बृहन्नारदीय पुराण (संस्कृत मूल व हिन्दी व्याख्या)
Brihan Naradiya Purana with Sanskrit & Hindi Commentary
महर्षि व्यास द्वारा
स्रोत: चौखम्बा संस्कृत संस्थान · चौखम्बा संस्कृत संस्थान (उद्गम)
पृष्ठ 965, कुल 1008 में से
संदर्भ में पढ़ेंअथाष्टादशाधिकशततमोऽध्यायः सनातन उवाच अथ वक्ष्यामि विप्रेंद्र नवम्यस्ते व्रतानि वै । यानि कृत्वा नरा लोके लभंते वांछितं फलम् ॥१॥ चैत्रस्य शुक्लपक्षे तु श्रीरामनवमीव्रतम् । तत्रोपवासं विधिवच्छक्तो भक्तः समाचरेत् ॥२॥ अशक्तश्चैकभक्तं वै मध्याह्नोत्सवतः परम् । विप्रान्संभोज्य मिष्टान्नं रामप्रीति समाचरेत् ॥३॥ गोभूतलहिरण्याद्यैर्वस्त्रालंकरणैस्तथा । एवं यः कुरुते भक्त्या श्रीरामनवमीव्रतम् ॥४॥ विधूय चेहपापानि व्रजेद्विष्णोः परं पदम् । उक्तं मातृवतं चात्र भैरवेण समन्विताः ॥५॥ स्रग्गंधवस्त्रनैवेद्यैश्चतुःषष्टिरतु योगिनीः । अत्रैव भद्रकाली तु योगिनीनां महाबला ॥६॥ ब्राह्मणश्रेष्ठ सर्वासामाधिपत्येऽभिषेचिता । तस्मात्तां पूजयेच्चात्र सोपवासो जितेन्द्रियः ॥७॥ राधे नवम्यांदलयोश्चंडिकां यस्तु पूजयेत् । विधिना स विमानेन देवतैः सह मोदते ॥८॥ ज्येष्ठशुक्लनवम्यां तु सोपवासो नरोत्तमः । उमां संपूज्य विधिवत्कुमारींभोजयेद्विजान् ॥६॥ स्वशक्त्या दक्षिणां दत्त्वा शाल्यन्नं पयसाऽशनुयात् । उमाव्रतमिदं विप्र यः कुर्याद्विधिवन्नरः ॥१०॥ स भुक्त्वेह वरान्भोगानंते स्वर्गगति लभेत् । आषाढे मासि विप्रेंद्र यः कुर्यात्पक्षयोद्विज ॥११॥ नक्तं चैंद्रीं समभ्यर्च्यैरावतगतां सिताम् । स भवेद्देवलोके तु भोगभाग्देवयानगः ॥१२॥
अध्याय ११८ नवमी सम्बन्धी व्रतों की विधि और महिमा सनातन बोले--द्विजवर्य ! अब मैं नवमी व्रतों के संबंध में कहूँगा, जिनके करने से मनुष्य को इस लोक में वांछित फल की प्राप्ति होती है । चैत्र के शुक्ल पक्ष में श्रीरामनवमीव्रत किया जाता है । शक्तिशाली पुरुष उस दिन विधिवत् उपवास करे । यदि अशक्त हो तो एक भुक्त करे और मध्याह्न में उत्सव मनाते हुए राम की प्रीति के लिये विप्रों को मिष्टान्न खिलाकर गो, भूमि, तिल, सुवर्ण, वस्त्र तथा आभूषण उन्हें दक्षिणा दे । इस प्रकार भक्ति से जो रामनवमी व्रत करता है, वह निष्पाप होकर विष्णु के परम पद को प्राप्त करता है ॥१-४॥ उस दिन मातृव्रत भी किया जाता है । माला, गंध, वस्त्र तथा नैवेद्य से भैरव सहित चौंसठ योगिनियों की पूजा करनी चाहिये । विप्रश्रेष्ठ ! समस्त योगिनियों की अधिनाथिका महाबली भद्रकाली की है । इसलिये उनका पूजन और उपवास इंद्रियनिग्रह पूर्वक करना चाहिये । वैशाख के उभय पक्षों की नवमियों में जो विधिपूर्वक चंडिका की अर्चना करता है, वह विमान पर आरूढ़ होकर देवताओं के साथ आनन्द लेता है । ज्येष्ठ-शुक्ल- नवमी में उत्तम मनुष्य विधिपूर्वक उमा की पूजा कर कुमारियों तथा द्विजों को भोजन कराकर दक्षिणा दे तथा स्वयं खीर खाये । विप्र ! जो नर विधिपूर्वक उमाव्रत को संपन्न करता है वह इस लोक में उत्तम भोगों को भोग कर अंत में स्वर्ग को जाता है ॥५-१०॥ जो आषाढ़ के दोनों पक्षों के नवमीव्रत को करते हुए रात्रि में ऐरावत पर अवस्थित शुक्लवर्णा इंद्राणी का ध्यान करके पूजन करता है, वह इस लोक में निखिलभोग-भोक्ता होकर