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भारतकोश
बृहन्नारदीय पुराण (संस्कृत मूल व हिन्दी व्याख्या)

बृहन्नारदीय पुराण (संस्कृत मूल व हिन्दी व्याख्या)

Brihan Naradiya Purana with Sanskrit & Hindi Commentary

महर्षि व्यास द्वारा

स्रोत: चौखम्बा संस्कृत संस्थान · चौखम्बा संस्कृत संस्थान (उद्गम)

DevanagariSanskritpublished1,008 पृष्ठ

पृष्ठ 988, कुल 1008 में से

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पृष्ठ 988

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द्वविंशत्यधिकशततमोऽध्यायः ६६६ पूजयित्वा जगन्नाथावुमामाहेश्वरी तनूः । हैम्यो रौप्यो च मृन्मय्यो यथाशक्त्या विधाय च ॥२३॥ सिंहोक्षस्थे देवगृहे गोष्ठे ब्राह्मणवेश्मनि । स्थापयित्वा प्रतिष्ठाप्य देवमंत्रेण नारद ॥२४॥ ततः पंचदिनं पूजा चैकभक्तं व्रतं तथा । तृतीयदिवसे प्रातः स्नात्वा संपूज्य तौ पुनः ॥२५॥ समर्पणीयो विप्राय वेदवेदांगशालिने । वर्षे वर्षे ततः पश्चाद्विधेयं वर्षपंचकम् ॥२६॥ तदंते धेनुयुग्मेन सहितौ तौ प्रदापयेत् । इत्थं नरो वा नारी वाऽकृत्वा व्रतमिदं शुभम् ॥२७॥ नैव दांपत्यविच्छेदं लभते सप्तजन्मसु । नभःशुक्लत्रयोदश्यां रतिकामव्रतं शुभम् ॥२८॥ वैधव्यवारणं स्त्रीणां तथा संतानवर्धनम् । कृतोपवासा कन्यैव नारी वा द्विजसत्तम ॥२६॥ ताम्रे वा मृन्मये वापि सौवर्णे राजते तथा । रतिकामौ प्रविन्ध्यस्थ गंधाद्यैः सम्यगर्चयेत् ॥३०॥ ततस्तु द्विजदांपत्यं चतुर्दश्यां निमंत्र्य च । सत्कृत्य भोज्य प्रतिमे दद्यात्ताभ्यां सदक्षिणे ॥३१॥ एवं चतुर्दशाब्दं च कृत्वा व्रतमनुत्तमम् । धेनुयुग्मान्विते देये व्रतसंपूर्तिहेतवे ॥३२॥ भाद्रशुक्लत्रयोदश्यां गोत्रिरात्रव्रतं स्मृतम् । लक्ष्मीनारायणं कृत्वा सौवर्णं चापि राजतम् ॥३३॥ पंचामृतेन संस्त्राप्य मण्डलेऽष्टदले शुभे । पीठे विन्ध्यस्य वस्त्राद्यं गंधाद्यैः परिपूजयेत् ॥३४॥ आरातिकं ततः कृत्वा दद्यात्सात्तोदकं घटम् । एवं दिनत्रयं कृत्वा व्रतांते मासमर्च्य च ॥३५॥ सम्यगर्च्य च संप्राद्य दद्यान्मंत्रेण नारद । पंच गावः समुत्पन्ना मध्यमाने महोदधौ ॥३६॥ तासां मध्ये तु या नंदा तस्यै धेनवे नमो नमः । प्रदक्षिणीकृत्य ततो दद्याद्विप्राय मंत्रतः ॥३७॥ गावो ममाग्रतः सन्तु गावो मे सन्तु पृष्ठतः । गावो मे पाश्र्वतः सन्तु गवां मध्ये वसाम्यहम् ॥३८॥ ततश्च द्विजदांपत्यं सप्रगभ्यर्च्य भोजयेत् । लक्ष्मीनारायणं तस्मै सत्कृत्य प्रतिपादयेत् ॥३६॥

सोने वा चाँदी या मिट्टी की प्रतिमा बनाकर सिंह तथा बैल के रहने के स्थान, देवालय, गोष्ठ तथा विप्रगृह में देवमंत्र से स्थापित करे । तदुपराप्त पाँच दिनों तक एकभुक्तव्रत करते हुए तीसरे दिन प्रातःकाल स्नान पूजा करके मूर्तियाँ वेदवेत्ता ब्राह्मण को समर्पित कर दे । इस तरह पाँच वर्षों तक प्रत्येक वर्ष इस व्रत को करते हुए अंत में दो गौओं सहित प्रतिमायें दान किया करे । जो नर या नारी इस पवित्र व्रत को करती हैं, उनका सात जन्मों तक दांपत्यविच्छेद नहीं होता । श्रावण-शुक्ल-त्रयोदशी में कल्याणमय रति-काम-व्रत करना चाहिये । यह व्रत स्त्रियों के वैधव्ययोग को नष्ट करता है तथा संतानों को बढ़ाता है ॥२२-२८३॥ द्विजश्रेष्ठ ! उस दिन उपवास करती हुई कन्या या नारी ताँबे, या मिट्टी, या सोने या चांदी की रति और काम की प्रतिमायें बनाकर गंध आदि से अच्छी तरह अर्चना करे । तदनन्तर चतुर्दशी में द्विजदंपति को सत्कारपूर्वक भोजन कराकर दक्षिणा सहित प्रतिमायें दे दे । इस प्रकार चौदह वर्षों तक इस उत्तम व्रत को करके अंत में व्रत की पूर्णता के लिये दो गायें दान करे ॥२९-३२॥ भाद्र-शुक्ल-त्रयोदशी में गोत्रिरात्रव्रत करना चाहिये । उस दिन सोने या चांदी की लक्ष्मीनारायण की मूर्ति बनाकर शुभ अष्टदल मंडल में पीठ पर अवस्थित करके पंचामृत से स्नपन करे । पश्चात् गंध आदि से अर्चना करते हुए आरती करके अन्न-जल-पूर्ण घट उत्सर्ग करे । इस तरह तीन दिनों तक व्रत कर अंत में "पंच गावः ...." इस मंत्र से गौ को पूजा कर प्रदक्षिणा करे । पश्चात् "गावो ....." इस मंत्र को पढ़ कर गौ विप्र को समर्पित कर दे । फिर द्विजदंपती की पूजा कर भोजन कराये और लक्ष्मीनारायण की मूर्ति

१२२ ना० पु०