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भारतकोश
बृहन्नारदीय पुराण (संस्कृत मूल व हिन्दी व्याख्या)

बृहन्नारदीय पुराण (संस्कृत मूल व हिन्दी व्याख्या)

Brihan Naradiya Purana with Sanskrit & Hindi Commentary

महर्षि व्यास द्वारा

स्रोत: चौखम्बा संस्कृत संस्थान · चौखम्बा संस्कृत संस्थान (उद्गम)

DevanagariSanskritpublished1,008 पृष्ठ

पृष्ठ 970, कुल 1008 में से

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पृष्ठ 970

एकोनविंशत्यधिकशततमोऽध्यायः ३५१ यो मे दक्षगतः पाप्मा पापकेनेह कर्मणा । तं यमः प्रेतराजो वै नाशयत्वखिलेष्टदः ॥३६॥ यो मे नैर्ऋतिगः पाप्मा पापकेनेह कर्मणा । रक्षोराजो नैर्ऋतिस्तं नाशयत्वखिलेष्टदः ॥३७॥ यो मे पश्चिमगः पाप्मा पापकेनेह कर्मणा । यादःपतिस्तं वरुणो नाशयत्वखिलेष्टदः ॥३८॥ यो मे वायुगतः पाप्मा पापकेनेह कर्मणा । वायुस्तं मरुतां राजो नाशयत्वखिलेष्टदः ॥३९॥ यो मे सौम्यगतः पाप्मा पापकेनेह कर्मणा । सोमस्तमृक्षयक्षेशो नाशयत्वखिलेष्टदः ॥४०॥ यो म ईशगतः पाप्मा पापकेनेह कर्मणा । ईशानो भूतनाथस्तं नाशयत्वखिलेष्टदः ॥४१॥ यो म ऊर्ध्वगतः पाप्मा पापकेनेह कर्मणा । ब्रह्मा प्रजापती शस्तं नाशयत्वखिलेष्टदः ॥४२॥ यो मेऽधःसंस्थितः पाप्मा पापकेनेह कर्मणा । अनंतो नागराजस्तं नाशयत्वखिलेष्टदः ॥४३॥ इत्येवं दिक्षु दशसु बलिं दत्त्वा समाहितः । क्षेत्रपालाय तद्वाह्ये क्षिपेद्बलिमर्तंद्रितः ॥४४॥ एवं कृतविधिः शेषं निशायां निनयेत्सुधीः । गीतैः सुमंगलप्रायैः स्तवपाठैर्जपादितिः ॥४५॥ प्रातः स्नात्वा समभ्यर्च्य लोकपालान् द्विजोत्तमान् । द्वादशाभ्यर्च्य संभोज्य शक्तितो दक्षिणां ददेत् ॥४६॥ इत्थं कृत्वा व्रतं विप्र भोगा भुंक्त्वेहिकाञ्छुभान् । युगं स्वर्गसुखं भुक्त्वा सार्वभौमौ नृपो भवेत् ॥४७॥ मार्गशुक्लदशम्यां तु चरेदारोग्यकं व्रतम् । गंधाद्यैरर्चयेद्विप्रान् दश तच्चरणोदकम् ॥४८॥ पीत्वाऽथ दक्षिणां दत्त्वा विसृजेदेकभोजनः । एतत्कृत्वा व्रतं विप्र ह्यारोग्यं प्राप्य भूतले ॥४९॥ धर्मराजप्रसादेन मोदते दिवि देववत् । पौषे दशम्यां शुक्लायां विश्वेदेवान् समर्चयेत् ॥५०॥ क्रतुं दक्षं वसुन्सत्यं कालं कामं मुनिं गुरुम् । विप्रं रामं च दशधा केशवांस्तान्समास्थितः ॥५१॥

कुत्सित कर्म किया है, उसे सर्वकामनादायक प्रेतराज यम नष्ट करें ॥३१-३६॥ निर्ऋति-दिशा में जो मैंने पातक किया है, उसे रक्षोराज नैर्ऋति नष्ट करें । पश्चिम-दिशा में जो मैंने पाप किया है, उसे समस्तकामनापूरक यादःपति वरुण नष्ट करें । वायु-दिशा में जो मैंने पापकर्म किया है, उसे अखिलकामनादायक मरुत्-स्वामी वायु नष्ट करें । सोम-दिशा में जो मैंने पाप किया है, उसे निखिलकामनादायक तथा नक्षत्रों एवम् यक्षों के राजा सोम नष्ट करें । ईश-दिशा में जो मैंने पाप किया है, उसे समस्त अभिलाषाओं को पूर्ण करने वाले भूतनाथ रुद्र नष्ट करें । जो मैंने ऊर्ध्वदिशा में ऊपर पाप किया है, उसे प्रजापति ब्रह्मा नष्ट करें ॥३६-४२॥ जो मैंने अधोदिशा (नीचे) में पाप किया है, उसे अखिलेष्टदायक नागराज अनंत नष्ट करें ।” यह उच्चारण करते हुए दशों दिशाओं में समाहितचित्त से बलि दे । मंडप से बाहर क्षेत्रपाल को निरालस्यपूर्वक बलि देनी चाहिये । सुधी व्यक्ति मांगलिक गीत, स्तुति, पाठ तथा जप आदि से उस रात्रि को व्यतीत कर प्रातःकाल स्नान के बाद लोकपालों की अर्चना करें । पश्चात् बारह उत्तम ब्राह्मणों को सम्मानपूर्वक भोजन कराकर यथाशक्ति दक्षिणा दे । विप्र ! जो इस तरह व्रत संपन्न करता है, वह ऐहलौकिक उत्तम भोगों को भोग कर एक युग तक स्वर्गसुख प्राप्त करता है और अन्त में चक्रवर्ती राजा होकर जन्म लेता है ॥४३-४७॥ अगहन-शुक्ल-दशमी में आरोग्यव्रत करना चाहिये । उस दिन गंध आदि उपचारों से दश विप्रों की पूजा कर उनका चरणोदक पान करें । पश्चात् उन्हें दक्षिणा देकर विदा करके एक भुक्त करें । विप्र ! इस व्रत का करने वाला व्यक्ति भूतल पर आरोग्य लाभ कर धर्मराज की कृपा से स्वर्ग में देवतुल्य आनन्द का उपभोक्ता होता है । पौषशुक्ल-दशमी में विश्वेदेवों की अर्चना करनी चाहिये । क्रतु, दक्ष, वसु, सत्य, काल,