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भारतकोश
बृहन्नारदीय पुराण (संस्कृत मूल व हिन्दी व्याख्या)

बृहन्नारदीय पुराण (संस्कृत मूल व हिन्दी व्याख्या)

Brihan Naradiya Purana with Sanskrit & Hindi Commentary

महर्षि व्यास द्वारा

स्रोत: चौखम्बा संस्कृत संस्थान · चौखम्बा संस्कृत संस्थान (उद्गम)

DevanagariSanskritpublished1,008 पृष्ठ

पृष्ठ 983, कुल 1008 में से

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पृष्ठ 983

६६४ नारदीयपुराणम् सुमङ्गलैर्गीतवाद्यैः स्तोत्रपाठैर्जपादिभिः। ततः प्रभाते द्वादश्यां तिलपात्रोपरि स्थिताम् ॥७१॥ अंबुपूर्णे घटे न्यस्य पूजयेदुपचारकैः। ततोऽग्निं नवमुत्पाद्य काष्ठसंघर्षणादिभिः ॥७२॥ तं समभ्यर्च्य विधिवदेकेकां पिण्डिकां सुधीः। होमयेत्तिलसर्पिष्यां च द्वादशाक्षरविद्यया ॥७३॥ वैष्णव्याय च पूर्णी च शतधातोत्तरं शतम्। भोजयेत्पायसैर्विप्रान्प्रीत्या मुक्तिप्रदामनरः ॥७४॥ सहितां च घटेनैव प्रतिमां गुरवेऽर्पयेत्। विप्रेभ्यो दक्षिणां शक्त्या दत्त्वा नत्वा विसर्जयेत्। नरो वा यदि वा नारी व्रतं कुर्यादिमादरात् ॥७५॥ लभते रूपसौभाग्यं नात्र कार्या विचारणा। सहस्ये शुक्लपक्षे तु सुजन्म द्वादशीव्रतम् ॥७६॥ तत्र स्नात्वा विधानेन गृह्णीयाद्वार्षिकव्रतम्। पीत्वा गोशृङ्गवाय्वितो तां च कृत्वा प्रदक्षिणम् ॥७७॥ प्रतिमासं ततः शुक्ले द्वादश्यां दानमाचरेत्। घृतप्रस्थं लवणतुल्यं कमात्पूर्वार्यहेमस्य च ॥७८॥ द्विरक्तिकं हेम तिलाष्टकाढं पयसां घटम्। रौप्यस्य माषकैकं च तृप्तिकृन्मिष्टभक्षकम् ॥७९॥ छत्रं माषार्धहेमञ्च प्रस्थं फाणितमुत्तमम्। चन्दनं पलिकं वस्त्रं पञ्चहस्तीन्मितं तनुम् ॥८०॥ एवं तु मासिकं दानं कृत्वा प्राश्य यथाक्रमम्। गोमूत्रं जलमाज्यं वा पक्त्वा शाकं चतुर्विधम् ॥८१॥ दधियुक्तं यवान्नं च तिलाज्यं शर्कराऽन्वितम्। सर्पींशुक्षीरपुष्टितं प्राशनं प्रतिमासिकम् ॥८२॥ एवं कृतव्रतो वर्ष सौवर्णी प्रतिमां रवेः। कृत्वा वै ताम्रपात्रस्थां न्यस्याभ्यर्च्य विधानतः ॥८३॥ गुरवे धेनुसहितां प्रत्यर्प्य प्रणमेत्पुरः। विप्रान्द्वादश संभोज्य तेभ्यो दद्याच्च दक्षिणाम् ॥८४॥ एवं कृतव्रतो विप्र जन्माप्नोत्युत्तमे कुले। नीरोगो धनवान्धाढ्यो भवेच्चाविकलेंद्रियः ॥८५॥ माघस्य शुक्लद्वादश्यां शालग्रामशिलां द्विज। अभ्यर्च्य विधिवद्भक्त्या सुवर्णं तन्मुखे न्यसेत् ॥८६॥ तां स्थाप्य रौप्यपात्रे तु सितवस्त्रयुगावृताम्। प्रदद्याद्देशविदुषे तं हि संभोजयेत्ततः ॥८७॥ को स्थापित कर सोपचार पूजन करे। तदनन्तर काष्ठसंघर्षण से नवीन अग्नि उत्पन्न कर उसको विधिवत् अर्चना करे। फिर उस अग्नि में तिल-घृत सहित एक-एक पिंड को द्वादशाक्षर मंत्र से हवन करे। हवन के बाद प्रेम से ब्राह्मणों को खीर खिला कर घट सहित प्रतिमा गुरु को समर्पित कर दे। ब्राह्मणों को दक्षिणा दे नमस्कार करके विदा करे। नर या नारी जो कोई इस व्रत को आदर पूर्वक करेगा, उसका रूप एवम् सौभाग्य बढ़ेगा, इसमें विचार करने की आवश्यकता नहीं है ॥६८-७५३॥ पौष-शुक्ल में सुजन्म द्वादशीव्रत किया जाता है। उस दिन विधिवूवर्क स्नान कर वार्षिकव्रत करने का संकल्प करे। जल को गाय के सींग से छुआ कर पी ले। फिर उसकी प्रदक्षिणा कर प्रत्येक मास की शुक्ल-द्वादशी में दान करना आरंभ कर दे। एक सेर घी, चार सेर यव, दो तोले सोना, सवासेर तिल, एक घड़ा दूध, एक माशा चाँदी, तृप्तिजनक मिष्टान्न, छत्र, आधा माशा सोना, एक सेर उत्तम फाणित (राब) एक पल वजन का चंदन और पाँच हाथ सूक्ष्म वस्त्र मासिक क्रम से दान कर गोमूत्र, जल, घी, चार प्रकार के शाक, दही में पकाया हुआ यव, शक्कर युक्त तिल-घी, कुशोदक तथा दूध प्रत्येक मास में क्रमशः प्राशन करे। इस प्रकार सम्पूर्ण वर्ष तक व्रत करके सूर्य की सुवर्णमयी प्रतिमा को ताम्रपात्र में रख कर विधिवूवर्क पूजा करे। अनन्तर धेनुसहित वह प्रतिमा गुरु को समर्पित कर प्रणाम करे, बारह ब्राह्मणों को खिला कर दक्षिणा दे। विप्र! इस तरह व्रत करने वाला व्यक्ति उत्तम कुल में जन्म पाकर नीरोग, धन- धान्यसंपन्न तथा सुदृढ़ अंगों वाला होता है ॥७६-८५॥ माघ-शुक्ल-द्वादशी में विष्णुचिंतन-परायण व्यक्ति ऐहलौकिक वांछित भोगों को भोग कर वैकुण्ठ जाता