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भारतकोश
बृहन्नारदीय पुराण (संस्कृत मूल व हिन्दी व्याख्या)

बृहन्नारदीय पुराण (संस्कृत मूल व हिन्दी व्याख्या)

Brihan Naradiya Purana with Sanskrit & Hindi Commentary

महर्षि व्यास द्वारा

स्रोत: चौखम्बा संस्कृत संस्थान · चौखम्बा संस्कृत संस्थान (उद्गम)

DevanagariSanskritpublished1,008 पृष्ठ

पृष्ठ 968, कुल 1008 में से

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पृष्ठ 968

एकोनविंशत्यधिकशततमोऽध्यायः ६४६ दशम्यां माधवे शुक्ले विष्णुमभ्यर्च्य मानवः । गन्धाद्यैरुपचारैश्च श्वेतपुष्पैः सुगन्धिभिः ॥५॥ शतं प्रदक्षिणाः कृत्वा विप्रान्संभोज्य यत्नतः । लभते वैष्णवं लोकं नात्रकार्या विचारणा ॥६॥ ज्येष्ठे शुक्लदशम्यां तु जाह्नवी सरितां वरा । समायाता धरां स्वर्गात्तस्मात्सा पुण्यदा स्मृता ॥७॥ ज्येष्ठः शुक्लदलं हस्तो बुधश्च दशमी तिथिः । गरानन्दव्यतीपाताः कन्येंदुवृषभास्कराः ॥८॥ दशयोगः समाख्यातो महापुण्यतमो द्विज । हरते दश पापानि तस्माद्दशहरः स्मृतः ॥६॥ अस्यां यो जाह्नवीं प्राप्य स्नाति संप्रीतमानसः । विधिना जाह्नवीतोये स याति हरिमन्दिरम् ॥१०॥ आषाढशुक्लदशमी पुण्या मन्वादिकैः स्मृता । तस्यां स्नानं जपो दानं होमो वा स्वर्गतिप्रदाः ॥११॥ श्रावणे शुक्लदशमी सर्वाशापरिपूतिदा । अस्यां शिवार्चनं शस्तं गन्धाद्यैरुपचारकैः ॥१२॥ तत्रोपवासो नक्तं वा द्विजानां भोजनं जपः । हेम्नो दानं च घेन्वादेः सर्वपापप्रणाशनम् ॥१३॥ अथो नभस्यशुक्लायां दशम्यां द्विजसत्तम । व्रतं दशावताराख्यं तत्र स्नानं जलाशये ॥१४॥ कृत्वा संध्यादिनियमं देवर्षिपितृतर्पणम् । ततो दशावताराणि समभ्यर्च्यत्समाहितः ॥१५॥ मत्स्यं कूर्मं वराहं च नरसिंहं त्रिविक्रमम् । रामं रामं च कृष्णं च बौद्धं कल्किनमेव च ॥१६॥ दशमूर्तीस्तु सौवर्णीः पूजयित्वा विधानतः । दशभ्यो विप्रवर्येभ्यो दद्यात्सत्कृत्य नारद ॥१७॥ उपवासं चैकभक्तं कृत्वा संभोज्य वाडवान् । विसृज्य पश्चाद्भुञ्जीत स्वयं स्वेष्टैः समाहितः ॥१८॥ भक्त्या कृत्वा व्रतं ह्येतद्भुक्त्वा भोगानिहोत्तमान् । विमानेन व्रजदंते विष्णुलोकं सनातनम् ॥१९॥ दशमी में सुगन्धित श्वेतपुष्प तथा गंध आदि उपचारों से विष्णु की अर्चना कर सो बार प्रदक्षिणा करके ब्राह्मणों को यत्नपूर्वक खिलाना चाहिये । जो ऐसा करता है, उसे विष्णुलोक की प्राप्ति होती है, इसमें विचार करने की आवश्यकता नहीं । ज्येष्ठ-शुक्ल-दशमी में सरित्-श्रेष्ठ जाह्नवी स्वर्ग से पृथ्वी पर आई थी । इसलिये वह तिथि पुण्यदायिनी मानी जाती है । ज्येष्ठ मास, शुक्ल पक्ष, हस्त नक्षत्र, बुध दिन दशमी तिथि, गर करण, आनन्द योग, व्यतीपात, कन्या राशि के चन्द्रमा और वृष राशि के सूर्य इन दश योगों का जब समावेश होता है तब वह दिन महापुण्यदायक माना जाता है । वह दश प्रकार के पापों का हरण करता है । इसलिये वह 'दशहर' कहलाता है ॥४-९॥ उस दिन जो प्रसन्नचित्त से विधिवूवक गंगा में स्नान करता है, वह वैकुंठ को जाता है । आषाढ़- शुक्ल की दशमी पुण्यदायिनी होती है । उसमें किये जाने वाले स्नान, जप, दान तथा होम स्वर्ग को देते हैं । श्रावण-शुक्ल दशमी समस्त आशाओं को पूर्ण करती है । उस दिन गंध आदि उपचारों से शिवार्चन करना प्रशस्त है । दैनिक व्रत, ब्राह्मण-भोजन, जप, सुवर्णदान तथा गोदान करने से निखिल पापों का नाश होता है । द्विज- श्रेष्ठ ! श्रावण-शुक्ल-दशमी का नाम दशा है । उस दिन दशावतार-व्रत करना चाहिये । जलाशय में स्नान कर संध्या और देव, ऋषि तथा पितरों का तर्पण करे ॥१०-१४ १/२॥ पश्चात् समाहितचित्त से मत्स्य, कूर्म, वराह, नरसिंह, त्रिविक्रम, राम, परशुराम, कृष्ण, बौद्ध तथा कल्की—इन दश अवतारों की दश सुवर्णमयी प्रतिमाओं का विधिवूवक पूजन कर दश उत्तम ब्राह्मणों को सम्मानपूर्वक प्रतिमायें समर्पित कर दे । उस दिन उपवास या एक भक्त करना चाहिये । ब्राह्मणों को खिलाकर पश्चात् सावधानी से स्वयं भोजन करे । जो व्यक्ति भक्ति से इस व्रत को करता है, वह ऐहलोकिक उत्तम भोगों को भोग कर अन्त में विमान से सनातन विष्णुलोक को जाता है ॥१५ १९॥