बृहन्नारदीय पुराण (संस्कृत मूल व हिन्दी व्याख्या)
Brihan Naradiya Purana with Sanskrit & Hindi Commentary
महर्षि व्यास द्वारा
स्रोत: चौखम्बा संस्कृत संस्थान · चौखम्बा संस्कृत संस्थान (उद्गम)
पृष्ठ 974, कुल 1008 में से
संदर्भ में पढ़ेंविशत्यधिकशततमोऽध्यायः ६५५ श्रावणे कृष्णपक्षे तु एकादश्यां द्विजोत्तम । कामिकां समुपोष्यैव नियमेन नरोत्तम ॥२८॥ द्वादश्यां कृतनित्यस्तु श्रीधरं पूजयेद्धरिम् । उपचारैः षोडशभिस्ततः संभोज्य वै द्विजान् ॥२६॥ दत्त्वा च दक्षिणां तेभ्यो विसर्ज्याश्नीत् बांधवैः । एवं यः कुरुते विप्रकामिकाव्रतमुत्तमम् ॥३०॥ स सर्वकामांल्लभ्वेह याति विष्णोः परं पदम् । एकादश्यां नभःशुक्ले पवित्रां समुपोष्य वै ॥३१॥ द्वादश्यां नियतो भूत्वा पूजयेच्च जनार्दनम् । उपचारैः षोडशभिस्ततः संभोज्य वाडवान् ॥३२॥ दत्त्वा च दक्षिणां तेभ्यः पुत्रं प्राप्नेह सद्गुणम् । याति विष्णोः पदं साक्षात्सर्वदेवनमस्कृतः ॥३३॥ नभस्यकृष्णेकादश्यामजाख्यां समुपोष्य वै । अर्चेदुपेंद्रं द्वादश्यामुपचारैः पृथग्विधैः ॥३४॥ विप्रांत्संभोज्य मिष्टान्नंर्विसृजेत्प्राप्तदक्षिणान् । एवं कृतव्रतो विप्र भक्त्याऽजायाः समाहितः ॥३५॥ भुक्त्वेह भोगानखिलान्यात्यंते वैष्णवं क्षयम् । नभस्यशुक्लैकादश्यां पद्माख्यां समुपोष्य वै ॥३६॥ कृत्वा नित्यार्चनं तत्र कटिदानमथाचरेत् । पूर्वं संस्थापितायास्तु प्रतिमाया द्विजोत्तम ॥३७॥ समुत्सवविधानेन नीत्वा तां सलिलाशये । कृतांबुस्पर्शानां तत्र संप्रपूज्य विधानतः ॥३८॥ आनीय मण्डपे तस्मिन् वामपार्श्वेन शाययेत् । ततः प्रभाते द्वादश्यां गन्धाद्यैरर्च्य वामनम् ॥३६॥ संभोज्य वाडवान्दत्त्वा दक्षिणां च विसर्जयेत् । एवं यः कुरुते विप्र पद्माव्रतमनुत्तमम् ॥४०॥ मुक्ति प्राप्येह भुक्ति तु लभतेऽन्ते प्रपंचतः । इषस्य कृष्णेकादश्यामन्दिरां समुपोष्य वै ॥४१॥ शालग्रामशिलाग्रे तु मध्याह्ने श्राद्धमाचरेत् । विष्णोः प्रीतिकरं विप्र ततः प्रातरहर्दिने ॥४२॥ पद्मनाभं समभ्यर्च्य भूदेवान्भोजयेत्सुधीः । विसृज्य दक्षिणां दत्त्वा तांस्ततोऽश्नीत् च स्वयम् ॥४३॥
द्विजश्रेष्ठ ! श्रावण-कृष्ण-एकादशी का नाम कामिका है । उसमें नियमपूर्वक उपवास कर द्वादशी में नित्य कर्म करके श्रीधर भगवान् का षोडशोपचार पूजन करे । तदनन्तर ब्राह्मणों को खिलाकर दक्षिणापूर्वक बिदा करे और स्वयं भाई-बंधुओं के साथ मिलकर भोजन करे । विप्र ! इस प्रकार जो उत्तम कामिका व्रत करता है, वह समस्त कामनाओं को प्राप्त कर वैकुंठ जाता है । श्रावण-शुक्ल-एकादशी का नाम पवित्रा है । उसमें उपवास कर द्वादशी को नित्यकर्म करने के उपरान्त जनार्दन का षोडशोपचार पूजन करे । पश्चात् ब्राह्मणों को खिला कर उन्हें दक्षिणा दे । ऐसा करने वाला व्यक्ति गुणवान् पुत्र को प्राप्त कर सर्वदेववंद्य होकर वैकुंठ जाता है । भाद्र- कृष्ण-एकादशी अजा कहलाती है । उसमें उपवास कर दूसरे दिन विष्णु को पृथक्-पृथक् उपचारों से अर्चना करे । अनन्तर विप्रों को मिष्टान्न खिलाकर दक्षिणापूर्वक बिदा करे । विप्र ! जो सावधान होकर भक्ति से अजा- व्रत करता है, वह अखिल भोगों को भोगकर अंत में विष्णुलोक को जाता है ॥२८-३५॥ भाद्र-शुक्ल-एकादशी का नाम पद्मा है । उस दिन नित्यपूजन कर मंडप का निर्माण करे । अनन्तर पहले से बनी-बनाई प्रतिमा को उत्सव के साथ जलाशय ले जाकर जल से परिमार्जित करे । फिर विधिपूर्वक पूजा कर मंडप में ले जाय । वहाँ बायीं करवट सुला दे । प्रातःकाल द्वादशी में गंध आदि उपचारों से वामन की अर्चना कर ब्राह्मणों को भोजन कराकर दक्षिणा दे विदा करे । विप्र ! जो इस प्रकार उत्तम पद्माव्रत को करता है, वह इस लोक में भोगों को भोगकर अंत में संसार से मुक्ति पाता है । आश्विन-कृष्ण-एकादशी का नाम इन्दिरा है । उस दिन मध्याह्न में शालग्रामशिला के समीप श्राद्ध करने से विष्णु प्रसन्न होते हैं । प्रातःकाल द्वादशी में पद्मनाभ की अर्चना कर सुधी व्यक्ति ब्राह्मणों को भोजन करावे । पश्चात् उन्हें दक्षिणापूर्वक विदा करके स्वयं भोजन करे । इस प्रकार