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भारतकोश
बृहन्नारदीय पुराण (संस्कृत मूल व हिन्दी व्याख्या)

बृहन्नारदीय पुराण (संस्कृत मूल व हिन्दी व्याख्या)

Brihan Naradiya Purana with Sanskrit & Hindi Commentary

महर्षि व्यास द्वारा

स्रोत: चौखम्बा संस्कृत संस्थान · चौखम्बा संस्कृत संस्थान (उद्गम)

DevanagariSanskritpublished1,008 पृष्ठ

पृष्ठ 984, कुल 1008 में से

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पृष्ठ 984

एकविंशत्यधिकशततमोऽध्यायः ६६५ पायसान्नेन खंडराज्यसहितेन हितेन च । एवं कृत्वैकभक्तः सन्विष्णुचितनतत्परः ॥८८॥ वैष्णवं लभते धाम भुक्त्वा भोगानिहेप्सितान् । अंत्ये सितायां द्वादश्यां सौवर्णी प्रतिमां हरेः ॥८९॥ अभ्यर्च्य गंधपुष्पाद्यैर्द्याद्वेदविदे द्विज । द्विषट्कसङ्ख्यान्विप्रांश्च भोजयित्वा च दक्षिणाम् ॥९०॥ दत्त्वा विसर्जयेत्पश्चात्स्वयं भुंजीत बांधवैः । त्रिस्पृशोन्मीलिनी पक्षवर्द्धिनी वंजुली तथा ॥९१॥ जया च विजया चैव जयंती चापराजिता । एता अष्टौ सदोपोष्या द्वादश्यः पापहारिकाः ॥९२॥ श्रीनारद उवाच कीदृशं लक्षणं ब्रह्मन्नेतासां किं फलं तथा । तत्सर्वं मे समाचक्ष्व याश्चान्याः पुण्यदायिकाः ॥९३॥ सूत उवाच इत्थं सनातनः पृष्टो नारदेन द्विजोत्तमः । प्रशस्य भ्रातरं प्राह महाभागवतं मुनिः ॥९४॥ सनातन उवाच साधु पृष्टं त्वया भ्रातः साधूनां संशयच्छिदा । वक्ष्ये महाद्वादशीनां लक्षणं च फलं पृथक् ॥९५॥ एकादशी निवृत्ता चेत्सूर्यस्योदयतः पुरा । तदा तु त्रिस्पृशा नाम द्वादशी सा महाफला ॥९६॥ अस्यामुपोष्य गोविंदं यः पूजयति नारद । अश्वमेधसहस्रस्य स फलं लभते ध्रुवम् ॥९७॥ यद्यारुणोदये विद्धा दशम्यैकादशी तिथिः । तदा तां संपरित्यज्य द्वादशीं समुपोषयेत् ॥९८॥ तत्रेष्ट्वा वासुदेवाख्यं सम्यक्पूजाविधानतः । राजसूयसहस्रस्य फलमुन्मीलिते लभेत् ॥९९॥ है। फाल्गुन-शुक्ल-द्वादशी में गंध, पुष्प आदि से हरि को स्वर्णमयी प्रतिमा का पूजन कर वेदवेत्ता द्विज को समर्पित करे। पश्चात् बारह ब्राह्मणों को खिलाकर दक्षिणापूर्वक उन्हें विदा करके भाई-बंधुओं के साथ स्वयं भोजन करे। त्रिस्पृशा, उन्मीलिनी, पक्षवर्धिनी, वंजुली, जया, विजया, जयंती और अपराजिता-ये आठों द्वादशियां पापहारिणी हैं। इनमें सदा उपवास करना चाहिये ॥८६-९२॥ श्री नारद बोले- ब्रह्मन् ! इन द्वादशियों का क्या लक्षण है, क्या फल है? सब बातें मुझे बता दीजिये, और भी जो दूसरी पुण्यदायिका द्वादशियां हों, उन्हें भी कह दीजिये ॥९३॥ सूत बोले--द्विजवर्यवृन्द ! इस प्रकार नारद के पूछने पर मुनि सनातन महाभगवद्भक्त भ्राता (नारद) की प्रशंसा कर कहने लगे ॥९४॥ सनातन बोले-भाई ! साधुओं के संशय को मिटाने वाला तुमने बहुत अच्छा प्रश्न किया। मैं महा- द्वादशियों का पृथक्-पृथक् लक्षण एवम् फल बता रहा हूँ। नारद ! जब सूर्योदय से पहिले ही एकादशी बीत जाती है तब त्रिस्पृशा नामक द्वादशी होती है, जिसका फल अत्युत्कृष्ट होता है। उसमें जो उपवास करके गोविन्द की अर्चना करता है, उसे सहस्र अश्वमेध यज्ञ करने का फल मिलता है, इसमें संदेह नहीं। जब अरुणोदय काल में दशमी तिथि से एकादशी विद्ध हो जाय तब उसका परित्याग कर द्वादशी में उपवास करना चाहिये। उस उन्मीलिनी द्वादशी में वासुदेव की विधिपूर्वक पूजा करने से सहस्र राजसूय यज्ञ करने का फल प्राप्त होता है ॥९५-९७॥ जब सूर्योदय काल में दशमी एकादशी का स्पर्श करती हो तब उसको छोड़कर द्वादशी में उपवास करे, जिसका नाम वंजुलिका होता है। उस दिन निरंतर भक्तिपूर्वक गंध आदि उपचारों से अभयदान देने वाले