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भारतकोश
बृहन्नारदीय पुराण (संस्कृत मूल व हिन्दी व्याख्या)

बृहन्नारदीय पुराण (संस्कृत मूल व हिन्दी व्याख्या)

Brihan Naradiya Purana with Sanskrit & Hindi Commentary

महर्षि व्यास द्वारा

स्रोत: चौखम्बा संस्कृत संस्थान · चौखम्बा संस्कृत संस्थान (उद्गम)

DevanagariSanskritpublished1,008 पृष्ठ

पृष्ठ 991, कुल 1008 में से

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पृष्ठ 991

६७२ नारदीयपुराणम् पौषशुक्लत्रयोदश्यां समभ्यर्च्यच्युतं हरिम् । घृतपात्रं द्विजेन्द्राय प्रदद्यात्सर्वसिद्धये ॥७२॥ माघशुक्लत्रयोदश्यां समारभ्य दिनत्रयम् । माघस्नानव्रतं विप्र नानाकामफलप्रदम् ॥७३॥ प्रयागे माघमासे तु द्व्यहं स्नातस्य यत्फलम् । नाश्वमेधसहस्रेण तत्फलं लभते भुवि ॥७४॥ तत्र स्नानं जपो होमो दानं चानन्त्यमश्नुते । फाल्गुने तु सिते पक्षे त्रयोदश्यामुपोषितः ॥७५॥ नमस्कृत्य जगन्नाथं प्रारम्भे धनदव्रतम् । महाराजं यक्षपतिं गन्धाद्यैरुपचारकैः ॥७६॥ लिखितं वर्णकैः पट्टे पूजयेद्भक्तिभावतः । एवं शुक्लत्रयोदश्यां प्रतिमासं द्विजोत्तम ॥७७॥ संपूजयेत्सोपवासश्चैकभक्तो भवेन्नरः । ततो व्रतान्ते तु पुनः सौवर्णं धननायकम् ॥७८॥ विधाय निधिभिः सार्द्धं सौवर्णाभिर्द्विजोत्तम । उपचारैः षोडशभिः स्नानैः पंचामृतादिभिः ॥७९॥ नैवेद्यैर्विविधैर्भक्त्या पूजयेत्तु समाहितः । ततो धेनुमलंकृत्य वस्त्रस्रग्गंधभूषणैः ॥८०॥ सवत्सां दापयेद्विप्र सम्यग्वेदविदे शुभाम् । संभोज्य विप्रान्मिष्टान्न्रैर्द्वादशान्वा त्रयोदश ॥८१॥ गुरुं समर्च्य वस्त्राद्यैः प्रतिमां तां निवेदयेत् । द्विजेभ्यो दक्षिणां शक्त्या दत्त्वा नत्वा विसृज्य च ॥८२॥ स्वयं भुंजीत मतिमानिष्टैः सह समाहितः । एवं कृते व्रते विप्र निर्धनः प्राप्य वैश्वर्यम् ॥८३॥ मोदते भुवि विख्यातो राजराज इवापरः ॥८३॥ इति श्रीबृहन्नारदीयपुराणे पूर्वभागे बृहदुपाख्याने द्वादशमासस्थितत्रयोदशीव्रतकथनम् नाम द्वाविंशत्यधिकशततमोऽध्यायः ॥१२२॥


पौष-शुक्ल-त्रयोदशी को भगवान् विष्णु की अर्चना करके घृतपूर्ण पात्र ब्राह्मण को दान करने से सकल कामनायें सिद्ध होती हैं। विप्र ! माघ-शुक्ल-त्रयोदशी से लेकर पूर्णिमा तक माघ-स्नान का व्रत करने से अनेक काम- नायें पूर्ण होती हैं। माघमास में तीन दिन प्रयागस्नान से जितना फल होता है, उतना सहस्र अश्वमेधयज्ञ करने से भी नहीं होता। वहाँ स्नान, जप, होम तथा दान करने से अनंत फल होता है। फाल्गुन-शुक्ल-त्रयोदशी में उपवास कर जगन्नाथ को नमस्कार करके कुबेरव्रत प्रारम्भ करे। पट्ट पर गेरू से लिखित महाराज यक्षपति की गंध आदि उपचारों से भक्तिपूर्वक पूजा करे। द्विजश्रेष्ठ ! प्रत्येक मास की शुक्ल त्रयोदशी में उपवास कर पूजा करने से मनुष्य यक्षभक्त होता है। व्रतांत में सुवर्ण का कुबेर बनाकर (उसका) विधिपूर्वक षोडशोपचार पूजन करे। द्विजवर्य ! पंचामृत आदि से स्नान कराकर विविध प्रकार के नैवेद्य चढ़ाये। तदनन्तर समाहित होकर वस्त्र, माला, गंध तथा आभूषणों से युक्त सवत्सा गौ वेदवेत्ता ब्राह्मण को प्रदान करे, बारह या तेरह विप्रों को मिष्टान्न खिलाये, गुरु को वस्त्र आदि से सम्मानित कर प्रतिमा समर्पित करे और द्विजों को दक्षिणा देकर प्रणामपूर्वक विदा करे। पश्चात् मतिमान् व्यक्ति सावधानतापूर्वक स्वयं भोजन करे। विप्र ! इस व्रत का करने वाला निर्धन व्यक्ति ऐश्वर्य पाकर पृथ्वी पर महाराज की तरह आनन्द करता है ॥७२-८२॥ श्री नारदीयपुराण के पूर्वार्ध में बृहदुपाख्यानयुक्त चतुर्थपाद में द्वादशमासस्थित त्रयोदशीव्रतनिरूपण नामक एक सौ बाईसवाँ अध्याय समाप्त ॥१२२॥