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भारतकोश
बृहन्नारदीय पुराण (संस्कृत मूल व हिन्दी व्याख्या)

बृहन्नारदीय पुराण (संस्कृत मूल व हिन्दी व्याख्या)

Brihan Naradiya Purana with Sanskrit & Hindi Commentary

महर्षि व्यास द्वारा

स्रोत: चौखम्बा संस्कृत संस्थान · चौखम्बा संस्कृत संस्थान (उद्गम)

DevanagariSanskritpublished1,008 पृष्ठ

पृष्ठ 961, कुल 1008 में से

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पृष्ठ 961

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९४२ नारदीयपुराणम् ततः क्षमाप्य देवेशं रात्रिखंडं नयेद्व्रती । पौराणिकैः स्तोत्रपाठैर्गीतवाद्यैरनेकधा ॥३६॥ ततः प्रभाते विप्राग्र्यान्भोजयेन्मधुरान्नकैः । दत्त्वा च दक्षिणां तेभ्यो विसृजेत्तुष्टमानसः ॥३७॥ ततस्तां प्रतिमां विष्णोः स्वर्णधेनुधरा न्विताम् । गुरवे दक्षिणां दत्त्वा विसर्ज्याश्नीत च स्वयम् ॥३८॥ दारापत्यसुहृद्भृत्यैरेवं कृत्वा व्रतं नरः । साक्षाद्गोलोकमाप्नोति विमानवरमास्थितः ॥३९॥ नैतेन सदृशं चान्यद्व्रतमस्ति जगत्त्रये । कृतेन येन लभ्येत कोट्य कादशकं फलम् ॥४०॥ शुक्लाष्टम्यां । नभस्यस्य कुर्याद्राधाव्रतं नरः । पूर्ववद्राधिकां हैमीं कलशस्थां प्रपूजयेत् ॥४१॥ मध्याह्ने पूजयित्वेनामेकभक्तं समाचरेत् । शक्तो भवत्तश्रोपवासं परेऽह्नि विधिना ततः ॥४२॥ सुवासिनीर्भोजयित्वा गुरवे प्रतिमार्पणम् । कृत्वा स्वयं च भुंजीत व्रतमेवं समापयेत् ॥४३॥ व्रतेनानेन विप्रर्षे कृतेन विधिना व्रती । रहस्यं गोष्ठजं लब्ध्वा राधापरिकरे वसेत् ॥४४॥ दूर्वाष्टमीव्रतं चात्र कथितं तच्च मे शृणु । शुचौ देशे प्रजातायां दूर्वायां द्विजसत्तम ॥४५॥ स्थाप्य लिंगं ततो गंधैः पुष्पैर्धूपैश्च दीपकैः । नैवेद्यैरर्चयेद्भक्त्या दध्यक्षतफलादिभिः ॥४६॥ अर्घ्यं प्रदद्यात्पूजांते मंत्राभ्यां सुसमाहितः । त्वं दूर्वेऽमृतजन्माऽसि सुरासुरनमस्कृते ॥४७॥ सौभाग्यं संततिं देहि सर्वकार्यकरी भव । यथा शाखाप्रशाखाभिर्विस्तृताऽसि महीतले ॥४८॥ तथा विस्तृतसंतानं देहि मेऽप्यजरामरम् । ततः प्रदक्षिणीकृत्य विप्रान्संभोज्य तत्र वै ॥४९॥ भुक्त्वा स्वयं गृहं गच्छेदृष्ट्वा विप्रेषु दक्षिणाम् । फलानि च प्रशस्तानि मिष्टानि सुरभीणि च ॥५०॥ एवं पुण्या पापहरा नृणां दूर्वाष्टमी द्विज । चतुर्णामपि वर्णानां स्त्रीजनानां विशेषतः ॥५१॥


बिताये । प्रातःकाल उत्तम ब्राह्मणों को मिष्टान्न भोजन करा कर दक्षिणा देकर प्रसन्न मन से विदा करे ॥३४-३७॥ तदुपरान्त सुवर्ण की धेनु-प्रतिमा सहित वह मूर्ति गुरु को दक्षिणा देकर बिदा करके स्त्री, पुत्र, मित्र तथा भृत्यों के साथ स्वयं भोजन करे । इस प्रकार व्रत करने वाला मानव उत्तम विमान पर चढ़कर साक्षात् गोलोक को जाता है । तीनों लोक में इस व्रत के समान दूसरा व्रत नहीं है । इसके करने से एक करोड़ एकादशी व्रत करने का फल मिलता है ॥३८-४०॥ भादों के शुक्ल पक्ष की अष्टमी में मनुष्य को राधाव्रत करना चाहिये । पहिले की तरह राधा की स्वर्णमयी प्रतिमा को कलश पर रख कर पूजा करे । मध्याह्न में इनकी पूजा कर एक भुक्त करे । व्रती यदि उपवास कर सके तो बहुत अच्छा । दूसरे दिन सौभाग्यवती वनिताओं को खिलाकर प्रतिमा गुरु को समर्पित करके स्वयं भोजन करे । इस तरह व्रत की समाप्ति होती है । विप्रर्षे ! विधिपूर्वक इस व्रत के करने से मनुज व्रज के रहस्य को जान कर राधा के समीप वास करता है ॥४१-४४॥ द्विजश्रेष्ठ ! उक्त तिथि में दूर्वाष्टमीव्रत भी किया जाता है, उसका विधान मुझसे सुन लो । पवित्र स्थान में उत्पन्न हुए दूर्वा पर शिवलिंग की स्थापना कर गंध, पुष्प, धूप, दीप तथा दही, अक्षत और फल के नैवेद्य से उनकी पूजा करके अर्घ्य प्रदान करे । पूजांत में समाहित चित्त होकर "•••••त्वं दूर्वे !•••••भव" "यथा••••••••अजरामरम्" इन दो मंत्रों को पढ़ते हुए प्रदक्षिणा करे ॥४५-४६॥ पश्चात् सुन्दर, सुगंधित तथा मीठे फल खिलाकर उन्हें दक्षिणा दें और स्वयं भी भोजन करे, द्विज ! यह दूर्वाष्टमी मनुष्यों को पुण्य देने वाली तथा पाप नाश करने वाली है । इस व्रत को चारों वर्ण के लोग कर सकते हैं । विशेष