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भारतकोश
बृहन्नारदीय पुराण (संस्कृत मूल व हिन्दी व्याख्या)

बृहन्नारदीय पुराण (संस्कृत मूल व हिन्दी व्याख्या)

Brihan Naradiya Purana with Sanskrit & Hindi Commentary

महर्षि व्यास द्वारा

स्रोत: चौखम्बा संस्कृत संस्थान · चौखम्बा संस्कृत संस्थान (उद्गम)

DevanagariSanskritpublished1,008 पृष्ठ

पृष्ठ 986, कुल 1008 में से

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पृष्ठ 986

हरिभक्तिविलासगतमोऽध्यायः ६६७ एताभ्योऽन्यत्र विप्रेन्द्र द्वादश्यामेक भुक्तकम् । विहंतः समुद्दिष्टं व्रतं पातकनाशनम् ॥११६॥ एकादश्या व्रतं नित्यं द्वादश्या सहितं यतः । नोद्यापनमिहेोद्दिष्टं कर्त्तव्यं जीवितावधि ॥११७॥ इति श्रीबृहन्नारदीयपुराणे बृहदुपाख्याने पूर्वभागे चतुर्थपादे द्वादशमासस्य द्वादशीव्रत- निरूपणं नामैकोनविंशत्यधिकशततमोऽध्यायः ॥१२१॥

द्वाविंशत्यधिकशततमोऽध्यायः सनातन उवाच अज्ञातः संप्रवक्ष्यामि त्रयोदश्या व्रतानि ते। यानि कृत्वा नरो भक्त्या सुभगो जायते भुवि ॥१॥ मधौ शुक्लत्रयोदश्यां मदनं चन्दनात्मकम् । कृत्वा संपूज्य यत्नेन वीजयेद्व्यजनेन च ॥२॥ ततः संतर्पितः कामः पुत्रपौत्रविवर्द्धनः । अनंगपूजाप्युद्योता तां निबोध मुनीश्वर ॥३॥ सिन्दूररजनीरागैः फलकेऽनंगमालिखेत् । रतिप्रीतिसुतं श्लक्ष्णं पुष्पचापेपुधारिणम् ॥४॥ कामदेवं वसन्तं च वाजिद्वक्त्रं वृषध्वजम् । मध्याह्ने पूजयेद्भक्त्या गंधस्रग्भूषणांशुकैः ॥५॥ भक्ष्यैर्नानाविधैश्चापि मन्त्रेणानेन नारद । नमो नाराय कामाय कामदेवस्य मूतये ॥६॥

भाद्र-शुक्ल की श्रवणनक्षत्र से युक्त द्वादशी, कार्तिक-शुक्ल-द्वादशी तथा फाल्गुन-शुक्ल द्वादशी में दोनों व्रत करने चाहिये । इनके अतिरिक्त द्वादशियों में एकभुक्त के लिये कहा गया है। यह व्रत सकल पातकों का नाशक है। द्वादशी सहित एकादशीव्रत जीवन पर्यन्त करना चाहिये । इसमें उद्यापन करने की आवश्यकता नहीं है ॥११४-११७॥ श्री नारदीय पुराण के पूर्वार्ध में बृहदुपाख्यानयुक्त चतुर्थपाद में बारह मासों का द्वादशीव्रतनिरूपण नामक एक सौ इक्कीसवाँ अध्याय समाप्त ॥१२१॥

अध्याय १२२ बारह मासों का त्रयोदशी-व्रत सनातन बोलेः-अब मैं त्रयोदशी के व्रत तुमसे बतलाता हूँ, जिनके अनुष्ठान से मनुष्य पृथ्वी पर सौभाग्यवान् होता है। चैत्र-शुक्ल-त्रयोदशी में चंदन का कामदेव बना कर यत्नपूर्वक उनकी पूजा करके पंखा झले । ऐसा करने से अत्यन्त प्रसन्न मदन पुत्र-पौत्रादि को बढ़ाते हैं। मुनीश्वर ! उस दिन अनंगपूजा भी की जाती है ॥१-३॥ उसके विषय में सुनो। सिंदूर को घोलकर शलाके से कामदेव का ऐसा चित्र बनाये, जो मनोहर, रति की प्रीति से युक्त और पुष्पचाप एवम् कुसुमशर धारण करने वाले हों। अश्वमुख तथा वृषध्वज वसन्त का भी चित्र बनाये । नारद ! मध्याह्न काल में "नमो नाराय......" इस मंत्र को पढ़ते हुए गंध, माला,