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भारतकोश
बृहन्नारदीय पुराण (संस्कृत मूल व हिन्दी व्याख्या)

बृहन्नारदीय पुराण (संस्कृत मूल व हिन्दी व्याख्या)

Brihan Naradiya Purana with Sanskrit & Hindi Commentary

महर्षि व्यास द्वारा

स्रोत: चौखम्बा संस्कृत संस्थान · चौखम्बा संस्कृत संस्थान (उद्गम)

DevanagariSanskritpublished1,008 पृष्ठ

पृष्ठ 976, कुल 1008 में से

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पृष्ठ 976

विंशत्यधिकशततमोऽध्यायः ६५७ विसृज्य पश्चाद्भुञ्जीत स्वयमिष्टैः समाहितः । एवं यो भक्तिभावेन उत्पन्नाव्रतमाचरेत् ॥५८॥ स विमानं समारुह्य यास्यते वैष्णवं पदम् । मार्गस्य शुक्लैकादश्यां मोक्षाख्यां समुपोष्य वै ॥५९॥ द्वादश्यां प्रातरभ्यर्च्य ह्यनंतं विश्वात्मकम् । सर्वैरुपचारैस्तु विप्रान्संभोजयेद्द्विजः ॥६०॥ विसृज्य दक्षिणां दत्त्वा स्वयं भुंजीत बांधवैः । एवं कृत्वा व्रतं विप्र भुक्त्वा भोगानिहेप्सितान् ॥६१॥ दश पूर्वान्दश परात्समुद्धृत्य व्रजेद्धरिम् । पौषस्य कृष्णैकादश्यां सफलां समुपोष्य वै ॥ द्वादश्याञ्च्युतं प्रार्च्य सर्वैरुपचारकैः ॥६२॥ संभोज्य विप्रान्मधुरैर्विसृजेत्लब्धदक्षिणान् । एवं कृत्वा व्रतं विप्र सफलाया विधानतः ॥६३॥ भुक्त्वेह भोगानखिलांश्चात्यन्ते वैष्णवं पदम् । पौषस्य शुक्लकादश्यां पुत्रदां समुपोष्य वै ॥६४॥ द्वादश्यां विष्णुं प्रार्चेदर्थ्याद्यैरुपचारकैः । ततः संभोज्य विप्राग्र्यान्दत्त्वा तेभ्यस्तु दक्षिणाम् ॥६५॥ विसृज्य स्वयमश्नीयाच्छेषान्नं स्वेष्टबांधवैः । एवं कृतव्रतो विप्र भुक्त्वा भोगानिहेप्सितान् ॥६६॥ विमानवरमारुह्य यास्यते हरिमंदिरम् । माघस्य कृष्णैकादश्यां षट्तिलां समुपोष्य वै ॥६७॥ स्नात्वा दत्त्वा तर्पयित्वा हुत्वा भुक्त्वा समर्च्य च । तिलैरेव द्विजश्रेष्ठ द्वादश्यां प्रातरेव हि ॥६८॥ वैकुण्ठं समथाभ्यर्च्य सर्वैरुपचारकैः । द्विजान्संभोज्य विसृजेद्दत्त्वा तेभ्यश्च दक्षिणाम् ॥६९॥ एवं कृत्वा व्रतं विप्र विधिना सुसमाहितः । भुक्त्वेह वांछितान्भोगानंते विष्णुपदं लभेत् ॥७०॥ माघस्य शुक्लैकादश्यां समुपोष्य जयाह्वयाम् । प्रातर्हरिनिवेद्याभ्यर्च्यच्छ्रीपतिं पुरुषं द्विज ॥७१॥ भोजयित्वा दक्षिणां च दत्त्वा विप्रान्विसृज्य च । स्वयं भुञ्जीत तच्छेषं प्रयतो निजबांधवैः ॥७२॥


है । मार्ग-शुक्ल-एकादशी मोक्षा कहलाती है । उस दिन उपवास करते हुए प्रातःकाल द्वादशी में सकल उपचारों से विश्वात्मा अनंत की अर्चना करे । पश्चात् ब्राह्मणों को खिलाकर दक्षिणापूर्वक उन्हें बिदा करके भाई-बन्धुओं के साथ स्वयं भोजन करे । विप्र ! जो इस प्रकार मोक्षाव्रत करता है, वह ऐहलौकिक वांछित भोगों को भोगकर दश पूर्वपुरुषों और दश भावी वंशजों का उद्धार करके हरिलोक को जाता है। पौष-कृष्ण-एकादशी का नाम सफला है ॥५७-६१॥ उस दिन उपवास करते हुए द्वादशी में समस्त उपचारों से अच्युत की पूजा कर ब्राह्मणों को मधुर खिलाये पश्चात् दक्षिणा देकर उन्हें बिदा करे । विप्र ! इसप्रकार जो विधि पूर्वक सफलाव्रत करता है, वह ऐहलौकिक सकल भागों को भोग कर अंत में वैकुंठ को जाता है। पौष-शुक्ल-एकादशी का नाम पुत्रदा है। उस दिन उपवास करते हुए द्वादशी में अर्घ्य आदि उपचारों से विष्णु की अर्चना करे । तदनन्तर उत्तम ब्राह्मणों को खिलाकर उन्हें दक्षिणा देकर विदा करे और उनसे बचे अन्न को इष्ट मित्रों के साथ स्वयं भोजन करे । विप्र ! जो इसप्रकार व्रत संपन्न करता है, वह इस लोक में अभिलषित भोगों को भोगकर अंत में उत्तम विमान से विष्णु- लोक को जाता है ॥६२-६६॥ माघ-कृष्ण-एकादशी का नाम षट्तिला है, उस दिन उपवास करते हुए स्नान, दान, तर्पण, हवन, तथा अर्चना करे । द्विजश्रेष्ठ ! द्वादशी में प्रातःकाल तिल तथा अन्य समस्त उपचारों से विष्णु की पूजा कर द्विजों को खिलाकर दक्षिणापूर्वक उन्हें बिदा करे । विप्र ! इस प्रकार सावधानी से विधिपूर्वक व्रत करने वाला व्यक्ति इस लोक में अभिलषित भोगों को भोग कर अन्त में वैकुण्ठ को जाता है। माघ-शुक्ल-एकादशी का नाम जया है । उस दिन उपवास करते हुए प्रातःकाल द्वादशी में पुरुषोत्तम विष्णु की अर्चना कर विप्रों को भोजन कराये । पश्चात् उन्हें दक्षिणापूर्वक विदा करके उनसे बचे अन्न को अपने भाई बन्धुओं के साथ स्वयं भोजन करे । विप्र !