतत्कृत्वा विधानं तु सर्वसौख्यमवाप्नुयात् । देहांते मण्डलं भानोर्भित्त्वा गच्छेद्वरं पदम् ॥१०॥ वैशाखशुक्लसप्तम्यां जह्नुना जाह्नवी स्वयम् । क्रोधात्पीता पुनस्त्यक्ता कर्णरंध्रात्तु दक्षिणात् ॥११॥ तां तत्र पूजयेत्स्नात्वा प्रत्यूषे विमले जले । गंधपुष्पाक्षताद्यैश्च सर्वैरैवोपचारकैः ॥१२॥ ततो घटसहस्रं तु देयं गंगाव्रते द्विजोत्तम । श्रद्धया कृतं सप्तकुलं नयेत्स्वर्गमसंशयः ॥१३॥ कमलव्रतमथ्यत्र प्रोक्तं तद्विधिरुच्यते । तिलपात्रं तु सौवर्णं विधाय कमलं शुभम् ॥१४॥ वस्त्रयुग्मावृतं कृत्वा गंधधूपादिनाऽर्चयेत् । नमस्ते पद्महस्ताय नमस्ते विश्वधारिणे ॥१५॥ दिवाकर नमस्तुभ्यं प्रभाकर नमोऽस्तु ते । इति संप्रार्थ्य देवेशं सूर्ये चास्तमुपागते ॥१६॥ सोदकुंभं तु तत्पद्मं कपिलां च द्विजेऽर्पयेत् । तद्दिने तूपवस्तव्यं भोक्तव्यं च परेऽहनि ॥१७॥ संभोज्य ब्राह्मणान्भक्त्या व्रतसाकल्यमाप्नुयात् । निंबव्रतं च तत्रैव तद्विधानं शृणुष्व मे ॥१८॥ निंबपत्रैः स्मृता पूजा भास्करस्य द्विजोत्तम । खल्कोल्कायति मंत्रेण प्रणवाद्येन नारद ॥१९॥ निंबपत्रं ततोऽश्नीयाच्छयीत भूमौ च वाग्यतः । द्विजान्वरेऽह्नि संभोज्य स्वयं भुञ्जीत बंधुभिः ॥२०॥ निंबपत्रव्रतं चैतत्कर्तॄणां सर्वसौख्यदम् । सप्तमी शर्कराख्येद्धा प्रोक्ता तच्चापि मे शृणु ॥२१॥ अमृतं पिबतो हस्तात्सूर्यस्यामृतबिन्दवः । निष्पेतुर्भुवि चौत्पन्नाः शालिमुद्गयवेक्षवः ॥२२॥ शर्करा च ततस्तस्मादिक्षुसारामृतोपमा । इष्टा रवेरतः पुण्या शर्करा हव्यकव्ययोः ॥२३॥

पूजनोपरान्त घृत से एक सौ आठ बार हवन करे । सूर्य तथा अन्यों को भी क्रमशः आठ-आठ आहुतियां दे । पश्चात् नाम मन्त्र से वेदी में पूर्णाहुति देकर द्विजों को शक्त्यनुसार दक्षिणा दे । विधिपूर्वक ऐसा करने से समस्त सुखों की प्राप्ति होती है और देहान्त होने पर वह जीव सूर्यमण्डल का भेदन कर परम पद को प्राप्त करता है ॥९-१०॥ वैशाख-शुक्ल-सप्तमी में स्वयम् जह्नु ने क्रोध के मारे जाह्नवी को पीकर पुनः अपने दाहिने कान के छिद्र से निकाल दिया । उस दिन गंगा के विमल जल में स्नान कर गन्ध, पुष्प, अक्षत आदि उपचारों से उनकी पूजा करनी चाहिये । अनन्तर एक हजार घटदान करना चाहिये । इस गंगाव्रत के करने से सात कुल तक स्वर्ग की प्राप्ति होती है, इसमें संशय नहीं । उस दिन कमलव्रत किया जाता है । उसका विधान सुनो । तिल से भरे हुए पात्र में सुवर्णमय सुन्दर कमल रखकर उसे दो वस्त्रों से ढककर गन्ध, धूप आदि से अर्चना करे । पश्चात् "पद्महस्त ! आपको नमस्कार है । विश्वधारिन् ! आपको नमस्कार है । दिवाकर ! आपको नमस्कार है । प्रभाकर ! आपको नमस्कार है ।" इस प्रकार देवेश की प्रार्थना कर सूर्यास्त होने पर जलपूर्ण घट सहित वह कमल और कपिलधेनु द्विज को समर्पित कर दे । उस दिन उपवास कर दूसरे दिन भोजन करना चाहिये ॥११-१७॥ भक्तिपूर्वक ब्राह्मणों को भोजन कराने से व्रत की पूर्णता होती है । उस तिथि को निंबव्रत भी कर सकते हैं । उसकी विधि सुनो, विप्रवर्य ! प्रणव आदि में जोड़कर "खल्कोल्काय" इस मन्त्र को पढ़ते हुए निंबपत्रों से भास्कर की पूजा करे । तदनन्तर नीम के पत्ते को खाकर वाक्संयमपूर्वक भूमि पर शयन करे । दूसरे दिन विप्रों को खिलाकर बन्धुओं के साथ स्वयं भी भोजन करे ॥१८-२०॥ यह निंबव्रत भी कर्ताओं को सर्वसौख्य प्रदान करता है । इस सप्तमी का नाम शर्करा है । उसके बारे में भी सुन लो । अमृत-पान करते हुये सूर्य की रश्मि से अमृत की बूंदें टपक कर भूमि पर गिर पड़ीं । उनसे चावल, मूंग, यव और ईख की उत्पत्ति हुई । ईख से अमृतो-