बृहन्नारदीय पुराण (संस्कृत मूल व हिन्दी व्याख्या)
Brihan Naradiya Purana with Sanskrit & Hindi Commentary
महर्षि व्यास द्वारा
स्रोत: चौखम्बा संस्कृत संस्थान · चौखम्बा संस्कृत संस्थान (उद्गम)
पृष्ठ 981, कुल 1008 में से
संदर्भ में पढ़ें३६२ गारुडीयपुराणम् नीराजनव्रतं चात्र गदितं तन्निबोध मे। सुप्तोत्थितं जगन्नाथमलंकृत्य निशामुखे ॥३९॥ अलंकृतौ नवं वह्निमुपवासाच्चरेन् मन्त्रतः। हुत्वा तन्न समुद्दीप्ते रौप्यदीपिकया बुधे ॥४०॥ गन्धपुष्पार्चितया जननींराजयेद्धरिम्। सर्वैवानुगतां लक्ष्मीं ब्रह्माणीं चन्द्रिकां तथा ॥४१॥ आदित्यं शंकरं गौरीं यक्षं गणपतिं महान्। मातृः पितॄन्नगांस्तान्सर्वान्नीराजयेत्क्रमात् ॥४२॥ गवां नीराजनं कुर्यान्महिष्यादेश्च मंडलम्। नमो जयेति शब्दैश्च घंटाशंखादिभिःस्वनैः ॥४३॥ सिंदूरारुणशृङ्गाणां चित्राङ्गाणां च वर्णकैः। गवां कोलाहले वृत्ते नीराजनमहोत्सवे ॥४४॥ तुरगांल्लक्षणोपेतान् गजांश्च मदविप्लुतान्। राजचिह्नानि सर्वाणि च्छत्रादीनि च नारद ॥४५॥ राजा पुरोधसा सार्धं मंत्रिभृत्यपुरःसरः। पूजयित्वा यथान्यायं नीराजय्य क्षणद्वयात् ॥४६॥ शंखतूर्यादिघोषैश्च नानारत्नविनिर्मिते। सिंहासने नवे क्लृप्ते तिष्ठेत्सम्यगलंकृतः ॥४७॥ ततः सुलक्षणेयुक्ता वेश्या वाप्य कुलाङ्गना। शीर्षापरि नरेंद्रस्य तथा नीराजयेच्छनैः ॥४८॥ एवमेषा महाशांतिः कर्तव्या प्रतिवत्सरम्। राज्ञा वित्तवतान्थेन वर्षमारोग्यमिच्छता ॥४९॥ येषां राष्ट्रे पुरे ग्रामे क्रियते शांतिरुत्तमा। नीराजनाभिधा विप्र तद्रोगा यान्ति संक्षयम् ॥५०॥ द्वादश्यां मार्गशुक्लायां साध्यव्रतमनुत्तमम्। मनोभवस्तथा प्राणो नरो यातश्च वीर्यवान् ॥५१॥ चितिर्हयो नृपश्चैव हंसो नारायणस्तथा। विभुश्चापि प्रभुश्चैव साध्या द्वादश कीर्तिताः ॥५२॥ पूजयेद्गन्धपुष्पाद्यैरेतांस्तंडुलकल्पितान् । ततो द्विजान्भोजयित्वा द्वादशान् सुदक्षिणान् ॥५३॥ दत्त्वा तेभ्यस्तु विसृजेत्प्रीयान्नारायणस्त्विति। एतस्यामेव विहितं द्वादशादित्यसंज्ञितम् ॥५४॥ नीराजन व्रत भी किया जाता है, उसके बारे में मुझसे सुनो। सोकर उठे जगन्नाथ को प्रदोषकाल में अलंकृत कर मंत्रपूर्वक अग्नि की पूजा करे। तदनन्तर गंध, पुष्प आदि से अर्चित रजतदीपिका से अग्नि जला कर उसमें हवन करे। फिर हरि तथा उनका अनुगमन करने वाली लक्ष्मी, ब्रह्माणी, चन्द्रिका, आदित्य, शंकर, गौरी, यक्ष, गणपति, ग्रह, मातृगण, पितर, नगों एवम् नागों की आरती करे। गायों की आरती तथा भैंस आदि की प्रदक्षिणा करे। घंटा, शंख आदि को बजाये। नमः शब्द तथा जयशब्द का उच्चारण करे। गौओं के सींगों में सिंदूर लेपे और उनके अंगों को गेरु आदि से चित्रित करे। इस तरह नीराजन महोत्सव में जब गौओं का कोलाहल होने लगे तब राजा, मंत्री, पुरोहित तथा भृत्यों के साथ सुलक्षण अश्वों, मदस्नात गजों तथा छत्र आदि समस्त राज- चिह्नों का यथोचित पूजन करे ॥३९-४६॥ पश्चात् शंख, ढोल आदि के बजते रहने पर सम्यक् प्रकार अलंकृत राजा अनेक रत्नों के बने नवीन सिंहासन पर बैठ कर सुलक्षणा वेश्या वा कुलांगना से अपने सिर पर शनैः-शनैः आरती उतरवाये। आरोग्य के इच्छुक नृप तथा अन्य धनशाली व्यक्ति को इस तरह की यह महाशांति प्रतिवर्ष करनी चाहिये। विप्र ! जिस राष्ट्र, नगर तथा गाँव में यह उत्तमा नीराजना शांति की जाती है, वहाँ रोगों का क्षय होता है। अगहन-शुक्ल-द्वादशी में अत्युत्तम साध्यव्रत करना चाहिये। मनोभव, प्राण, नर, यात, वीर्यवान्, चिति, हय, नृप, हंस, नारायण, विभु तथा प्रभु--ये बारह साध्य कहलाते हैं। तंदुल की बनाई हुई इनकी प्रतिमाओं का गंध, पुष्प आदि से पूजन कर बारह ब्राह्मणों को भोजन कराये, पश्चात् उन्हें अच्छी दक्षिणा देकर 'नारायण प्रसन्न हों' यह कहते हुए विदा करे। उसी दिन द्वादशादित्य नामक व्रत भी किया जाता है। उसमें धीमान् व्यक्ति बारह आदित्यों की अर्चना करे। धाता, मित्र, अर्यमा, पूषा, शक्र, अंश, वरुण, भग, त्वष्टा, विवस्वान्