बृहन्नारदीय पुराण (संस्कृत मूल व हिन्दी व्याख्या)
Brihan Naradiya Purana with Sanskrit & Hindi Commentary
महर्षि व्यास द्वारा
स्रोत: चौखम्बा संस्कृत संस्थान · चौखम्बा संस्कृत संस्थान (उद्गम)
पृष्ठ 973, कुल 1008 में से
संदर्भ में पढ़ें६५४ नारदीयपुराणम् उदयादुदयं यावद्भास्करस्य द्विजोत्तम । प्रभाते कृतनित्यस्तु द्वादश्यामुपचारकैः ॥११५॥ हृषीकेशं समभ्यर्च्य विप्रान् संभोज्य शक्तितः । चतुर्विंशेकादशीनां फलं यत्तत्समाप्नुयात् ॥११६॥ आषाढकृष्णैकादश्यां योगिनीं समुपाष्य वै । नारायणं समभ्यर्च्य द्वादश्यां कृतनित्यकः ॥११७॥ ततः संभोज्य विप्राग्र्यान्दत्त्वा तेभ्यश्च दक्षिणाम् । सर्वदानफलं प्राप्य मोदते विष्णुमन्दिरे ॥११८॥ आषाढशुक्लैकादश्यां यद्विधानं शृणुष्व तत् । उपोष्य तस्मिन् दिवसे विधिवन्मंडपे शुभे ॥११९॥ स्थापयेत्प्रतिमां विष्णोः शंखचक्रगदाम्बुजैः । लसच्चतुर्भुजामग्र्यां कांचनीं वाथ राजतीम् ॥१२०॥ पीतांबरधरां शुभ्रे पर्य्यंके स्वास्तृते द्विज । ततः पंचामृतैः स्नाप्य मन्त्रैः शुद्धजलेन च ॥१२१॥ पौरुषेणैव सूक्तेन ह्युपचारान् प्रकल्पयेत् । नीराजनांतान्पाद्यादींस्ततः संप्रार्थयेद्धरिम् ॥१२२॥ सुप्ते त्वयि जगन्नाथ जगत्सुप्तं भवेदिदम् । विबुद्धे त्वयि बुद्धं च जगत्सर्वं चराचरम् ॥१२३॥ इति संप्रार्थ्य देवाग्रे चातुर्मास्यप्रबोदितान् । नियमांस्तु यथाशक्ति गृह्णीयाद्भक्तिमान्नरः ॥१२४॥ ततः प्रभाते द्वादश्यां समर्च्यच्छेषशायिनम् । उपचारैः षोडशभिस्ततः संभोज्य वाडवान् ॥१२५॥ प्रतोष्य दक्षिणाभिश्च स्वयं भुञ्जीत वाग्यतः । ततःप्रभृति विप्रेंद्र गन्धाद्यैः प्रत्यहं यजेत् ॥१२६॥ कृत्वैवं विधिना विप्र देवस्य शयनीव्रतम् । भुक्तिमुक्तियुतो मर्त्यो भवेद्विष्णोः प्रसादतः ॥१२७॥ नियमपूर्वक वरूथिनी व्रत करता है, वह सकल पातकों से मुक्त होकर वैकुंठ को जाता है। वैशाख-शुक्ल- एकादशी का नाम मोहिनी है। उस दिन उपवास करते हुए दूसरे दिन स्नानोपरान्त गंध आदि उपचारों से पुरुषोत्तम की पूजा कर ब्राह्मणों को खिलाये । ऐसा करने से पापों का नाश होता है, इसमें संशय नहीं। ज्येष्ठ- कृष्ण एकादशी का नाम परा है। उस दिन उपवास करते हुए द्वादशी में नित्यकर्म करने के उपरान्त त्रिविक्रम की पूजा करे । पश्चात् उत्तम ब्राह्मणों को खिला कर उन्हें दक्षिणा दे । ऐसा करने से मानव समस्त पापों से निवृत्त होकर विष्णुलोक को जाता है ॥९-१३½॥ ज्येष्ठ शुक्ल एकादशी का नाम निर्जला है। उस दिन निवृत्त हो हृषीकेश की सोपचार पूजा करे। पश्चात् भक्ति से विप्रों को भोजन कराये । ऐसा करने से चौबीस एकादशी- व्रतों का फल प्राप्त होता है ॥१४-१६॥ आषाढ़-कृष्ण एकादशी का नाम योगिनी है । उस दिन उपवास करते हुए द्वादशी को नित्यकर्म करने के उपरान्त नारायण की अर्चना कर उत्तम ब्राह्मणों को भोजन तथा दक्षिणा दे । ऐसा करने से मनुष्य निखिल दानों का फल प्राप्त कर वैकुंठ को जाता है ॥१७-१८॥ आषाढ़-शुक्ल एकादशी का जो विधान है, वह सुनो । उस दिन उपवास करते हुए पवित्र मंडप में शंख, चक्र, गदा तथा कमल से युक्त चार भुजा वाली विष्णु की सुवर्णमयी या रजतमयी प्रतिमा को निर्मल आसन पर स्थापित कर पुरुषसूक्त पढ़ते हुए पंचामृत तथा शुद्ध जल से स्नान कराये । पश्चात् आचमनीय से लेकर नीराजन पर्यन्त उपचारपूर्वक पूजन कर हरि की प्रार्थना करे—'जगन्नाथ ! आपके सो जाने पर संपूर्ण जगत् सो जाता है और आपके जागने पर सकल चराचर जगत् जागरित होता है ।' इस प्रकार प्रार्थना करके भक्तिमान् मनुष्य चातुर्मास्य के नियमों का यथाशक्ति पालन करने के लिये प्रतिज्ञा करे । प्रातःकाल द्वादशी में शेषशायी भगवान् का षोडशोपचार पूजन कर ब्राह्मणों को खिलाये, उन्हें दक्षिणा से संतुष्ट कर स्वयं वाक्यसंयमपूर्वक भोजन करे । विप्र ! तब से लेकर प्रत्येक दिन गंध आदि से भग- वान् का पूजन किया करे । जो मनुष्य इस प्रकार हरिशयन-एकादशी करता है, वह विष्णु की कृपा से भोग- मोक्ष को प्राप्त करता है ॥१९-२७॥