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भारतकोश
बृहन्नारदीय पुराण (संस्कृत मूल व हिन्दी व्याख्या)

बृहन्नारदीय पुराण (संस्कृत मूल व हिन्दी व्याख्या)

Brihan Naradiya Purana with Sanskrit & Hindi Commentary

महर्षि व्यास द्वारा

स्रोत: चौखम्बा संस्कृत संस्थान · चौखम्बा संस्कृत संस्थान (उद्गम)

DevanagariSanskritpublished1,008 पृष्ठ

पृष्ठ 960, कुल 1008 में से

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पृष्ठ 960

सप्तदशाधिकशततमोऽध्यायः ६४१ होमांतं विधिना सम्यगाचार्य पूजयेत्सुधीः । सौवर्णे ताम्रपात्रे वा मृन्मये वेणुपात्रके ॥२०॥ तुलसीदलं सुवर्णेन कारयित्वा सुलक्षणम् । हैमीं च प्रतिमां कृत्वा पूजयित्वा विधानतः ॥२१॥ निधाय प्रतिमां पात्रे ह्याचार्याय निवेदयेत् । दातव्या गौः सवत्सा च वस्त्रालंकारभूषिता ॥२२॥ दशाहं कृष्णदेवाय पूरिका दश चार्पयेत् । ताश्च दद्याद्विजज्ञाय स्वयं वा भक्षयेद्व्रती ॥२३॥ शयनं च प्रदातव्यं यथाशक्ति द्विजोत्तम । दशमेऽह्नि ततो मूर्ति सद्रव्यां गुरवेऽर्पयेत् ॥२४॥ व्रतांत दशविप्रेभ्यः प्रत्येकं दश पूरिकाः । दद्यादेवं दशाब्दं तु कृत्वा व्रतमनुत्तमम् ॥२५॥ उपोष्य विधिना भूयात्सर्वकामसमन्वितः । अंते कृष्णस्य सायुज्यं लभते नात्र संशयः ॥२६॥ कृष्णजन्माष्टमी चेयं स्मृता पापहरा नृणाम् । केवलेनोपवासेन तस्मिञ्जन्मदिने हरेः ॥२७॥ सप्तजन्मकृतात्पापान्मुच्यते नात्र संशयः । उपवासी तिलैः स्नातो नद्यादौ विमले जले ॥२८॥ सुदेशे मंडपे कॢप्ते मंडलं रचयेत्सुधीः । तन्मध्ये कलशं स्थाप्य ताम्रजं वापि मृन्मयम् ॥२९॥ तस्योपरि न्यसेत्पात्रं ताम्रं तस्योपरि स्थिताम् । हैमीं वस्त्रयुगाच्छन्नां कृष्णस्य प्रतिमां शुभाम् ॥३०॥ पाद्याद्यैरुपचारैस्तु पूजयेत्स्निग्धमानसः । देवकीं वसुदेवं च यशोदां नंदमेव च ॥३१॥ व्रजं गोपांस्तथा गोपींगश्च दिक्षु समर्चयेत् । तत आरातिकं कृत्वा क्षमाप्यानम्य भक्तितः ॥३२॥ तिष्ठेत्तथैवार्द्धरात्रे पुनः संस्थापयेद्धरिम् । पंचामृतैः शुद्धजलैर्गंधाद्यैः पूजयेत्पुनः ॥३३॥ धान्याकं च यवानीं च शुंठीं खंडं च नारद । साज्यं रौप्ये धृतं पात्रे नैवेद्यं विनिवेदयेत् ॥३४॥ पुनरारातिकं कृत्वा दशधा रूपधारिणम् । विचिंतयन्मृगांकाय दद्यादर्घ्यं समुद्यते ॥३५॥ ताँबे या मिट्टी या बाँस के पात्र में सुवर्ण के मनोहर तुलसीदल से सुवर्णमयी प्रतिमा को विधिवूर्वक पूजा कर आचार्य को आमंत्रित करके वस्त्र तथा अलंकारों से विभूषित सवत्सा गौ उन्हें प्रदान करे ॥२०-२२॥ कृष्णदेव को दश पूरियाँ चढ़ाकर किसी विद्वान् को दे दे या स्वयं भक्षण करे । द्विजवर्य ! यथा-शक्ति शय्यादान भी करना चाहिये । दशवें दिन द्रव्य सहित वह मूर्ति गुरु को अर्पित करे। व्रतांत में दश विप्रों को दश-दश पूरियाँ समर्पित करनी चाहिये । इस प्रकार दश वर्षों तक उपवास करके विधिवूर्वक इस व्रत को संपन्न करने से सकल कामनायें पूर्ण होती हैं। अंत में कृष्णसायुज्यमोक्ष मिलता है, इसमें संशय नहीं ॥२३-२६॥ यह कृष्णाष्टमी मनुष्यों के पाप को नष्ट करने वाली है। इस दिन केवल उपवास करने से सात जन्मों का पाप नष्ट हो जाता है, इसमें संदेह करने की आवश्यकता नहीं। उपवासी जन तिल का तेल लगाकर नदी आदि के विमल जल में स्नान करे। तदनन्तर सुन्दर प्रदेश में बनाये हुए मंडप में मंडल की रचना करे । उसके मध्य में ताँबे या मिट्टी के कलश की स्थापना कर उसके ऊपर ताँबे के पात्र में कृष्ण की मनोहर स्वर्ण प्रतिमा को स्थापित करे ॥२७-३०॥ उस मूर्ति को एक जोड़े वस्त्र से ढक कर पाद्य आदि उपचारों से श्रद्धापूर्वक पूजन करे। पश्चात् सब दिशाओं में देवकी; वसुदेव, यशोदा, नंद, व्रज, गोप, गोपी तथा गायों की अर्चना कर आरती करे । फिर भक्तिपूर्वक क्षमाप्रार्थना कर प्रणाम करे। अर्धरात्रि के समय ही उठकर पंचामृत तथा शुद्ध जल से हरि को स्नान कराकर गंध आदि से पुनः पूजन करे ॥३१-३३॥ नारद ! उन्हें धान्याक, यव, सोंठ, चीनी तथा घी चाँदी के पात्र में रखकर नैवेद्य चढ़ाये, पुनः आरती करके उनके दश स्वरूपों का ध्यान करते हुए चंद्रमा को अर्घ्य दे । तदनन्तर व्रती देवेश से क्षमायाचना कर पौराणिक स्तोत्रपाठ तथा गीत-वाद्यों से रात्रि के अवशेष भाग को