बृहन्नारदीय पुराण (संस्कृत मूल व हिन्दी व्याख्या)
Brihan Naradiya Purana with Sanskrit & Hindi Commentary
महर्षि व्यास द्वारा
स्रोत: चौखम्बा संस्कृत संस्थान · चौखम्बा संस्कृत संस्थान (उद्गम)
पृष्ठ 958, कुल 1008 में से
संदर्भ में पढ़ेंसप्तदशाधिकशततमोऽध्यायः ६३६ तपस्यशुक्लसप्तम्यां व्रतमर्कपुटं चरेत् । अर्कपत्रैर्यजेदर्कमर्कपत्राणि चाश्नुयात् ॥६८॥ अर्कनाम जपेच्छश्वदित्थं चार्कपुटव्रतम् । धनदं पुत्रदं चैतत्सर्वपापप्रणाशनम् ॥७०॥ त्रिवर्गदमिति प्राहुः केचिदेतद्व्रतं द्विज । यज्ञव्रतं तथाप्यन्ये विधिवद्धोमकर्मणा ॥७१॥ सर्वासु सर्वमासेषु सप्तमीषु द्विजोत्तमः । भास्कराराधनं प्रोक्तं सार्वकामिकमित्यलम् ॥७२॥ इति श्रीबृहन्नारदीयपुराणे पूर्वभागे बृहदुपाख्याने चतुर्थपादे द्वादशमासस्थितसप्तमीव्रतनिरूपणं नाम षोडशाधिकशततमोऽध्यायः ॥११६॥ सप्तदशाधिकशततमोऽध्यायः सनातन उवाच शुक्लाष्टम्यां चैत्रमासे भवान्याः प्रोच्यते जनिः । प्रदक्षिणशतं कृत्वा कार्यों यात्रामहोत्सवः ॥१॥ दर्शनं जगदम्बायाः सर्वानंदप्रदं नृणाम् । अत्रैवाशोककलिकाप्राशनं समुदाहृतम् ॥२॥ अशोककलिकाश्चाष्टौ ये पिबंति पुनर्वसौ । चैत्रे मासि सिताष्टम्यां नतेशोक मवाप्नुयुः ॥३॥ महाष्टमीति च प्रोक्ता देव्याः पूजाविधानतः । वैशाखस्य सिताष्टम्यां समुपोष्यात्र वारिणा ॥४॥ उसके दीर्घायु तथा नीरोग पुत्र उत्पन्न होता है ॥६३-६८॥ फाल्गुन-शुक्ल सप्तमी में अर्कपुटव्रत करना चाहिये । उस दिन आक के पत्तों से सूर्य की पूजाकर आक के पत्तों को ही खाये और निरन्तर रूप से सूर्य-नाम का जप करे । इस प्रकार किया जाने वाला अर्कपुटव्रत धन तथा पुत्र को देने वाला और पाप का नाश करने वाला है । द्विज ! कोई तो इस व्रत को त्रिवर्गदायक कहते हैं और कोई यज्ञव्रत । द्विजश्रेष्ठ ! सब मासों की समस्त सप्तमियों में विधिपूर्वक हवन करके भास्कर की आराधना करने से सकल कामनायें पूर्ण होती हैं ॥६९-७२॥ श्री नारदीयपुराण के पूर्वार्ध में बृहदुपाख्यानयुक्त चतुर्थपाद में द्वादश मास स्थित सप्तमीव्रत निरूपण नामक एक सौ सोलहवां अध्याय समाप्त ॥११६॥ अध्याय ११७ बारह मासों का अष्टमी-व्रत सनातन बोले- चैत्रमास की शुक्लाष्टमी में पार्वती का जन्म हुआ था। उस दिन सौ बार प्रदक्षिणा करके यात्रामहोत्सव करना चाहिये ॥१॥ जो ऐसा करता है, उसे जगदम्बा की कृपा से सब प्रकार के आनन्द प्राप्त होते हैं। उसी दिन अशोक की कलियां भी खानी चाहिये । जो व्यक्ति पुनर्वसुनक्षत्र से युक्त चैत्र-शुक्ल- अष्टमी में अशोक की आठ कलियों को खाता है, उसे शोक कभी नहीं होता । उसको महाष्टमी भी कहते हैं, जिसमें देवी का विधानपूर्वक पूजन किया जाता है । वैशाख-शुक्ल-अष्टमी में उपवास करते हुए शुद्ध जल से