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भारतकोश
बृहन्नारदीय पुराण (संस्कृत मूल व हिन्दी व्याख्या)

बृहन्नारदीय पुराण (संस्कृत मूल व हिन्दी व्याख्या)

Brihan Naradiya Purana with Sanskrit & Hindi Commentary

महर्षि व्यास द्वारा

स्रोत: चौखम्बा संस्कृत संस्थान · चौखम्बा संस्कृत संस्थान (उद्गम)

DevanagariSanskritpublished1,008 पृष्ठ

पृष्ठ 972, कुल 1008 में से

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पृष्ठ 972

विंशत्यधिकशततमोऽध्यायः सनातन उवाच एकादश्यां तु द्वयोर्निराहारः समाहितः । नानापुष्पैर्मने कृत्वा विचित्रं मण्डपं शुभम् ॥१॥ स्नात्वा सम्यग्विधानेन सोपवासो जितेंद्रियः । संपूज्य विधिवद्विष्णुं श्रद्धया सुसमाहितः ॥२॥ उपचारैर्बहुविधैर्जपैर्होमैः प्रदक्षिणैः । स्तोत्रपाठैर्बहुविधैर्गीतवाद्यैर्मनोहरैः ॥३॥ दंडवत्प्रणिपातैश्च जयशब्दैर्मनोहरैः । रात्रौ जागरणं कृत्वा याति विष्णोः परं पदम् ॥४॥ चैत्रस्य शुक्लैकादश्यां सोपवासो नरोत्तमः । कृत्वा च नियमान्सर्वान्वक्ष्यमाणान्दिनत्रये ॥५॥ द्वादश्यां पूजयेद्भक्त्या वासुदेवं सनातनम् । उपचारैः षोडशभिस्ततः संभोज्य बांधवान् ॥६॥ दत्त्वा च दक्षिणां तेभ्यो विसृज्याश्नीत च स्वयम् । इयं तु कामदा नाम सर्वपातकनाशिनी ॥७॥ भुक्तिमुक्तिप्रदा विप्र भक्त्या सम्यगुपोजिता । वैशाखकृष्णैकादश्यां समुपोष्य विधानतः ॥८॥ वरूथिनीं परदिने पूजयेन्मधुसूदनम् । स्वर्णान्नकन्याधेनूनां दानमत्र प्रशस्यते ॥६॥ वरूथिनीव्रतं कृत्वा नरो नियमतत्परः । सर्वपापविनिर्मुक्तो वैष्णवं लभते पदम् ॥१०॥ वैशाखशुक्लैकादश्यां समुपोष्य च मोहिनीम् । स्नात्वा परेऽह्नि संपूज्य गंधाद्यैः पुरुषोत्तमम् ॥११॥ संभोज्य विप्रान्मुच्येत पातकेभ्यो न संशयः । ज्येष्ठस्य कृष्णैकादश्यां समुपोष्य परां नृप ॥१२॥ द्वादश्यां नैष्ठिकं कृत्वा समभ्यर्च्य त्रिविक्रमम् । ततो द्विजाग्र्यान्संभोज्य दत्त्वा तेभ्यश्च दक्षिणाम् ॥१३॥ सर्वपापविनिर्मुक्तो विष्णुलोकं व्रजेन्नरः । ज्येष्ठस्य शुक्लैकादश्यां निर्जलां समुपोष्य तु ॥१४॥ अध्याय १२० बारह मासों का एकादशीव्रत तथा दशमी आदि तीन दिनों के पालनीय विशेष नियम सनातन बोले- मुने ! दोनों पक्षों की एकादशी तिथि में निराहार तथा सुसंयत होकर सुन्दर मंडप को बहुविध पुष्पों से सुशोभित करे। अच्छी तरह उपवास तथा इंद्रिय संयम करते हुए विधिवूर्वक स्नान करके श्रद्धा एवम् भक्ति से विष्णु की आराधना करे। जप, होम, प्रदक्षिणा, स्तोत्रपाठ, मनोहर गीत-वाद्य, दंडवत्प्रणाम, सुन्दर जयशब्दोच्चारण आदि उपचारों से उनकी आराधना करते हुए रात्रि में जागरण करे। ऐसा करने से विष्णु के परम पद की प्राप्ति होती है ॥१-४॥ चैत्र-शुक्ल-एकादशी में उत्तम मानव उपवास करते हुए वक्ष्यमाण नियमों का तीन दिनों तक पालन करे। द्वादशी में भक्ति से सनातन वासुदेव की षोडशोपचार पूजा कर ब्राह्मणों को भोजन कराये। पश्चात् उन्हें दक्षिणापूर्वक विदा करके स्वयं भोजन करे। विप्र ! इस एकादशी का नाम कामदा है। इसमें सम्यक् उपवास करने से सकल पातकों का नाश तथा भोग-मोक्ष का लाभ होता है ॥५-८॥ वैशाख-कृष्ण-एकादशी का नाम वरूथिनी है। उसमें विधिवूर्वक उपवास कर दूसरे दिन मधुसूदन की पूजा करनी चाहिये । उस दिन सुवर्ण, अन्न, कन्या तथा धेनुओं का दान भी प्रशस्त माना गया है। जो नर १२० ना० पु०