बृहन्नारदीय पुराण (संस्कृत मूल व हिन्दी व्याख्या)
Brihan Naradiya Purana with Sanskrit & Hindi Commentary
महर्षि व्यास द्वारा
स्रोत: चौखम्बा संस्कृत संस्थान · चौखम्बा संस्कृत संस्थान (उद्गम)
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संदर्भ में पढ़ें६३८ नारदीयपुराणम् पृथिवीं वा सुवर्णं वा विसृज्याश्नीत च स्वयम् । अभयाख्यं व्रतं ह्येतत्सर्वस्याभयदं स्मृतम् ॥५४॥ मार्ताण्डाख्यं व्रतं नाम कथयंति द्विजाः परे । एकमेवेति च प्रोक्तमेकदैवत्या बुधैः ॥५५॥ माघे तु कृष्णसप्तम्यां व्रतं सर्वाप्तिसंज्ञकम् । समुपोष्य दिने तस्मिन्सम्पूज्यादित्यबिम्बकम् ॥५६॥ सौवर्णं गंधपुष्पाद्यैः कृत्वा रात्रौ च जागरम् । परेऽह्नि विप्रान्सम्भोज्य पायसेन तु सप्त वै ॥५७॥ दक्षिणां नालिकेराणि तेभ्यो दत्त्वा गुरुं ततः । सौवर्णं तु रवेर्बिम्बं युक्तं दक्षिणयाल्पया ॥५८॥ समर्प्य च भृशं प्रार्थ्य विसृज्याद्यात्स्वयं ततः । एतत्सर्वाप्तिदं नाम संप्रोक्तं सार्वकामिकम् ॥५९॥ व्रतस्यास्य प्रभावेण द्वैतं सिध्येद्धि सर्वथा । माघस्य शुक्लसप्तम्यामचलाख्यं व्रतं स्मृतम् ॥६०॥ त्रिलोचनजयंतीयं सर्वपापहरा स्मृता । रथाख्या सप्तमी चेयं चक्रवर्तित्वदायिनी ॥६१॥ अस्यां समर्च्य सवितुः प्रतिमां तु हैमीं, हैमाश्वयुक्तथगां तु ददेत्सहैमाम् ॥ यो भावभक्तिसहितः स गतो हि लोकं, ॥६२॥ शम्भोः स मोदत इहापि च भुक्तभोगः भास्करी सप्तमी चेयं कोटिभास्वद्ग्रहोपमा । अरुणोदयवेलायामस्यां स्नानं विधीयते ॥६३॥ अर्कस्य च बदर्याश्च सप्त सप्त दलानि वै । निधाय शिरसि स्नायात्सप्तजन्माघशांतये ॥६४॥ पुत्रप्रदं व्रतं चात्र प्राहादित्यः स्वयं प्रभुः । यो माघसितसप्तम्यां पूजयेन्मां विधानतः ॥६५॥ तस्याहं पुत्रतां यास्ये स्वांशेन भृशतोषिताः । तस्माज्जितेन्द्रियो भूत्वा समुपोष्य दिवानिशम् ॥६६॥ पूजयेदपरे चाह्नि होमं कृत्वा द्विजांस्ततः । दध्योदनेन पयसा पायसेन च भोजयेत् ॥६७॥ अनेन विधिना यस्तु कुरुते पुत्रसप्तमीम् । लभते स तु सत्पुत्रं चिरायुषमनामयम् ॥६८॥ दक्षिणा देकर बिदा करे । अनन्तर स्वयं भोजन करना चाहिये । यह अभयव्रत सबको अभयदान देता है । कुछ विद्वान् ब्राह्मणों का कहना है कि उस दिन एक मार्तण्डव्रत ही किया जाता है, जिसके एक ही देवता हैं । माघ- कृष्ण-सप्तमी में सर्वाप्तिसंज्ञक व्रत करना चाहिये ॥५२-५५३॥ उस दिन उपवास करते हुए गंध, पुष्प आदि से स्वर्णमयो सूर्यप्रतिमा की पूजा कर रात्रि में जागरण करे । दूसरे दिन सात ब्राह्मणों को पायस-भोजन कराकर उन्हें नारियल-दक्षिणा दे । पश्चात् गुरु को वह सूर्यप्रतिमा तथा अन्य दक्षिणा भी देकर प्रार्थनापूर्वक बिदा करके स्वयं भोजन करे । यह सर्वाप्तिव्रत समस्त अभिलाषाओं को पूर्ण करने वाला है । इस व्रत के प्रभाव से सर्वथा द्वैतसिद्धि होती है ॥५६-५६३॥ माघ शुक्ल-सप्तमी में अचलव्रत करना चाहिये । यह सप्तमी त्रिलोचनजयंती नाम से प्रसिद्ध है, जो सकल पापों का नाश करने वाली है । यह रथसप्तमी भी कहलाती है, जो चक्रवर्तित्व देने वाली है । उस तिथि में जो व्यक्ति भक्ति-भाव से सुवर्ण के अश्व से युक्त रथ पर अवस्थित सूर्य की स्वर्णमयी प्रतिमा का पूजन कर ब्राह्मण को समर्पित करता है, वह इस लोक में समस्त भोगों को भोग कर शिवलोक को जाता है तथा वहीं आनन्द करता है । यह सप्तमी भास्करी सप्तमी कहलाती है, जो करोड़ों देदीप्यमान ग्रहों के तुल्य है ॥६०-६२३॥ इस तिथि को अरुणोदयवेला में स्नान करना चाहिये । सात जन्मों के पाप के नाश के लिये आक तथा बेर के सात-सात पत्तों को शिर पर रख कर स्नान करे । स्वयं प्रभु आदित्य ने कहा है कि यह व्रत पुत्रदायक है । जो व्यक्ति माघ-शुक्ल-सप्तमी में विधिपूर्वक मेरा पूजन करता है, उसके ऊपर में अत्यन्त प्रसन्न होकर अपने अंश से उसका पुत्र होता हूँ । इसलिये इंद्रिय-संयमपूर्वक अहोरात्र उपवास करके भास्कर की अर्चना करे और दूसरे दिन हवन करके ब्राह्मणों को दही-भात तथा खीर खिलाये । इस विधि से जो पुत्रसप्तमीव्रत करता है,