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भारतकोश
बृहन्नारदीय पुराण (संस्कृत मूल व हिन्दी व्याख्या)

बृहन्नारदीय पुराण (संस्कृत मूल व हिन्दी व्याख्या)

Brihan Naradiya Purana with Sanskrit & Hindi Commentary

महर्षि व्यास द्वारा

स्रोत: चौखम्बा संस्कृत संस्थान · चौखम्बा संस्कृत संस्थान (उद्गम)

DevanagariSanskritpublished1,008 पृष्ठ

पृष्ठ 969, कुल 1008 में से

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पृष्ठ 969

६५० नारदीयपुराणम् आश्विने शुक्लदशमी विजया सा प्रकीर्तिता । चतुर्गोमर्यपिण्डानि प्रातर्वैस्थ्य गृहांगणे ॥२०॥ चक्रवालस्वरूपेण तन्मध्ये रामलक्ष्मणौ । तथा भरतशत्रुघ्नौ पूजयेच्चतुरोऽपि हि ॥२१॥ सपिधानासु पात्रीषु गोमयीषु चतसृषु । क्लिन्नं धान्यं सरोप्यं तु धृत्वा धौतांशुकावृतम् ॥२२॥ पितृमातृभ्रातृपुत्रजायाभृत्यसमन्वितम् । संपूज्य गन्धपुष्पाद्यैर्नैवेद्यैश्च विधानतः ॥२३॥ नमस्कृत्याथ भुंजीत द्विजान्संभोज्य पूजितान् । एवं कृत्वा विधानं तु नरो वर्षे सुखान्वितः ॥२४॥ धनधान्यसमृद्धश्च निश्चितं जायते द्विज । अथापराह्णसमये नवम्यां संनिमंत्रिताम् ॥२५॥ पूर्वं दिक्षु शमीं विप्र गत्वा तन्मूलजां मृदम् । गृहीत्वा स्वगृहं प्राप्य गीतवादित्रनिःस्वनैः ॥२६॥ संपूज्य तां विधानेन संज्जीकृत्य स्वकं बलम् । निर्गत्य पूर्वद्वारेण ग्रामाद्वहिरेनाकुलः ॥२७॥ ततः शत्रुप्रतिकृतिं निर्मितां पत्रकादिभिः । मनसा कल्पितां वापि स्वर्जयुक्शरेण वै ॥२८॥ विध्येदिति भृशं प्रीतः प्राप्नुयात्स्वगृहं निशि । एवं कृतविधिर्वापि गच्छेद्रा शत्रुनिग्रहे ॥२९॥ एषैवं दशमी विप्र विधिनाऽऽचरिता सदा । धनं जयं सुतान् गाश्च गजायं लभतेऽखिलम् ॥३०॥ दद्यादिह शरीरांते स्वर्गतिं चापि नारद । दशम्यां कार्तिके शुक्ले सार्वभौमव्रतं चरेत् ॥३१॥ कृतोपवासो वैकाशी निशीथेऽपूपकादिभिः । दशदिक्षु बलिं दद्याद् गृहाद्बहिः पुराद्बहिः ॥३२॥ / मंडलेऽष्टदले क्लृप्ते गोपिङ्गेलिप्ताधरातले । मन्त्रैरेभिर्द्विजश्रेष्ठ गणेशादि कुलार्चनः ॥३३॥ यो मे पूर्वगतः पाप्मा पाषकेनेह कर्मणा । तमिन्द्रो देवराजोऽद्य नाशयत्वाखिलेष्टदः ॥३४॥ यो मे वह्निगतः पाप्मा पापकेनेह कर्मणा । तेजोराजोऽद्य वह्निस्तं नाशयत्वाखिलेष्टदः ॥३५॥

आश्विन की शुक्ल-दशमी विजया नाम से प्रसिद्ध है । उस दिन प्रातःकाल आंगन में गोबर के चार पिण्ड मंडलाकार रखे । उनके भीतर राम, लक्ष्मण, भरत तथा शत्रुघ्न की प्रतिमाओं का पूजन करे । उन गोमर्यपिण्डों के ऊपर भीगा हुआ धान तथा चांदी रख कर धुले वस्त्र से ढक दे । फिर पिता, माता, भ्राता, पुत्र, स्त्री तथा नौकर समेत गंध, पुष्प, नैवेद्य आदि से विधिपूर्वक पूजा कर नमस्कार करके सम्मानित विप्रों को भोजन कराये । द्विज ! जो नर एक वर्ष भी विधिपूर्वक इस व्रत को करता है, वह निश्चय ही सुखी एवम् धनधान्यसंपन्न होता है ॥२०-२४½॥ उक्त तिथि को मध्याह्न के बाद पूर्व दिशा में जाकर नवमी तिथि को ही निमंत्रित किये गये शमीवृक्ष के मूल से मृत्तिका लेकर अपने घर को लौटे । तदनन्तर गीत-वाद्य के साथ मृत्तिका की बनी प्रतिमा का पूजन कर वाहन पर चढ़कर गांव से बाहर पूर्व दिशा में प्रसन्नतापूर्वक यात्रा करे । पश्चात् पद्म आदि से निर्मित या मन से परिकल्पित शत्रु की प्रतिमा को सोने के अनेक बाणों से बार-बार वेध करे । फिर रात्रि में प्रसन्नता- पूर्वक अपने घर को लौट आये । विप्र ! उक्त दशमी में जो व्यक्ति इस प्रकार आचरण करता है, वह धन, जय, पुत्र, गौ, हाथी, घोड़ा, बकरी तथा भेड़ प्राप्त करता है और देहावसान होने पर उसे स्वर्ग मिलता है ॥२५-३०½॥ नारद ! कार्तिक-शुक्ल-दशमी में सार्वभौमव्रत करना चाहिये । उस दिन उपवास या एकभुक्त करते हुए रात्रि में चतुर्दिक्षु पुए आदि की बलि चढ़ाये । बलि घर या नगर से बाहर चढ़ानी चाहिये । द्विजश्रेष्ठ ! मंडल की भूमि को गोबर से लीप कर अष्टदल कमल का विन्यास करें । उस पर गणेश आदि की अर्चना कर "पूर्व दिशा में जो मैंने पापकर्म किया है, उसे अखिल कामनादायक देवराज इंद्र नष्ट करें । अग्नि-दिशा में जो मैंने पाप किया है, उसे सकलकामनादायक तेजोराज अग्नि नष्ट करें ॥३१-३५॥ दक्षिण-दिशा में जो मैंने