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भारतकोश
बृहन्नारदीय पुराण (संस्कृत मूल व हिन्दी व्याख्या)

बृहन्नारदीय पुराण (संस्कृत मूल व हिन्दी व्याख्या)

Brihan Naradiya Purana with Sanskrit & Hindi Commentary

महर्षि व्यास द्वारा

स्रोत: चौखम्बा संस्कृत संस्थान · चौखम्बा संस्कृत संस्थान (उद्गम)

DevanagariSanskritpublished1,008 पृष्ठ

पृष्ठ 980, कुल 1008 में से

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पृष्ठ 980

एकविंशत्यधिकशततमोऽध्यायः ६६१ पात्राणि च ददेद्भक्त्या विष्णुर्मे प्रीयतामिति । द्वादश्यां तु नभःशुक्ले श्रीधरं पूजयेद्व्रती ॥२१॥ गन्धायैस्तत्परो भक्त्या दधिभक्तैर्द्विजोत्तमान् । संभोज्य दक्षिणां रौप्यां दत्त्वा नत्वा विसर्जयेत् ॥२२॥ व्रतेनानेन देवेशः श्रीधरः प्रीयतामिति । द्वादश्यां नभस्यशुक्ले व्रती संपूज्य वामनम् ॥२३॥ तदग्रे भोजयेद्विप्रान्पयसैर्द्वादशैव च । सौवर्णां दक्षिणां दत्त्वा विष्णुप्रीतिकरो भवेत् ॥२४॥ द्वादश्यामिश्व शुक्लायां पद्मनाभं समर्चयेत् । गन्धाद्यैरुपचारैस्तु तदग्रे भोजयेद्विजान् ॥२५॥ मधुरान्नैन वस्त्राढ्यां सौवर्णां दक्षिणां ददेत् । व्रतेनैतेन संतुष्टः पद्मनाभो द्विजोत्तम ॥२६॥ श्वेतद्वीपर्गात दद्याद्देहभोगांश्च वांच्छितान् । कार्तिके कृष्णपक्षे तु गोवत्सद्वादशीव्रतम् ॥२७॥ तत्र वत्सयुतां गां तु समालिख्य सुगन्धिभिः । चंदनाद्यैस्तथा पुष्पमालाभिः प्राच्य ताम्रके ॥२८॥ पात्रे पुष्पाक्षततिलैरर्घ्यं कृत्वा विधानतः । प्रदद्यात्पादमूलेऽस्या मन्त्रेणानेन नारद ॥२९॥ क्षीरोदार्णवसंभूते सुरासुरनमस्कृते । सर्वदेवमये देवि सर्वदेवैरंलंकृते ॥३०॥ मातर्मातर्गवां मातर्गृहाणार्घ्यं नमोऽस्तु ते । ततो माषादिसंसिद्धान्वटकांश्च निवेदयेत् ॥३१॥ एवं पञ्च दशैकां वा यथाविभवमात्मनः । सुरभि त्वं जगन्माता नित्यं विष्णुपदे स्थिता ॥३२॥ सर्वदेवमये ग्रासं मया दत्तममं ग्रस । सर्वदेवमये देवि सर्वदेवैरंलंकृते ॥३३॥ मातर्ममाभिलषितं सफलं कुरु नंदिनी । तद्दिने तैलपक्वं च स्थालीपक्वं द्विजोत्तम ॥३४॥ गोक्षीरं गोघृतं चैव दधि तक्रं च वर्जयेत् । द्वादश्यामूर्जशुक्लायां देवं दामोदरं द्विज ॥३५॥ समभ्यर्च्योपचारैस्तु गन्धाद्यैः सुसमाहितः । तदग्रे भोजयेद्विप्रान्पक्वान्नैर्नार्कसंख्यकान् ॥३६॥ ततः कुंभानपूर्णांन्वस्त्राच्छन्नान्सपूगिकान् । सपूगमोदकस्वर्णां स्तेभ्यः प्रीत्या समर्पयेत् ॥३७॥ एवं कृते प्रियो विष्णोर्जायतेऽखिलभोगभुक् । देहांते विष्णुसायुज्यं लभते नात्र संशयः ॥३८॥ गंध आदि से भक्तिपूर्वक श्रीधर की पूजा कर उत्तम ब्राह्मणों को दही और भात खिलाये । अनन्तर इस व्रत से 'देवेश श्रीधर प्रसन्न हों' यह कहते हुए उन्हें चाँदी दक्षिणा दे और नमस्कार करके विदा करे । भाद्र-शुक्ल- द्वादशी में वामन की पूजा कर उनके आगे बारह विप्रों को खीर का भोजन कराये । पश्चात् उन्हें दक्षिणा देकर विदा करे । इससे विष्णु प्रसन्न होते हैं । आश्विन-शुक्ल-द्वादशी में गंध आदि उपचारों से पद्मनाभ की अर्चना कर ब्राह्मणों को मधुर खिलाये । अनन्तर उन्हें वस्त्र तथा सुवर्ण दक्षिणा देकर विदा करे । द्विजश्रेष्ठ ! इस व्रत से संतुष्ट होकर पद्मनाभ श्वेतद्वीप का निवास तथा वांछित शरीर-भोग देते हैं ॥२१-२६॥। कार्तिक- कृष्णपक्ष में गोवत्सद्वादशीव्रत करना चाहिये । उस दिन सवत्सा गौ की आकृति लिखकर पुष्पमाला तथा सुगंधित चंदन आदि द्रव्यों से उनकी पूजा करे । तदनन्तर ताम्रपात्र में अक्षत, तिल तथा जल रख कर 'क्षीरोदार्ण- वसम्भूते......ते' यह मंत्र पढ़ते हुए गौ के चरणमूल में अर्घ्य दे । फिर अपनी शक्ति के अनुसार उड़द आदि के बने हुए पाँच या ग्यारह बड़े गौ को खिलाये । ग्रास देने के समय यह मंत्र पढ़ना चाहिये—"सुरभि ! ..... नंदिनि !" द्विजवर्य ! उस दिन तैलपक्व, स्थालोपक्व, गोदुग्ध, गोघृत एवम् दही-तक्र को भी छोड़ देना चाहिये । द्विज ! कार्तिक-शुक्ल-ददशी में समाहित होकर गंध आदि उपचारों से दामोदर देव की अर्चना कर उनके आगे बारह विप्रों को पकवान खिलाये । तदनन्तर जल से परिपूर्ण और वस्त्र से आच्छादित घट, सुपारी, लड्डू तथा सुवर्ण सहित ब्राह्मणों को आदरपूर्वक दे दे । ऐसा करने वाला व्यक्ति विष्णु का प्रिय तथा अखिल- भोगभोक्ता होकर देहान्त होने पर विष्णुसायुज्यमोक्ष को प्राप्त करता है, इसमें संशय नहीं ॥२७-३८॥ उस दिन १२१ ना० पु०