बृहन्नारदीय पुराण (संस्कृत मूल व हिन्दी व्याख्या)
Brihan Naradiya Purana with Sanskrit & Hindi Commentary
महर्षि व्यास द्वारा
स्रोत: चौखम्बा संस्कृत संस्थान · चौखम्बा संस्कृत संस्थान (उद्गम)
पृष्ठ 964, कुल 1008 में से
संदर्भ में पढ़ेंसप्तदशाधिकशततमोऽध्यायः ६४५ मार्गशीर्षसिताष्टम्यां कालभैरवसन्निधौ । उपोष्य जागरं कृत्वा महापापैः प्रमुच्यते ॥८६॥ यत्किंचिदशुभं कर्म कृतं मानुषजन्मनि । तत्सर्वं विलयं याति कालभैरवदर्शनात् ॥८७॥ अथ पौषसिताष्टम्यां श्राद्धमष्टकसंज्ञितम् । पितॄणां तृप्तिदं वर्षं कुलसंततिवर्धनम् ॥८८॥ शुक्लाष्टम्यां तु पौषस्य शिवं सम्पूज्य भक्तितः । भुक्तिमुक्तिमवाप्नोति भक्तिमेकां समाचरन् ॥८९॥ कृष्णाष्टम्यां तु माघस्य भद्रकालीं समर्चयेत् । भक्तितो वैरिबृन्दघ्नीं सर्वकामप्रदायिनीम् ॥९०॥ माघमासे सिताष्टम्यां भीष्मं संतर्पयेद्विज । संतति त्वव्यबच्छिन्नामिच्छंश्चाप्यपराजयाम् ॥९१॥ फाल्गुने त्वसिताष्टम्यां भीमां देवीं समर्चयेत् । तत्र व्रतपरो विप्र सर्वकामसमृद्धये ॥९२॥ शुक्लाष्टम्यां फाल्गुनस्य शिवं चापि शिवां द्विज । गंधाद्यैः सम्यगभ्यर्च्य सर्वसिद्धीश्वरो भवेत् ॥९३॥ फाल्गुनापरपक्षे तु शीतलामष्टमीदिने । पूजयेत्सर्वपक्वान्नैः सप्तम्यां विधिवत्कृतैः ॥९४॥ शीतले त्वं जगन्माता शीतले त्वं जगत्पिता । शीतले त्वं जगद्धात्री शीतलायै नमोनमः ॥९५॥ वन्देऽहं शीतलां देवीं रासभस्थां दिगम्बराम् । मार्जनीकलशोपेतां विस्फोटकविनाशिनीम् ॥९६॥ शीतले शीतले चेत्थं ये जपंति जले स्थिताः । तेषां तु शीतला देवी स्याद्विस्फोटकशांतिदा ॥९७॥ इत्येवं शीतलामन्त्रैयैः समर्चयते द्विज । तस्य वर्षं भवेच्छांतिः शीतलायाः प्रसादतः ॥९८॥ सर्वमासोभये पक्षे विधिवच्चाष्टमीदिने । शिवां वापि शिवं प्रार्च्य लभते वांछितं फलम् ॥९९॥ इति श्रीबृहन्नारदीयपुराणे पूर्वभागे बृहदुपाख्याने चतुर्थपादे द्वादशमासस्थिताष्टमीव्रतकथनं नाम सप्तदशाधिकशततमोऽध्यायः ॥११७॥
प्राप्त करती है, इसमें संशय नहीं। अगहन-शुक्ल-अष्टमी को कालभैरव के समीप उपवासपूर्वक जागरण करने से महापातक का नाश होता है ॥८२-८६॥ मनुष्य-जन्म में जो कुछ भी कुत्सित कर्म किया जाता है, वह कालभैरव के दर्शन से विलीन हो जाता है। पौष-कृष्ण-अष्टमी में अष्टकाश्राद्ध करने से एक वर्ष तक पितरों की तृप्ति मिलती है तथा वंश की वृद्धि होती है। पौष-शुक्ल-अष्टमी में भक्तिपूर्वक शिव की पूजा करने से भोग मोक्ष की प्रप्ति होती है। माघ की कृष्णाष्टमी में शत्रुसमूह का नाश करने वाली तथा समस्त कामनाओं को पूर्ण करने वाली भद्रकाली की अर्चना करनी चाहिये ॥८७-९०॥ द्विज ! माघ-शुक्ल-अष्टमी में भीष्म तर्पण करने से अक्षय्य वंश तथा विजय की प्राप्ति होती है। फाल्गुन-कृष्ण-अष्टमी में भीमा देवी की अर्चना करने से सकल कामनायें पूर्ण होती हैं। द्विज ! फाल्गुन-शुक्ल-अष्टमी में गंध, पुष्प आदि से शिव तथा गौरी की अच्छी तरह पूजा करने से मनुष्य सकल सिद्धियों का स्वामी होता है ॥९१-९३॥ फाल्गुन शुक्ल की अष्टमी में पूजा, पकवान आदि से विधिपूर्वक शीतलादेवी की अर्चना करे। पकवान आदि सप्तमी को ही बना लेना चाहिए। जो व्यक्ति "शीतले !......" इस मंत्र से शीतला देवी की आराधना करता है, उसका अरिष्ट शांत हो जाता है। जो व्यक्ति जल में खड़ा होकर, गधे पर चढ़ने वाली, नंगी रहने वाली, हाथ में झाडू तथा कलश रखने वाली और विस्फोट रोगों का नाश करने वाली शीतला देवी का ध्यान करते हुए 'शीतला, शीतला' जपता है, उसे विस्फोट (फोड़ा) का भय नहीं होता। समस्त मासों के दोनों पक्षों की अष्टमियों में शिव या पार्वती का पूजन करने वाला मनुज वांछित फल को प्राप्त करता है ॥९४-९९॥ श्री नारदीयपुराण के पूर्वार्ध में बृहदुपाख्यानयुक्त चतुर्थपाद में द्वादश-मास-स्थित-अष्टमी-व्रत-कथन नामक एक सौ सत्रहवां अध्याय समाप्त ॥११७॥ ११९ न० पु०