बृहन्नारदीय पुराण (संस्कृत मूल व हिन्दी व्याख्या)
Brihan Naradiya Purana with Sanskrit & Hindi Commentary
महर्षि व्यास द्वारा
स्रोत: चौखम्बा संस्कृत संस्थान · चौखम्बा संस्कृत संस्थान (उद्गम)
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संदर्भ में पढ़ें३६६ नारदीयपुराणम् यदोदये तु सवितुर्भवेदेकादशी क्वचित् । तदा संजुलिका नाम्ना सा स्यात्सर्वार्थसिद्धिदा ॥१००॥ अस्यां संकर्षणं देवं समभ्यर्च्य प्रयत्नतः । पुण्डरीकाक्षमतुलं भक्त्या सर्वैश्वर्यमवाप्नुयात् ॥१०१॥ एषा महाद्वादशी तु सर्वऋतुफलप्रदा । सर्वपापहरा सौम्या सर्वसौभाग्यदायिनी ॥१०२॥ कुहूराके यदा वृद्धे स्यातां विप्र यदा तदा । पञ्चवर्द्धनिका नाम द्वादशी सा महाफला ॥१०३॥ तस्यां संपूजयेद्देवं प्रद्युम्नं जगतां पतिम् । सर्वैश्वर्यप्रदं साक्षात्पुत्रपौत्रविवर्धनम् ॥१०४॥ यदा तु शुक्ले पक्षे द्वादशी स्यात्सभान्विता । तदा प्रोक्ता जया नाम सर्वशत्रुविनाशिनी ॥१०५॥ अस्यां संपूजयेद्देवमखिलैर्ह्रदयं पतिम् । सर्वकामप्रदं नॄणां सर्वसौभाग्यदायकम् ॥१०६॥ श्रवणर्क्षयुता चेत्स्याद्वादशी धवले दले । तदा सा विजया नाम सर्वकामफलप्रदा ॥१०७॥ सर्वसौख्यप्रदं नॄणामसक्तभोगप्रदं सदा । सर्वतीर्थफलं विप्र हरेः प्रीतिकरं शुभम् ॥१०८॥ यदा स्याच्च सिते पक्षे प्राजापत्यर्क्षसंयुता । द्वादशी सा महापुण्या जयंती नामतः स्मृता ॥१०९॥ यस्यां समर्चयेद्देवं वामनं सिद्धिदं नृणाम् । उपोषितैर्नृभिर्विप्र सर्वयज्ञफलं भवेत् ॥११०॥ सर्वदानफलं चापि भुक्तिमुक्तिप्रदायिनी । यदा तु स्वातियुक्ते पक्षे द्वादशी शशिनः सिते ॥१११॥ तदापराजिता प्रोक्ता सर्वज्ञानप्रदायिनी । अस्यां संप्रार्थयेद्देवं नारायणमनामयम् ॥११२॥ संसारजालविच्छित्तिसागराय शमात्मने । सर्वदोषहरं देवं पूजयन्मुच्यते भवात् ॥११३॥ यदा स्यान्मधुशुक्लायां द्वादश्यां मैत्रभं भवेत् । तदा व्रतद्वयं कार्यं न दोषोऽस्त्यत्र वैकृतम् ॥११४॥ श्रवणर्क्षयुतायां च द्वादश्यां प्रादुषूत्तरे । ऊर्जे सितायां द्वादश्यामेकार्के च व्रतद्वयम् ॥११५॥ संकर्षण देव की पूजा करे ॥९८-१०१॥ यह महाद्वादशी सब ऋतुओं में सुफला, सर्वपाप-हारिणी तथा सर्व- संपत्-दायिनी है । जब अमावास्या और पूर्णिमा बढ़ जाती हैं तब पञ्चवर्द्धनिका नामक द्वादशी महाफल-दायिनी होती है । उसमें सकल ऐश्वर्यों को देने वाले, पुत्र-पौत्रों को बढ़ाने वाले जगत्पति प्रद्युम्न देव की आराधना करनी चाहिये । जब शुक्ल पक्ष में द्वादशी आश्विना (पूर्वाषाढ़) नक्षत्र से युक्त हो तब समस्त शत्रुओं का नाश करने वाली जया नामक द्वादशी होती है । उस दिन अखिलकामप्रदायक तथा सर्वसौभाग्यवर्धक रमा (उपा)- पति की पूजा करनी चाहिये ॥१०२-१०६॥ जब शुक्ल पक्ष में द्वादशी श्रवणनक्षत्र से युक्त हो, तब वह विजया द्वादशी कहलाती है । विप्र ! उसमें उपवास करके सब सुखों को देने वाले, निरन्तर रूप से भोगों में निरत रहने वाले और सकल तीर्थों के फल प्रदान करने वाले गदाधर देव की अर्चना करनी चाहिये । जब शुक्ल-पक्ष की द्वादशी प्रजापति-नक्षत्र से युक्त हो तब वह जयंती कहलाती है और महापुण्यदायिनी होती है ! उसमें मनुष्यों को सिद्धि प्रदान करने वाले वामनदेव की पूजा करनी चाहिये । विप्रवर्य ! उसमें उपवास करने से समस्त यज्ञों का फल प्राप्त होता है ! वह निखिल दानों का फल देने वाली और भोग-मोक्ष को प्रदान करने वाली है । जब शुक्ल पक्ष में द्वादशी बृहस्पति- नक्षत्र से युक्त हो तब वह पराजिता कहलाती है, जो सर्वज्ञानदायिनी है । उसमें उपवास कर ब्राह्मण-भोजन कराने से मोक्ष की प्राप्ति होती है । उस दिन संसार रूपी जाल को तोड़ने वाले, शम के समुद्र और निर्विकार नारायण देव की अर्चना करनी चाहिये ॥१०७-११३॥ जब आषाढ़-शुक्ल-द्वादशी मैत्र नक्षत्र से युक्त हो तब दोनों दिन व्रत करना चाहिये । दोनों व्रत एक ही देवता के निमित्त किये जाने के कारण कोई दोष नहीं लगता ।