बृहन्नारदीय पुराण (संस्कृत मूल व हिन्दी व्याख्या)
Brihan Naradiya Purana with Sanskrit & Hindi Commentary
महर्षि व्यास द्वारा
स्रोत: चौखम्बा संस्कृत संस्थान · चौखम्बा संस्कृत संस्थान (उद्गम)
पृष्ठ 979, कुल 1008 में से
संदर्भ में पढ़ें६६० नारदीयपुराणम् तत्र संपूजयेद्देवं कामरूपिणमच्युतम् । गंधाद्यैश्चोपचारैस्तु सोपवासो परेऽहनि ॥५॥ पुनः प्रातः समभ्यर्च्य ब्राह्मणाय निवेदयेत् । ब्राह्मणान्भोजयेच्चैव तेभ्यो दद्याच्च दक्षिणाम् ॥६॥ वर्षमेवं व्रतं कृत्वा घृतधेनुसमन्विताम् । शय्यां तु दद्याद्गुरवे सर्वोपस्करसंयुताम् ॥७॥ कांचनं कामदेवं च शुक्लां गां च पयस्विनीम् । वासोभिर्द्विजदांपत्यं पूजयित्वा समर्पयेत् ॥८॥ प्रीयतां कामरूपो मे हरिरित्येवमुच्चरन् । यः कुर्याद्विधिनानेन मदनद्वादशीव्रतम् ॥६॥ स सर्वपापनिर्मुक्तः प्राप्नोति हरिसाम्यताम् । अस्यामेव समुद्दिष्टं भर्तृद्वादशिकव्रतम् ॥१०॥ स्वास्तृतां तत्र शय्यां तु कृत्वात्र श्रीयुतं हरिम् । संस्थाप्य मंडपं पुष्पैस्तदुवर्येवोपक्लयपेत् ॥११॥ ततः संपूज्य गंधाद्यैर्व्रती जागरणं निशि । नृत्यवादित्रगीताचैस्ततः प्रातः परेऽहनि ॥१२॥ सशय्यं श्रीहरिं हैमं द्विजाग्र्याय निवेदयेत् । द्विजान्संभोज्य विसृजेद्दक्षिणाभिः प्रतोषितान् ॥१३॥ एवं कृतव्रतस्यापि दांपत्यं जायते स्थिरम् । सप्तजन्मसु भुंक्ते च भोगान् लोकद्वयेप्सितान् ॥१४॥ वैशाखशुक्लद्वादश्यां सोपवासो जितेंद्रियः । संपूज्य माधवं भक्त्या गंधाद्यैश्चोपचारकैः ॥१५॥ पक्वान्नं तृप्तिजनकं मधुरं सोदकुम्भकम् । विप्राय दद्याद्विधिवन्माधवः प्रीयतामिति ॥१६॥ द्वादश्यां ज्येष्ठशुक्लायां पूजयित्वा त्रिविक्रमम् । गंधाद्यैर्मधुरान्नाढ्यं करकं विनिवेदयेत् ॥१७॥ व्रती द्विजाय तत्पश्चादेकभक्तं समाचरेत् । व्रतेनानेन संतुष्टो देवदेवस्त्रिविक्रमः ॥१८॥ ददाति विपुलाभ्रोगानंते मोक्षं च नारद । आषाढशुक्लद्वादश्यां द्विजान्दशैव भोजयेत् ॥१९॥ मधुरान्नेन तान्पूज्य पृथग्गंधादिकै क्रमात् । तेभ्यो वासांसि दंडांश्च ब्रह्मसूत्राणि मुद्रिकाः ॥२०॥
उसमें डालकर गुड़युक्त ताम्रपात्र उसके ऊपर रखे। उस पात्र में गंध आदि उपचारों से कामरूपी अच्युत की पूजा कर दूसरे दिन प्रातःकाल पुनः अर्चना करके घट ब्राह्मण को दे दे। ब्राह्मणों को भोजन कराकर उन्हें दक्षिणा दे ॥१-६। एक वर्ष इस प्रकार व्रत करके घृतधेनु सहित सोपकरण शय्या गुरु को समर्पित करे। यथा- शक्ति द्विज-दंपति की पूजा कर "कामरूपी हरि मेरे ऊपर प्रसन्न हों" यह कहते हुए कामदेव की स्वर्णमयी प्रतिमा तथा उजली दुधार गौ उन्हें समर्पण करे। जो व्यक्ति इस विधि से मदन द्वादशी-व्रत करता है, वह समस्त पापों से मुक्त होकर हरि के सादृश्यमोक्ष को प्राप्त करता है। उसी दिन भर्तृ द्वादशिकाव्रत भी किया जाता है। सुन्दर ढंग से बिछाई हुई शय्या पर लक्ष्मी सहित हरि को स्थापित कर ऊपर पुष्पों का मंडप बनाये। तदनन्तर गंध आदि से उनकी पूजाकर व्रती नृत्य, गीत, वाद्य आदि से रात्रि में जागरण करे। दूसरे दिन प्रातःकाल चांदी सहित सुवर्ण की विष्णु-प्रतिमा उत्तम ब्राह्मण को दे दे। विप्रों को खिलाकर दक्षिणापूर्वक उन्हें विदा करे। इस प्रकार व्रत करने वाला व्यक्ति स्थायी दांपत्य को प्राप्ति करता है तथा सात जन्मों तक दोनों लोक के अभीष्ट भोगों को भोगता है ॥७-१४॥ वैशाख-शुक्ल-द्वादशी में उपवास तथा इंद्रियसंयम करते हुए गंध आदि उपचारों से भक्तिपूर्वक माधव की पूजा कर 'माधव प्रसन्न हों' यह कहते हुए जलपूर्ण घट, मधुर तथा तृप्तिजनक पक्वान्न विप्र को प्रदान करे। ज्येष्ठ-शुक्ल-द्वादशी में गंध आदि से त्रिविक्रम की पूजा कर ब्राह्मण को मिष्टान्न खिलाये और स्वयं एक भुक्त करे। नारद ! इस व्रत से संतुष्ट होकर देवस्वामी त्रिविक्रम विपुल भोग तथा अन्त में मोक्ष भी देते हैं। आषाढ़-शुक्ल-द्वादशी में दश विप्रों को मधुर खिलाकर गंध आदि से पूजन करे। पश्चात् 'विष्णु मेरे ऊपर प्रसन्न हों' यह कहते हुए उन्हें वस्त्र, दंड, यज्ञोपवीत तथा मुद्रिका प्रदान करे ॥१५-२०॥ श्रावण-शुक्ल-द्वादशी में व्रती