बृहन्नारदीय पुराण (संस्कृत मूल व हिन्दी व्याख्या)
Brihan Naradiya Purana with Sanskrit & Hindi Commentary
महर्षि व्यास द्वारा
स्रोत: चौखम्बा संस्कृत संस्थान · चौखम्बा संस्कृत संस्थान (उद्गम)
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संदर्भ में पढ़ेंअष्टादशाधिकशततमोऽध्यायः ६४७
श्रावणे मासि विप्रेन्द्र यः कुर्यान्नक्तभोजनम् । पक्षयोरुपवासं वा कौमारीं चंडिकां यजेत् ॥१३॥ एवं पापहरां गंधैः पुष्पैर्धूपैश्च दीपकैः । नैवेद्यैर्विविधैश्चैव कुमारीभोजनैस्तथा ॥१४॥ एवं यः कुरुते भक्त्या कौमारीव्रतमुत्तमम् । स विमानेन गच्छेद्द्वे देवीलोकं सनातनम् ॥१५॥ भाद्रे तु नवमी शुक्ला नंदाव्हा परिकीर्तिता । तस्यां यः पूजयेद्दुर्गा विधिवच्चोपचारकैः ॥१६॥ सोऽश्वमेधफलं लब्ध्वा विष्णुलोके महीयते । आश्विने शुक्लनवमी महापूर्वा प्रकीर्तिता ॥१७॥ अपराह्ने शमीपूजा कार्याऽस्यां प्राग्दिशि द्विज । ततो निशायां प्राग्यामे खड्गं धनुरिपून्गवाम् ॥१८॥ शूलं शक्तिं च परशुं छुरिकां चर्म खेटकम् । छत्रं ध्वजं गजं चाश्वं गोवृषं पुस्तकं तुलाम् ॥१९॥ दंडं पाशं चक्रशंखौ गंधाद्यैरुपचारकैः । संपूज्य महिषं तत्र भद्रकाल्यै समालभेत् ॥२०॥ एवं बलिं विधायूथ भुक्त्वा पक्वान्नमेव च । द्विजेभ्यो दक्षिणां दत्त्वा व्रतं तत्र समापयेत् ॥२१॥ एवं यः पूजयेद् दुर्गां नृणां दुर्गतिनाशिनीम् । इह भुक्त्वा वरान्भोगानंते स्वर्गतिमाप्नुयात् ॥२२॥ कार्तिके शुक्लनवमी याऽक्षया सा प्रकीर्तिता । तस्यामश्वत्थमूले वै तर्पणं सम्यगाचरेत् ॥२३॥ देवानां च ऋषीणां च पितॄणां चापि नारद । स्वशाखोक्तैस्तथा मंत्रैः सूर्यायार्घ्यं ततोऽर्पयेत् ॥२४॥ ततो द्विजाग्भोजयित्वा मिष्टान्नेन मुनीश्वर । स्वयं भुक्त्वा च विहरेद्विप्रजेभ्यो दत्तदक्षिणः ॥२५॥ एवंयः कुरुते भक्त्या जपदानं द्विजार्चनम् । होमं च सर्वमक्षय्यं भवेदिति विधेर्वचः ॥२६॥ मार्गे तु शुक्लनवमी नंदिनी परिकीर्तिता । तस्यामुपोषितो यस्तु जगदंबां प्रपूजयेत् ॥२७॥ गंधाद्यैः सोऽश्वमेधस्य फलभाङ्गात्र संशयः । पौषे शुक्लनवम्यां तु महामायां प्रपूजयेत् ॥२८॥ एकभक्तपरो विप्र वाजपेयफलाप्तये । माघमासे तु या शुक्ला नवमी लोकपूजिता ॥२९॥
(अंत में) विमान से प्रयाण करता है। विप्रेन्द्र ! श्रावण के उभय पक्षों की नवमियों में जो दैनिक उपवास कर रात्रि में भोजन करता है तथा कुमारी चंडिका को पूजता है, वह सनातन देवी लोक को जाता है ॥११-१५॥
भादों की शुक्ल नवमी आनंदा कहलाती है। उसमें विधिवूर्वक दुर्गा को सोपचार पूजा करने से मनुष्य अश्वमेध का फल प्राप्त कर वैकुण्ठ में पूजित होता है। आश्विन-शुक्ल की नवमी महापूर्वा कहलाती है। उस दिन मध्याह्न के बाद पूर्व दिशा में शमीवृक्ष का पूजन करना चाहिये ॥१६-१७३॥
रात्रि के प्रथम प्रहर में खड्ग, धनुष, बाण, गदा, त्रिशूल, शक्ति, परशु, छुरिका, चर्म, खेटक, छत्र, ध्वज, गज, अश्व, गो, वृषभ, पुस्तक, तराजू, दंड, पाश, चक्र तथा शंख की गंध आदि उपचारों से पूजा कर भद्रकाली को भैंसे की बलि दे। अनन्तर द्विजों को पकवान आदि खिलाकर दक्षिणा देकर व्रत समाप्त करे। इस प्रकार जो मनुष्य दुर्गा की आराधना करता है, उसकी दुर्गति नहीं होती; प्रत्युत इस लोक में अखिल भोगों को भोगकर अंत में वह स्वर्ग को प्राप्त करता है ॥१८-२२॥ कार्तिक-शुक्ल-नवमी का नाम क्षया है। उस दिन पीपल के मूल में देवों, ऋषियों तथा पितरों का तर्पण कर अपनी शाखा के मंत्रों से सूर्य को अर्घ्य समर्पण करे। मुनीश्वर ! तदुपरान्त द्विजों को मिष्टान्न खिला कर उन्हें दक्षिणा दे और स्वयं भोजन करे। इस प्रकार जो जप, दान, द्विजपूजा तथा हवन करता है, उसके किये हुए सकल कर्म अक्षय्य होते हैं, ऐसा ब्रह्मा ने कहा है। अगहन की शुक्ल-नवमी नंदिनी कहलाती है। उस दिन जो उपवास करके गंध आदि से जगदम्बा की पूजा करता है, उसे अश्वमेध का फल मिलता है, इसमें संशय नहीं ॥२३-२७॥ विप्र ! पौष-शुक्ल-नवमी में जो एक भुक्त करते हुए महामाया की पूजा करता है, उसकी वाक्सिद्धि होती है। माघमास के शुक्ल पक्ष की जो लोकपूजिता नवमी