सामग्री पर जाएँ
भारतकोश
बृहन्नारदीय पुराण (संस्कृत मूल व हिन्दी व्याख्या)

बृहन्नारदीय पुराण (संस्कृत मूल व हिन्दी व्याख्या)

Brihan Naradiya Purana with Sanskrit & Hindi Commentary

महर्षि व्यास द्वारा

स्रोत: चौखम्बा संस्कृत संस्थान · चौखम्बा संस्कृत संस्थान (उद्गम)

DevanagariSanskritpublished1,008 पृष्ठ

पृष्ठ 987, कुल 1008 में से

संदर्भ में पढ़ें
पृष्ठ 987

६६८ | नारदीयपुराणम्

ब्रह्मविष्णुशिवेंद्राणां मनःक्षोभकराय वै। ततस्तस्याग्रतो भक्त्या पूजयेदंगनापतिम् ॥७॥ वस्त्रमाल्यविभूषाद्यैः कामोऽयमिति चिंतयेत् । संपूज्य द्विजदांपत्यं गंधवस्त्रविभूषणैः ॥८॥ एवं यः कुरुते विप्र वर्षे वर्षे महोत्सवम् । वसंतसमये प्राप्ते हृष्टः पुष्टः सदैव सः ॥६॥ प्रतिमासं पूजयेद्वा यावद्वर्षं समाप्यते । मदनं हृद्भवं कामं मन्मथं च रतिप्रियम् ॥१०॥ अनंगं चैव कंदर्प पूजयेन्मकरध्वजम् । कुसुमायुधसंज्ञं च ततः पश्चान्मनोभवम् ॥११॥ विषमेषुं तथा विप्र मालतीप्रियमित्यपि । अजाया दानमप्युक्तं स्नात्वा नद्यां विधानतः ॥१२॥ अजाः पयस्विनीर्दद्याद्दरिद्राय कुटुंबिने । भूयस्त्वनेन दानेन स लोके नैव जायते ॥१३॥ यदीयं शनिना युक्ता सा महावारुणी स्मृता । गंगायां यदि लभ्येत कोटिसूर्यग्रहाधिका ॥१४॥ शुभयोगः शतक्षं च शनो कामे मधौ सिते । महामहेति विख्याता कुलकोटिविमुक्तिका ॥१५॥ राधशुक्लत्रयोदश्यां कामदेवव्रतं स्मृतम् । तत्र गंधादिभिः कामं पूजयेदुपवासवान् ॥१६॥ प्रतिमासं ततः पश्चात्तयोदश्यां सिते दले । एवमेव व्रतं कार्यं वर्षांते गामलंकृताम् ॥१७॥ दद्याद्विप्राय सत्कृत्य व्रतसांगत्वसिद्धये । ज्येष्ठशुक्लत्रयोदश्यां सौभाग्यशयनं व्रतम् ॥१८॥ तत्र स्नात्वा नदी तोये पूजयेच्छुचिदेशजम् । श्वेतमंदारमर्कं वा करवीरं च रक्तकम् ॥१६॥ निरीक्ष्य गगने सूर्यं प्रार्थयेन्मंत्रतस्तदा । मंदारकरवीराकै भवंतो भास्करांशजाः ॥२०॥: पूजिता मम दौर्भाग्यं नाशयंतु नमोऽस्तु वः । इत्थं योऽर्चयते भक्त्या वर्षे वर्षे द्रुमत्रयम् ॥२१॥ नश्यते तस्य दौर्भाग्यं नात्र कार्या विचारणा । शुचिशुक्लत्रयोदश्यामेकभक्तं समाचरेत् ॥२२॥


आभूषण, वस्त्र तथा अनेक प्रकार के भक्ष्यों से उनकी अर्चना करे। तदनन्तर उनके आगे साक्षात् कामदेव समझकर भक्तिपूर्वक वस्त्र, माला, आभूषण आदि से द्विजदंपति की पूजा करे ॥४-८॥ विप्र ! जो इस प्रकार प्रतिवर्ष वसंतसमय में महोत्सव करता है, वह सदा हृष्ट-पुष्ट रहता है। विप्र ! अथवा प्रतिमास, यावत् वर्ष समाप्त हो, हृद्भव, काम, मन्मथ, रतिप्रिय, अनंग, कंदर्प, मकरध्वज, कुसुमायुध, मनोभव, विषमशर तथा मालतीप्रिय की पूजा करे । उस दिन अजादान का भी विधान है। नदी में विधिपूर्वक स्नान कर दुधारू बकरी दरिद्र कुटुंब को दे दे । इस दान के करने से पुनर्जन्म नहीं होता ॥९-१३॥ यदि यह त्रयोदशी शनि दिन पड़ जाय तो महावारुणी योग लगता है । कोटिसूर्यग्रहणों में स्नान करने की अपेक्षा महावारुणी में गंगास्नान करना अधिक फलदायक होता है । चैत्र-शुक्ल-त्रयोदशी-शनि को यदि शुभयोग तथा शतभिषा नक्षत्र पड़ जाय तो महावारुणी हो जाती है। उसमें स्नान करने से एक करोड़ कुल को मोक्ष मिलता है ॥१४-१५॥ वैशाख-शुक्ल-त्रयोदशी में कामदेवव्रत किया जाता है। उस दिन उपवास करते हुए गंध आदि से कामदेव की पूजा करे । पश्चात् प्रत्येक मास की शुक्ल-त्रयोदशी में इसी तरह व्रत किया करे। वर्षान्त में व्रत की पूर्णता के लिये अलंकृता गो ब्राह्मण को सत्कारपूर्वक प्रदान करे । ज्येष्ठ-शुक्ल-त्रयोदशी में सौभाग्यशयनव्रत करना चाहिये । उस दिन नदीजल में स्नान कर पवित्र स्थान में उत्पन्न हुए श्वेतमंदार, आक तथा लाल करवीर की पूजाकरे । गगन में सूर्य की ओर दृष्टि लगाये "मंदारकरवीराकैः . . . . . " इस मंत्र को पढ़कर प्रार्थना करे । जो इस प्रकार प्रतिवर्ष तीनों वृक्षों का पूजन करता है, उसका दौर्भाग्य नष्ट हो जाता है, इसमें विचार करने की आवश्यकता नहीं ॥१६-२१३॥ आषाढ़-शुक्ल-त्रयोदशी में एक भुक्त करते हुए जगत्पति शंकर तथा उमा की