बृहन्नारदीय पुराण (संस्कृत मूल व हिन्दी व्याख्या)
Brihan Naradiya Purana with Sanskrit & Hindi Commentary
महर्षि व्यास द्वारा
स्रोत: चौखम्बा संस्कृत संस्थान · चौखम्बा संस्कृत संस्थान (उद्गम)
पृष्ठ 982, कुल 1008 में से
संदर्भ में पढ़ेंएकविंशत्यधिकशततमोऽध्यायः ३६३ व्रतं तत्राऽर्चयेद्धीमानादित्यान्द्वादशापि च । धाता मित्रोऽर्यमा पूषा शक्रोऽशो वरुणो भगः ॥५५॥ त्वष्टा विवस्वान्सविता विष्णुश्चैवांश ईरिताः । प्रतिमासं तु शुक्लायां द्वादश्यामर्र्च्य यत्नतः ॥५६॥ दद्यां नयेद्व्रतान्ते तु प्रतिमा द्वादशापि च । हैमीः संपूज्य विधिना भोजयित्वा द्विजोत्तमान् ॥५७॥ मधुराम्नैः सुसत्कृत्य प्रत्येकं चार्पयेद्व्रती । एवं व्रतं नरः कृत्वा द्वादशादित्यसंज्ञकम् ॥५८॥ सूर्यलोकं समासाद्य भुक्त्वा भोगान्निरं ततः । जायते भुवि धर्मात्मा मानुष्ये रोगवर्जितः ॥५९॥ ततो व्रतस्य पुण्येन पुनरेव लभेद्रतम् । तत्पुण्येन रवेर्भित्त्वा मंडलं द्विजसत्तम ॥६०॥ निरंजनं निराकारं निर्द्वंद्वं ब्रह्म चाप्नुयात् । अथाऽर्वाऽखंडसंशं च व्रतमुक्तं द्विजोत्तम ॥६१॥ मूर्ति विधाय सौवर्णी जनार्दनसवाहनाम् । अभ्यर्च्य गन्धपुष्पाद्यैस्तदग्रे भोजयेद्विजान् ॥६२॥ कृत्वा प्रतिमासं तु नक्ताशीः स्याज्जितेन्द्रियः । ततः समाप्ते तां मूर्तिं समभ्यर्च्य विधानतः ॥६३॥ गुरवे धेनुसहितां दद्यात्सं प्रार्थयेत्तथा । शतजन्मसु यत्किंचिन्मयाऽखंडव्रतं कृतम् ॥६४॥ सत्वात्सत्वप्रसादेन तन्मेऽखंडमिहास्तु मे । ततः संभोज्य विप्रान्यान्खण्डाढ्यैस्तु पायसैः ॥६५॥ द्वादशैव हि सौवर्णीं दक्षिणां प्रददेन्नमेत् । इति कृत्वा व्रतं विप्र प्रीणयित्वा जनार्दनम् ॥६६॥ सौवर्णेन विमानेन याति विष्णोः परं पदम् । पौषस्य कृष्णद्वादश्यां रूपव्रतमुदीरितम् ॥६७॥ दशम्यां विधिवत्स्नात्वा गृहीत्वाऽगोमयं व्रती । श्वेताया वैकवर्णाया अंतरिक्षणतं द्विज ॥६८॥ अष्टोत्तरशतं तेन पिण्डिकाः कल्प्य नारद । शोषयेदातपे धृत्वा पात्रे ताम्रऽथ मृन्मये ॥६९॥ एकादश्यां दिनोपवासः समभ्यर्च्य विधानतः । सौवर्णीं प्रतिमां विष्णोविशायां जागरं चरेत् ॥७०॥ सविता तथा विष्णु-ये बारह आदित्य कहे गये हैं ॥४७-५५३॥ प्रत्येक मास की शुक्ल-द्वादशी में इनकी बारह स्वर्णमयी प्रतिमाओं का यत्नपूर्वक पूजन कर बारह उत्तम ब्राह्मणों को मधुर भोजन कराये । प्रत्येक को आदर- पूर्वक एक-एक प्रतिमा समर्पित करे । इस प्रकार द्वादशादित्यव्रत करने वाला मानव सूर्य-लोक को जाता है । वहाँ चिरकाल तक अखिल भोगों को भोगकर पृथ्वी पर धर्मात्मा तथा नीरोग मनुष्य होकर जन्म लेता है । द्विजश्रेष्ठ ! तब व्रत के पुण्य से वह पुनः उस व्रत को प्राप्त करता है । फिर उसके धर्म रवि मंडल को भेद कर निरंजन, निराकार तथा निर्द्वन्द्व ब्रह्म को प्राप्त करता है । विप्रवर्य ! उस तिथि में अखंडव्रत भी किया जाता है ॥५६-६१॥ सुवर्ण की विष्णु-प्रतिमा बनाकर गंध, पुष्प आदि से पूजा करे । प्रतिमा के सामने ही बारह ब्राह्मणों को खिलाये । एक वर्ष तक उक्त तिथि में इन्द्रिय-संयम करते हुए केवल रात्रि में ही भोजन करे । वर्षान्त में विधिपूर्वक प्रतिमा की अर्चना कर गुरु को धेनुसहित प्रतिमा दे दे । तदनन्तर प्रार्थना करे- "भगवन् ! सौ जन्मों में जो कुछ मैंने खंडव्रत किया है, वह आपकी कृपा से अखंड हो जाय ।" फिर बारह विप्रों को चीनी एवम् खीर खिलाकर सुवर्ण दक्षिणा देकर प्रणाम करे । विप्र ! जो व्यक्ति इस व्रत को करके जनार्दन को संतुष्ट करता है, वह स्वर्णमय विमान से वैकुण्ठ जाता है । पौष-कृष्ण-द्वादशी में रूपव्रत किया जाता है ॥६२-६७॥ व्रती दशमी तिथि में विधिवत् स्नान कर श्वेत गौ या एकवर्णीया गौ के गोबर के, जो भूमि पर गिरने से पहले ही थाम लिया गया हो, एक सौ आठ पिण्ड बनाये । उन पिंडों को ताँबे या मिट्टी के पात्र में रख कर धूप में सुखाये । एकादशी में उपवास करते हुए विष्णु की स्वर्णमयी प्रतिमा का विधानपूर्वक पूजन कर रात्रि में मांगलिक गीत, वाद्य, स्तोत्रपाठ तथा जप आदि से जागरण करे । प्रातःकाल द्वादशी में जलघट पर विल्वपात्र के ऊपर प्रतिमा