बृहन्नारदीय पुराण (संस्कृत मूल व हिन्दी व्याख्या)
Brihan Naradiya Purana with Sanskrit & Hindi Commentary
महर्षि व्यास द्वारा
स्रोत: चौखम्बा संस्कृत संस्थान · चौखम्बा संस्कृत संस्थान (उद्गम)
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संदर्भ में पढ़ें६३६ नारदीयपुराणम् शर्करासप्तमी चैव वाजिमेधफलप्रदा । सर्वदुःखोपशमनी पुत्रसंततिवर्धिनी ॥२४॥ अस्यां तु शर्करादानं शर्कराभोजनं तथा । कर्तव्यं हि प्रयत्नेन व्रतमेतद्रविप्रियम् ॥२५॥ यः कुर्यात्परया भक्त्या स वै सद्गतिमाप्नुयात् । ज्येष्ठे तु शुक्लसप्तम्यां जात इंद्रो रविः स्वयम् ॥२६॥ तं संपूज्य विधानेन सोपवासो जितेंद्रियः । स्वर्गतिं लभते विप्र देवेंद्रस्य प्रसादतः ॥२७॥ आषाढशुक्लसप्तम्यां विवस्वन्नाम भास्करः । जातस्तं तत्र संप्राच्र्यं गन्धपुष्पादिभिः पृथक् ॥२८॥ लभते सूर्यसायुज्यं विप्रेंद्रोत्र न संशयः । श्रावणे शुक्लसप्तम्यामव्यंगाख्यं व्रतं शुभम् ॥२९॥ कार्पासं तु चतुर्हस्तं सार्द्धं वस्त्रं हि गोपतेः । पूजांते प्रीतये देयं व्रतमेतच्छुभावहम् ॥३०॥ यदि चेद्धस्तयुक्तेयं तदा स्यात्पापनाशिनी । अस्यां दानं जपो होमः सर्वं चाक्षयतां व्रजेत् ॥३१॥ भाद्रे तु शुक्लसप्तम्याममुक्ताभरणव्रतम् । सोमस्य तु महेशस्य पूजनं चात्र कीर्तितम् ॥३२॥ गंगादिभिः षोडशभिरुपचारैः समर्चनम् । प्रार्थ्य प्रणम्य विसृजेत्सर्वकामसमृद्धये ॥३३॥ फलसप्तमिका चेयं तद्विधानमुदीर्यते । नारिकेरं च वृंताकं नारंगं बीजपूरकम् ॥३४॥ कूष्मांडं बृहतीपूगमिति सप्त फलानि वै । महादेवस्य पुरतो विन्यस्यापरदोरकम् ॥३५॥ सप्ततन्तुकृतं सप्तग्रंथियुक्तं द्विजोत्तम । संपूज्य परया भक्त्या धारयेद्वामके करे ॥३६॥ स्त्री नरो दक्षिणे चैव यावद्वर्षं समाप्यते । संभोज्य विप्रान्सप्तैव पायसेन विसृज्य तान् ॥३७॥ स्वयं भुंजीत मतिमान् व्रतपूर्तिहेतवे । फलानि तानि देयानि सप्तस्वपि द्विजेषु च ॥३८॥ षम शक्कर उत्पन्न हुआ । इसलिये शक्कर सूर्य को पसन्द है और हव्य-कव्य के लिये यह प्रशस्त माना जाता है॥२१-२३॥ शर्करा सप्तमी अश्वमेघ के बराबर फल को देने वाली है। इससे समस्त दुःखों का नाश और पुत्र-संतानों की वृद्धि होती है। उस तिथि में शक्कर का दान और भोजन करना चाहिये । यह रविप्रिय व्रत यत्नपूर्वक करना चाहिये । जो व्यक्ति परम भक्ति से इस व्रत को करता है, उसकी सद्गति होती है ॥२४-२५॥ ज्येष्ठ-शुक्ल-सप्तमी में प्रभु भास्कर स्वयम् उत्पन्न हुए थे । इसलिए उस तिथि में इन्द्रिय-संयम और उपवास करते हुए दिनकर की अर्चना करने से उनकी कृपा से स्वर्ग की प्राप्ति होती है । आषाढ-शुक्ल-सप्तमी में विवश्वान् नामक सूर्य उत्पन्न हुए थे । विप्रेन्द्र ! उस दिन गंध, पुष्प आदि से उनकी पूजा करने से सूर्यसायुज्य- मोक्ष की प्राप्ति होती है । श्रावण-शुक्ल-सप्तमी में पवित्र अव्यंग-व्रत करना चाहिये ॥२६-२९॥ उस दिन सूर्य की पूजा कर साढ़े चार हाथ का वस्त्र भानुप्रीत्यर्थं दान करे। यह व्रत शुभावदायक है। यदि वह तिथि हस्त नक्षत्र से संयुक्त हो तो वह पापनाशिनी होती है। उसमें किये गये दान, जप, होम सब कुछ अक्षय्य हो जाते हैं। भाद्र-शुक्ल-सप्तमी में अमुक्ताभरणव्रत किया जाता है। उसमें सोम तथा महेश की पूजा करनी चाहिये ॥३०-३२॥ गंगाजल आदि सोलह उपचारों से पूजन कर प्रार्थना एवम् प्रणाम करके सकल कामनाओं की सिद्धि के लिये विसर्जन करे। वह तिथि फलसप्तमिका भी कहलाती है। इसका विधान सुनो—नारियल, बैंगन, सन्तरा, बिजौरा, नींबू, कुम्हड़ा, छोटा बैंगन और सुपारी—इन सात फलों को महादेव के आगे रख कर सात तंतुओं एवम् सात ग्रंथियों से युक्त डोरे का पूजन करके परम भक्ति से बाँयें हाथ में बाँध ले ॥३३-३६॥ स्त्री बायें हाथ में और पुरुष दाहिने हाथ में एक वर्ष तक उस डोरे को बाँधे रहे। व्रतपूर्ति के लिये बुद्धिमान् व्यक्ति सात ब्राह्मणों को खीर खिला कर स्वयं भोजन करे । उक्त सातों विप्रों को फल देकर बिदा करे।