बृहन्नारदीय पुराण (संस्कृत मूल व हिन्दी व्याख्या)
Brihan Naradiya Purana with Sanskrit & Hindi Commentary
महर्षि व्यास द्वारा
स्रोत: चौखम्बा संस्कृत संस्थान · चौखम्बा संस्कृत संस्थान (उद्गम)
पृष्ठ 962, कुल 1008 में से
संदर्भ में पढ़ेंसप्तदशाधिकशततमोऽध्यायः ६४३ या न पूजयते दूर्वा नारी मोहाद्यथाविधि । जन्मानि त्रीणि वैधव्यं लभते सा न संशयः ॥५२॥ यदा ज्येष्ठर्क्षसंयुक्ता भवेच्चैवाष्टमी द्विज । ज्येष्ठा नाम्नी तु सा ज्ञेया पूजिता पापनाशिनी ॥५३॥ अथैनां तु समारभ्य व्रतं षोडशवासरम् । महालक्ष्म्याः समुद्दिष्टं सर्वसंपद्विवर्धनम् ॥५४॥ करिष्येऽहं महालक्ष्मीव्रतं ते त्वत्परायणः । तवविघ्नेन मे यातु समाप्ति त्वत्प्रसादतः ॥५५॥ इत्युच्चार्य ततो बद्ध्वा डोरकं दक्षिणे करे । षोडशग्रंथिसहितं गुणैः षोडशभिर्युतम् ॥५६॥ ततोऽन्वहं महालक्ष्मीं गंधाद्यैरर्चयेद्व्रती । यावत्कृष्णाष्टमी तत्र चरेदुद्यापनं सुधीः ॥५७॥ वस्त्रमंडपिकां कृत्वा सर्वतोभद्रमंडले । कलशं सुप्रतिष्ठाप्य दीपमुद्द्योतयेत्ततः ॥५८॥ उत्तार्य डोरकं बाहोः कुंभस्याधो निवेशयेत् । चतस्रः प्रतिमाः कृत्वा सौवर्णीस्तत्स्वरूपिणीः ॥५९॥ स्नपनं कारयेत्तासां जलैः पञ्चामृतैस्तथा । उपचारैः षोडशभिः पूजयित्वा विधानतः ॥६०॥ जागरस्तत्र कर्तव्यो गीतवादित्रनिःस्वनैः । ततो निशीथे संप्राप्तेऽभ्युदितेऽमृतदीधितौ ॥६१॥ वस्त्रार्घ्यं बंधनं द्रव्यैः श्रीखंडाद्यैर्विधानतः । चन्द्रमण्डलसंस्थायै महालक्ष्म्यै प्रदापयेत् ॥६२॥ क्षीरोदार्णवसंभूतं महालक्ष्मीसहोदर । पीयूषधाम रोहिण्याः सहितोऽर्घ्यं गृहाण मे ॥६३॥ क्षीरोदार्णवसभूते कमले कमलालये । विष्णोर्वक्षःस्थलस्थे मे सर्वकामप्रदा भव ॥६४॥ एकनाथे जगन्नाथे जमदग्निप्रियेऽव्यये । रेणुके त्राहि मां देवि राममातः शिवं कुरु ॥६५॥ मंत्रैरेतैर्महालक्ष्मीं प्रार्थ्य श्रोत्रिययोषितः । सम्यक्संपूज्य ताः सम्यग्गंधयावककज्जलैः ॥६६॥ संभोज्य जुहुयादग्नौ बिल्वपद्मकपायसैः । तदलाभे घृतैर्विप्र गृहेभ्यः समिधस्तिलान् ॥६७॥ मृत्युंजयाय च परं सर्वरोगप्रशांतये । चंदनं तालपत्रं च पुष्पमालां तथाऽक्षतान् ॥६८॥ करके स्त्रियों को यह करना चाहिए । जो नारी मोह वश विधिपूर्वक इस व्रत को नहीं करती है वह तीन जन्मों तक विधवा होती है, इसमें संशय नहीं ॥५०-५२॥ विप्र जब यह अष्टमी ज्येष्ठा नक्षत्र से संयुक्त हो तब इसका नाम ज्येष्ठाष्टमी समझना चाहिये । यह पापनाशिनी है । इस दिन से लेकर सोलह दिनों तक सर्वसंपत्तिवर्धक महालक्ष्मीव्रत करना चाहिये । "महालक्ष्मि ! मैं एकनिष्ठ होकर आपका व्रत करूंगा । आपकी कृपा से वह निर्विघ्न समाप्त हो ।"--यह कहकर दाहिनी भुजा में सोलह ग्रंथियों तथा सोलह गुणों से युक्त डोरा बाँधे । वस्त्र का मंडप निर्माण कर सर्वतोभद्रमंडल में कलश की स्थापना करके दीपक बनाये ॥५३-५८॥ भुजा-बाँह से डोरक निकाल कर कलश के नीचे रख दे । सुवर्ण की एक जैसी चार प्रतिमाओं को वहाँ स्थापित कर पंचामृत से स्नपन करे । अनन्तर विधिपूर्वक षोडशोपचार पूजन कर गाना-बजाना करते हुए जागरण करे । रात्रि में चंद्रोदय होने पर "क्षीरोदार्णवसंभूत । ...........में" इस मंत्र को पढ़ते हुए श्रीखंड आदि द्रव्यों से विधिपूर्वक चंद्रमंडलस्थित महालक्ष्मी को अर्घ्य दे । तदनन्तर क्षीरसागर से उत्पन्न होने वाली ! कमले ! कमलासये ! विष्णु के वक्षःस्थल पर अवस्थित होने वाली ! मेरी समस्त कामनाओं को पूर्ण कीजिये । एकनाथे ! जगन्नाथे ! जमदग्निप्रिये ! रेणुके ! मेरी रक्षा कीजिये । राममातः ! मेरा कल्याण कीजिये ।"--इस तरह महालक्ष्मी की प्रार्थना कर छत्र, अलता, अंजन आदि से श्रोत्रिय ब्राह्मण की पत्नियों का सम्मान करते हुए उन्हें भोजन कराये । पश्चात् बेल, कमल तथा पायस से अग्नि में हवन करे ॥५९-६६॥ यदि उनका अभाव हो तो घी, लकड़ी तथा तिल से होम करे । अखिल रोगों के नाश के लिये मृत्युंजय की आहुतियां दे । व्रती नये सूप में चंदन, तालपत्र, पुष्पमाला, अक्षत, दुर्वा, कुसुम के रंग में रंगा सूत, दो बिल्वफल और विविध भक्ष्य पदार्थों को