बृहन्नारदीय पुराण (संस्कृत मूल व हिन्दी व्याख्या)
Brihan Naradiya Purana with Sanskrit & Hindi Commentary
महर्षि व्यास द्वारा
स्रोत: चौखम्बा संस्कृत संस्थान · चौखम्बा संस्कृत संस्थान (उद्गम)
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संदर्भ में पढ़ें६५२ नारदीयपुराणम् स्वापयित्वा दर्भमयानासनेषु च संस्थितान् । गंधैर्धूपैस्तथा दीपैर्नैवेद्यैश्चापि नारद ॥५२॥ प्रत्येकं दक्षिणां दत्त्वा प्रणिपत्य विसर्जयेत् । दक्षिणां तां द्विजाग्येभ्यो गुरवे वा समर्पयेत् ॥५३॥ एवं कृतविधिचैकभक्तो भोगी व्रती भवेत् । लोकद्वयस्य विप्रर्षे नात्र कार्या विचारणा ॥५४॥ माघशुक्लदशम्यां तु सोपवासो जितेंद्रियः । देवानंगिरसो नाम दशंसम्यक्समर्चयेत् ॥५५॥ कृत्वा स्वर्णमयान्विप्र गंधाद्यैरुपचारकैः । आत्मा ह्यायुर्मनो दक्षो मदः प्राणस्तथैव च ॥५६॥ बर्हिष्मांश्च गविष्ठश्च दत्तः सत्यश्च ते दश । दश विप्रान्भोजयित्वा मधुरान्नेन नारद ॥५७॥ मूर्तीस्तेभ्यः प्रदद्यात्ताः स्वर्गलोकाप्तये क्रमात् । अंत्यशुक्लदशम्यां तु चतुर्दश यमान्यजेत् ॥५८॥ यमश्च धर्मराजश्च मृत्युरेवांतकस्तथा । वैवस्वतश्च कालश्च सर्वभूतक्षयस्तथा ॥५९॥ औदुम्बरश्च दध्नश्च द्वौ नीलपरमेष्ठिनौ । वृकोदरश्च चित्रश्च चित्रगुप्तश्चतुर्दश ॥६०॥ गन्धाद्यैरुपचारैश्च समभ्यर्चाय तर्पयेत् । तिलांबुमिश्रांजलिमिरद्भिः प्रत्येकशस्त्रिभिः ॥६१॥ ततश्च दद्यात्सूर्यार्घ ताम्रपात्रेण नारद । रक्तचंदनसंमिश्रतिलाक्षतयवांशुभिः ॥६२॥ एहि सूर्यसहस्रांशो तेजोराशे जगत्पते । गृहाणार्घं मया दत्तं भवत्या मामनुकंपय ॥६३॥ इति मंत्रेण दत्त्वाऽर्घ्यं विप्रान्भोज्य चतुर्दश । रौप्यां मुदक्षिणां दत्त्वा द्विसृज्याश्नीत च स्वयम् ॥६४॥ एवं कृतविधिर्विप्र धर्मराजप्रसादतः । भुक्त्वा भोगांश्च पुत्रार्थीनैहिकान्देवदुर्लभान् ॥६५॥ विमानवरमास्थाय देहांते विष्णुलोकभाक् ॥६६॥ इति श्रीबृहन्नारदीयपुराणे पूर्वभागे बृहदुपाख्याने चतुर्थपादे द्वादशमासस्थितदशमीव्रतनिरूपणं नामैकोनविंशत्यधिकशततमोऽध्यायः ॥११९॥ काम, मुनि, गुरु, विप्र, राम तथा केशव की कुशमय प्रतिमाओं को आसनों पर अवस्थित कर गंध, धूप, दीप तथा नैवेद्य से उनकी पूजा करें पश्चात् प्रत्येक को दक्षिणा देकर प्रणाम करके विसर्जन करें । नारद ! वह दक्षिणा उत्तम ब्राह्मणों को या गुरु को समर्पित करनी चाहिए । जो व्यक्ति एक भुक्त करते हुए उपर्युक्त प्रकार से व्रत को संपन्न करता है, वह ऐहलोकिक तथा पारलौकिक सुखों का भोक्ता होता है, इसमें सोचने की आवश्यकता नहीं ।।४८-५४।। माघ-शुक्ल-दशमी में उपवास तथा इंद्रियसंयम करते हुए आत्मा, आयु, मन, दक्ष, मद, प्राण, बर्हिष्मान, गविष्ठ, दत्त तथा सत्य नामक दश आंगिरस देवों की स्वर्णमयी प्रतिमाओं का गंध आदि उपचारों से पूजन कर दश विप्रों को मिष्टान्न खिलाये । नारद ! वे मूर्तियां उन्हीं लोगों को दे देनी चाहिए । ऐसा करने से स्वर्ग की प्राप्ति होती है । फाल्गुन-शुक्ल-दशमी में चौदह धर्मों की पूजा करनी चाहिये । यम, धर्मराज, मृत्यु, अंतक, वैवस्वत, काल, सर्वभूतक्षय, औदुम्बर, दध्न, नील, परमेष्ठी, वृकोदर, चित्र, और चित्रगुप्त की गंध आदि सामग्रियों से पूजा कर कुश, तिल, जल से तर्पण करे । पश्चात् ताम्रपात्र में रक्तचंदन, तिल, अक्षत, यव तथा जल रखकर "एहि...अनुकंपय" इस मंत्र से अर्घ्य दे । फिर चौदह ब्राह्मणों को खिलाकर सोना-चांदी दक्षिणा देकर विदा करे । अनन्तर स्वयं भी भोजन करे । विप्र ! जो इस प्रकार व्रत करता है, वह ऐहलोकिक दिव्य भोगों को भोग कर अन्त में उत्तम विमान से विष्णुलोक को जाता है ५५-६६॥ श्री नारदीयपुराण के पूर्वार्ध में बृहदुपाख्यानयुक्त चतुर्थ पाद में द्वादशमास स्थित दशमी व्रतनिरूपण नामक एक सौ उन्नीसवाँ अध्याय समाप्त ॥११९॥