बृहन्नारदीय पुराण (संस्कृत मूल व हिन्दी व्याख्या)
Brihan Naradiya Purana with Sanskrit & Hindi Commentary
महर्षि व्यास द्वारा
स्रोत: चौखम्बा संस्कृत संस्थान · चौखम्बा संस्कृत संस्थान (उद्गम)
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संदर्भ में पढ़ेंएकविंशत्यधिकशततमोऽध्यायः ६५६ कोपं ह्यनृतवाक्यं च एकादश्यां विवर्जयेत् । कांस्यं मांसं सुरां क्षौद्रं तैलं विणम्लेच्छभाषणम् ॥८६॥ व्यायामं च प्रवासं च पुनर्भोजनमैथुने । अस्पृश्यस्पर्शमाशूरे द्वादश्यां द्वादश त्यजेत् ॥८७॥ एवं नियमकृद्विप्र उपवासं समाचरेत् । शक्तोऽशक्तस्तु मतिमानेकभुक्तं न नक्तकम् ॥८८॥ अयाचितं वापि चरेन्न त्यजेद्व्रतमीदृशम् । इति श्रीबृहन्नारदीयपुराणे पूर्वभागे बृहदुपाख्याने चतुर्थभागे द्वादशमासस्थितै- कादशीव्रतकथनं नाम विशत्यधिकशततमोऽध्यायः ॥१२०॥
एकविंशत्यधिकशततमोऽध्यायः सनातन उवाच अथ व्रतानि द्वादश्याः कथयामि तवानघ । यानि कृत्वा नरो लोके विष्णोः प्रियतरो भवेत् ॥१॥ चैत्रस्य शुक्लद्वादश्यां मदनव्रतमाचरेत् । स्थापयेद्व्रणं कुम्भं सिततंदुलपूरितम् ॥२॥ नानाफलयुतं तद्वदिक्षुदण्डसमन्वितम् । सितवस्त्रयुगच्छन्नं सितचंदनचर्चितम् ॥३॥ नानाभक्ष्यसमोपेतं सहिरण्यं स्वशक्तितः । ताम्रपात्रं गुडोपेतं तस्योपरि निवेशयेत् ॥४॥
के दिन छोड़ दे । कांस्यपात्र, मांस, मदिरा, मधु, तेल, धूर्त तथा म्लेच्छ के साथ भाषण, व्यायाम, परदेशगमन, पुनर्भाजन, मैथुन, अस्पृश्यों का स्पर्श तथा मसूर-इन बारह चीजों को द्वादशी के दिन छोड़ देना चाहिए । विप्र ! समर्थ पुरुष उपर्युक्त नियमों से युक्त होकर उपवास करे । जो असमर्थ हो वह एकभुक्त करे; किन्तु रात्रि में भोजन न करे । अथवा अयाचित वस्तु को खाये । परन्तु ऐसे व्रत का त्याग न करे ॥८६-९२॥ श्री नारदीयपुराण के पूर्वार्ध में बृहदुपाख्यानयुक्त चतुर्थपाद में द्वादश-मास-स्थित-एकादशीव्रत-कथन नामक एक सौ बीसवां अध्याय समाप्त ॥१२०॥
अध्याय १२१ बारह मासों का द्वादशीव्रत सनातन बोले-निष्पाप ! अब मैं तुमसे द्वादशी-व्रतों के संबन्ध में कहूँगा, जिनके अनुष्ठान से मनुष्य इस लोक में विष्णु का प्रिय होता है। चैत्र-शुक्ल-द्वादशी में मदनव्रत करना चाहिये । उस दिन उपवास करते हुए उजले चावल से परिपूर्ण तथा अनेक फलों और इक्षुदंडों से युक्त अखंड घट को स्थापित कर एक जोड़े स्वच्छ वस्त्रों से उसे आच्छादित करे। फिर श्वेत चंदन, अनेक भक्ष्यपदार्थ तथा अपनी शक्ति के अनुसार सुवर्ण