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भारतकोश
बृहन्नारदीय पुराण (संस्कृत मूल व हिन्दी व्याख्या)

बृहन्नारदीय पुराण (संस्कृत मूल व हिन्दी व्याख्या)

Brihan Naradiya Purana with Sanskrit & Hindi Commentary

महर्षि व्यास द्वारा

स्रोत: चौखम्बा संस्कृत संस्थान · चौखम्बा संस्कृत संस्थान (उद्गम)

DevanagariSanskritpublished1,008 पृष्ठ

पृष्ठ 990, कुल 1008 में से

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पृष्ठ 990

द्विशत्यधिकशततमोऽध्यायः ३७१ निताय नितनाथाय सिद्धाय परमेष्ठिने । वेदगीताय गुप्ताय वेदगुह्याय वै नमः ॥५६॥ दीर्घाय दीर्घरूपाय दीर्घार्थाय महीयसे । नमो जगत्प्रतिष्ठाय व्योमरूपाय वै नमः ॥५७॥ कल्याणाय विशिष्टाय शिष्टाय परमात्मने । गजकृत्तिधरायाथ अंधकासुरभेदिने ॥५८॥ नीललोहितशुक्लाय चण्डमुण्डप्रियाय च । भक्तिप्रियाय देवाय यज्ञांतायाव्ययाय च ॥५९॥ महेशाय नमस्तुभ्यं महादेवहराय च । त्रिनेत्राय त्रिवेदाय वेदांगाय नमो नमः ॥६०॥ अर्थायार्थस्वरूपाय परमार्थाय वै नमः । विश्वरूपाय विश्वाय विश्वनाथाय वै नमः ॥६१॥ शंकराय च कालाय कालाग्रयस्वरूपिणे । अरूपाय विरूपाय सूक्ष्मसूक्ष्माय वै नमः ॥६२॥ श्मशानवासिने तुभ्यं नमस्ते कृत्तिवाससे । शशांकशेखरायाथ रुद्रभूमिश्रिताय च ॥६३॥ दुर्गाय दुर्गपाराय दुर्गाव्यवसाक्षिणे । लिंगरूपाय लिंगाय लिंगानां पतये नमः ॥६४॥ नमः प्रभावस्वरूपाय प्रभावाथार्याय वै नमः ॥६५॥ नमो नमः कारणकारणाय मृत्युंजयायात्मभवस्वरूपिणे । ॥६६॥ त्रियंबकाय शितिकंठभर्गाय गौरीयुजे मंगलहेतवे नमः ॥६७॥ नाम्नां शतमिदं विप्र पिनाकिगुणकीर्तनम् । पठित्वा दक्षिणीकृत्य प्रायान्निजनिकेतनम् ॥६७॥ एवं कृत्वा व्रतं विप्र महादेवप्रसादतः । भुक्त्वेह भोगानखिलांते शिवपदं लभेत् ॥६८॥ मार्गशुक्लत्रयोदश्यां योऽनंगं विधिना यजेत् । त्रिकालमेककालं वा शिवसंगमसम्भवम् ॥६९॥ गंधाद्यैश्चोपचारैस्तु पूजयित्वा विधानतः । घटे मंगलपट्टे वा भोजयेद्विजदंपती ॥७०॥ ततश्च दक्षिणां दत्त्वा स्वयमेकाशनं चरेत् । एवं कृते तु विधिवद्व्रती सौभाग्यभाजनः ॥ जायते भुवि विप्रेन्द्र महादेवप्रसादतः ॥७१॥ है। दीर्घ, दीर्घरूप, दीर्घार्थ तथा महीयान् को नमस्कार है। जगत्प्रतिष्ठ को नमस्कार है। व्योमरूप को नमस्कार है। कल्याण, विशिष्ट, शिष्ट, परमात्मा तथा व्याघ्रचर्मधारी को नमस्कार है। अंधकासुर का नाश करने वाले, नील, रक्त तथा शुक्ल वर्ण वाले और चंडमुंडप्रिय को नमस्कार है ॥५२-५८॥। भक्तिप्रिय, देव, यज्ञांत, अव्यय तथा महेश को नमस्कार है। महादेव, हर, त्रिनेत्र, त्रिवेद तथा वेदांग को नमस्कार है। अर्थ, अर्थस्वरूप तथा परमार्थ को नमस्कार है। विश्वरूप, विश्व तथा विश्वनाथ को नमस्कार है। शंकर, काल, कालाग्रयस्वरूपी, अरूप, विरूप तथा अतिसूक्ष्म को नमस्कार है। श्मशानवासी को नमस्कार है। चर्मधारी को नमस्कार है। चंद्रशेखर एवम् रुद्रभूमिश्रित को नमस्कार है ॥५६-६३॥ दुर्ग, दुर्गपार, दुर्गाव्यवसाक्षी, लिंगरूप, लिंग तथा लिंगपति को नमस्कार है। प्रभावरूप तथा प्रभाव के अर्थरूप को नमस्कार है। कारणों के कारण, मृत्युंजय, आत्मा तथा भवस्वरूप वाले, तीन नेत्र वाले, कालकंठ वाले, भर्गनाम वाले, गौरी से संबन्ध करने वाले और मंगलों के कारण- भूत शिव को नमस्कार है। विप्र ! जो व्यक्ति शिव के इन शतनामों का पाठ करके प्रदक्षिणा करता है, वह उनके लोक को जाता है। द्विज ! उक्त रीति से उक्त व्रत करने वाला व्यक्ति महादेव की कृपा से ऐहलौकिक सकल भोगों को भोगकर अंत में शिवलोक को जाता है ॥६४-६८॥ अगहन-शुक्ल-त्रयोदशी में विधिपूर्वक अनंग की पूजा करनी चाहिये। तीनों काल या एक काल शिव के संगम से उत्पन्न अनंग को घट पर या मंगलपट्ट पर गंध आदि उपचारों से विधानपूर्वक पूजा कर द्विजदंपती को भोजन कराये। पश्चात् उन्हें दक्षिणा देकर स्वयं एकभुक्त करे। विप्रर्षे ! ऐसा करने से अनेक कामनायें सफल होती हैं ॥६९-७१॥