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भारतकोश
बृहन्नारदीय पुराण (संस्कृत मूल व हिन्दी व्याख्या)

बृहन्नारदीय पुराण (संस्कृत मूल व हिन्दी व्याख्या)

Brihan Naradiya Purana with Sanskrit & Hindi Commentary

महर्षि व्यास द्वारा

स्रोत: चौखम्बा संस्कृत संस्थान · चौखम्बा संस्कृत संस्थान (उद्गम)

DevanagariSanskritpublished1,008 पृष्ठ

पृष्ठ 989, कुल 1008 में से

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पृष्ठ 989

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६३० | नारदीयपुराणम् अश्वमेधसहस्राणि राजसूयशतानि च । कृत्वा यत्फलमाप्नोति गोत्रिरात्रव्रताच्च तत् ॥४०॥ इषे शुक्लत्रयोदश्यां त्रिरात्राशोककृद्व्रतम् । हेमं ह्यशोकं निर्माय पूजयित्वा विधानतः ॥४१॥ उपवासपरा नारी नित्यं कुर्यात्प्रदक्षिणाः । अष्टोत्तरशतं विप्र संहर्षान्नित सादरम् ॥४२॥ हरेण निर्मितः पूर्वं त्वमशोक कृपालुना । लोकोपकारकरणस्ततस्त्वसीद शिवप्रिय ॥४३॥ ततस्तृतीये दिवसे वृक्षे तस्मिन्वृषध्वजम् । सम्पूज्य विधानेन द्विजं सम्भोज्य दापयेत् ॥४४॥ एवं कृतव्रता नारी वैधव्यं नाप्नुयात्क्वचित् । पुत्रपौत्रादिसहिता नपुंश्च स्यात्सुवल्लभा ॥४५॥ ऊर्जकृष्णत्रयोदश्यामेकभक्तः समाहितः । प्रदोषे तैलदीपं तु प्रज्वाल्यप्यर्च्य यत्नतः ॥४६॥ गृहद्वारे बहिर्दद्याद्यमो मे प्रीयतामिति । एवं कृते तु विप्रेन्द्र यमपीडा न जायते ॥४७॥ ऊर्जशुक्लत्रयोदश्यामेकभोजी द्विजोत्तम । पुनः स्नात्वा प्रदोषे तु वाग्यतः सुसमाहितः ॥४८॥ प्रदोपानां सहस्रेण शतेनाप्यथवा द्विज । प्रदीपयेच्छिवं दापि द्वात्रिंशद्दीपमालया ॥४९॥ घृतेन दीपयेद्दीपानांधाद्यैः पूजयेच्छिवम् । फलैर्नानाविधैश्चैव नैवेद्यैरपि नारद ॥५०॥ ततः स्तुवीत देवेशं शिवं नाम्नां शतेन च । तानि नामानि कीर्त्यन्ते सर्वाभीष्टप्रदानि वै ॥५१॥ नमो रुद्राय भीमाय नीलकंठाय वेधसे । कपर्दिने सुरेशाय व्योमकेशाय वै नमः ॥५२॥ वृषध्वजाय सोमाय सोमनाथाय वै नमः । दिगंबराय भृंगाय उमाकांताय वर्हिने ॥५३॥ तपोमयाय व्याप्ताय शिपिविष्टाय वै नमः । व्यालप्रियाय व्यालाय व्यालानां पतये नमः ॥५४॥ महीधराय व्योमनाथ पशूनां पतये नमः । त्रिपुरघ्नाय सिंहाय शार्दूलार्षभचाय च ॥५५॥


उन्हें संमानपूर्वक प्रदान करे। सहस्रों अश्वमेध यज्ञ और सैकड़ों राजसूय यज्ञ करने से जो फल होता है, वह फल गोत्रिरात्रिव्रत से मिलता है ।।३३-४०।। आश्विन-शुक्ल-त्रयोदशी में त्रिरात्राशोककृद्व्रत किया जाता है। उस दिन उपवासपरायण नारी सोने का अशोक वृक्ष बनाकर विधिपूर्वक पूजा करे । "हरेण......" इस मंत्र से आदरपूर्वक उस अशोक की एक सौ आठ बार प्रदक्षिणा करके तीसरे दिन उस वृक्ष में शंकर की विधिपूर्वक पूजाकर ब्राह्मण को खिला कर उन्हें वह दे दे । यह व्रत करने वाली नारी कभी विधवा नहीं होती तथा पुत्र-पौत्रादि से युक्त होकर स्वामी की प्रेयसी होती है ।।४१-४५।। कार्तिक-कृष्ण-त्रयोदशी में एकभुक्त तथा इंद्रिय-संयम कर प्रदोष काल में दीप जलाकर 'यम मेरे ऊपर प्रसन्न हो" यह कहते हुए घर के दरवाजे के बाहर रखे । विप्रवर्य ! ऐसा करने से यमपीड़ा नहीं होती। द्विजश्रेष्ठ ! कार्तिक-शुक्ल-त्रयोदशी में एकभुक्त करते हुए प्रदोषकाल में पुनःस्नान कर वाक्संयम तथा सावधानतापूर्वक एक हजार या एक सौ दीप शिव के समीप जलाये, बत्तीस दीपमालिकायें प्रज्वलित करे । घृत से दीपों को जलाकर गंध आदि द्रव्य, फल एवम् बहुविध नैवेद्यों से शिव की अर्चना करे। तदनन्तर शंकर के सौ नामों से उनकी स्तुति करे । वे नाम अखिल कामनाओं को पूर्ण करने वाले हैं। उनको सुनो ॥४६-५१॥ रुद्र, भीम, नीलकंठ तथा वेधा को नमस्कार है । कपर्दी, सुरेश तथा व्योमकेश को नमस्कार है । वृषध्वज, सोम तथा सोमनाथ को नमस्कार है । दिगंबर, भृंग, उमाकांत, वर्ही, तपोमय, व्याप्त तथा शिपिविष्ट को नमस्कार है । व्यालप्रिय, व्याल तथा व्यालपति को नमस्कार है । महीधर, व्योम तथा पशुपति को नमस्कार है । त्रिपुरहन्ता, सिंह, शार्दूल, वृषभ, मित, मितनाथ, सिद्ध, परमेष्ठी, वेदगीत, गुप्त तथा वेदगुह्य को नमस्कार