बृहन्नारदीय पुराण (संस्कृत मूल व हिन्दी व्याख्या)
Brihan Naradiya Purana with Sanskrit & Hindi Commentary
महर्षि व्यास द्वारा
स्रोत: चौखम्बा संस्कृत संस्थान · चौखम्बा संस्कृत संस्थान (उद्गम)
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संदर्भ में पढ़ें६५८ नारदीयपुराणम् य एवं कुरुते विप्र व्रतं केशवतोषणम् । स भुक्त्वेह वरान्भोगानंते विष्णोः पदं व्रजेत् ॥७३॥ तपस्यकृष्णेकादश्यां विजयां समुपोष्य वै । द्वादश्यां प्रातरभ्यर्च्य योगीशं गंधपूर्वकैः ॥७४॥ ततः संभोज्य भूदेवान्दक्षिणाभिः प्रतोष्य तान् । विसृज्य बांधवैः सार्द्धं स्वयमश्नीयायतः ॥७५॥ एवं कृतव्रतो मर्त्यो भुक्त्वा भोगानिहेप्सितान् । देहांते वैष्णवं लोकं याति देवैः सुसत्कृतः ॥७६॥ फाल्गुनस्य सिते पक्षे एकादश्यां द्विजोत्तम । उपोष्यामलकीं भक्त्या द्वादश्यां प्रातरर्चयेत् ॥७७॥ पुण्डरीकाक्षमखिलैरुपचारैस्ततो द्विजान् । भोजयित्वा वरान्नेन दद्यात्तेभ्यस्तु दक्षिणाम् ॥७८॥ एवं कृत्वा विधानेनामलक्यां पूजनादिकम् । सितेकादश्यां तपस्ये व्रजेद्विष्णोः परं पदम् ॥७९॥ चैत्रस्य कृष्णैकादश्यां पापमोचनिकां द्विज । उपोष्य द्वादश्यां प्रातर्गोविंदं पूजयेत्तथा ॥८०॥ उपचारैः षोडशभिर्द्विजान्संभोज्य दक्षिणाम् । दत्त्वा तेभ्यो विसृज्याय स्वयं भुंजीत बान्धवैः । ८१॥ एवं यः कुरुते विप्र पापमोचनिकाव्रतम् । स याति वैष्णवं लोकं विमानेन तु शाश्वता ॥८२॥ इत्थं कृष्णे तथा शुक्ले व्रतं चैकादशीभवम् । मोक्षदं कीर्तितं द्विज नास्त्यस्मिन्संशयः क्वचित् ॥८३॥ यतस्त्रिदिनसंसाध्यं कीर्तितं पापनाशनम् । सर्वव्रतोत्तमं द्विज ततो ज्ञेयं महाफलम् ॥८४॥ त्यजेच्चत्वारि भुक्तानि नारदैतद्दिनत्रये । आद्यंतयोरनेकमेकं मध्यमे द्वयमेव हि ॥८५॥ अथ ते नियमान्वच्मि व्रते ह्यस्मिन्दिनत्रये । कांस्यं मांसं मसूरात्नं चणकान्कोद्रवांस्तथा ॥८६॥ शाकं मधु परान्नं च पुनर्भाजनमैथुने । दशम्यां दश वस्तूनि वर्जयेद्वैष्णवः सदा ॥८७॥ द्यूतक्रीडां च निद्रां च तांबूलं दंतधावनम् । परापवादं पैशुन्यं स्तेयं हिंसां तथा रतिम् ॥८८॥ जो इसप्रकार केशव को संतुष्ट करने वाले व्रत को करता है वह इस लोक में उत्तम भोगों को भोग कर अन्त में वैकुण्ठ को जाता है ॥६७-७३॥ फाल्गुन-कृष्ण-एकादशी का नाम विजया है । उस दिन उपवास करते हुए द्वादशी में प्रातःकाल ही गंध आदि उपचारों से योगेश्वर विष्णु की आराधना कर ब्राह्मण-भोजन कराये । पश्चात् उन्हें दक्षिणा से संतुष्ट कर विदा करके बांधवों के साथ वाक्संयमपूर्वक स्वयं भोजन करे । इस तरह व्रत करने वाला मानव ऐहलोकिक वांछित भोगों को भोग कर देहांत में देवसंमानित होते हुए विष्णुलोक को जाता है । द्विजवर्य ! फाल्गुन-शुक्ल-एकादशी का नाम आमलकी है । उस दिन उपवास करते हुए द्वादशी में प्रातःकाल निखिल उपचारों से पुंडरीकाक्ष की अर्चना कर ब्राह्मणों को उत्तम अन्न खिलाये । पश्चात् उन्हें दक्षिणा देकर विदा करे । इसप्रकार आमलकीव्रत करके विधि- पूर्वक पूजन आदि करने से मनुष्य विष्णु के परम पद को प्राप्त करता है । चैत्र-कृष्ण-एकादशी करने से पापों का नाश होता है ॥७४-८२॥ विप्र ! शुक्लपक्ष तथा कृष्णपक्ष का एकादशीव्रत मोक्षदायक है, इसमें संशय नहीं करना चाहिये । द्विज ! इसलिये यह व्रत तीन दिनों में किया जाता है इसलिये यह पापनाशक तथा महाफलदायक माना गया है । नारद ! इन तीन दिनों में चार समय का भोजन परित्याग कर दे । प्रथम दिन तथा अंतिम दिन एक-एक संध्या भोजन छोड़े; परन्तु बीच के दिन दोनों संध्या भोजन न करे ॥८३-८५॥ अब मैं इस दिनत्रयात्मक व्रत के नियमों को तुमसे बता देता हूँ। कांस्यपात्र, मांस, मसूर, चना, कोदों, शाक, मधु, परान्न, पुनर्भाजन तथा मैथुन - इन दश वस्तुओं को वैष्णव जन दशमी के दिन बिलकुल त्याग दे । जुआ, निद्रा, तांबूल, दंतधावन, परनिंदा, चुगली, चोरी, हिंसा, रति, क्रोध, और मिथ्याभाषण - इनको एकादशी के