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भारतकोश
बृहन्नारदीय पुराण (संस्कृत मूल व हिन्दी व्याख्या)

बृहन्नारदीय पुराण (संस्कृत मूल व हिन्दी व्याख्या)

Brihan Naradiya Purana with Sanskrit & Hindi Commentary

महर्षि व्यास द्वारा

स्रोत: चौखम्बा संस्कृत संस्थान · चौखम्बा संस्कृत संस्थान (उद्गम)

DevanagariSanskritpublished1,008 पृष्ठ

पृष्ठ 992, कुल 1008 में से

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पृष्ठ 992

त्रयोविंशत्यधिकशततमोऽध्यायः सनातन उवाच शृणु नारद वक्ष्यामि चतुर्दश्या व्रतानि ते । यानि कृत्वा नरो लोके सर्वान्कामानवाप्नुयात् ॥१॥ चैत्रशुक्लचतुर्दश्यां कुंकुमागरुचन्दनैः । गन्धाद्यैर्वस्त्रमणिभिः कार्यार्चा महती शिवे ॥२॥ वितानध्वजछत्राणि दत्त्वा पूज्याश्च मातरः । एवं कृत्वार्चनं विप्र सोपवासोऽथवैकभुक् ॥३॥ अश्वमेधाधिकं पुण्यं लभते मानवो भुवि । अत्रैव दमनार्चा च कारयेद्गन्धपुष्पकैः ॥४॥ समर्पयेत्सुपूर्णायां शिवाय शिवरूपिणे । राधकृष्णचतुर्दश्यां सोपवासो निशागमे ॥५॥ लिंगमभ्यर्चयेद्देवं स्नात्वा पीतांबरः सुधीः । गंधाद्यैरुपचारैश्च बिल्वपत्रैश्च सर्वतः ॥६॥ दत्त्वा मन्नं द्विजाग्र्याय भुंजीत च परेऽहनि । एवमेव तु कृष्णासु सर्वासु द्विजसत्तम ॥७॥ शिवव्रतं प्रकर्तव्यं धनसंतानमिच्छता । राधशुक्लचतुर्दश्यां श्रीनृसिंहव्रतं चरेत् ॥८॥ उपवासविधानेन शक्तोऽशक्तस्तथैकभुक् । निशागमे तु संपूज्य नृसिंहं दैत्यसूदनम् ॥९॥ उपचारैः षोडशभिः स्नातैः पंचामृतादिभिः । ततः क्षमापयेद्देवं ह्यनेनानेन नारद ॥१०॥ तप्तहाटककेशांत ज्वलत्पावकलोचन । वञ्चाधिकनखस्पर्श दिव्यसिंह नमोऽस्तु ते ॥११॥ अध्याय १२३ वर्ष भर के चतुर्दशी-व्रतों की विधि और महिमा सनातन बोले--नारद ! सुनो, मैं चतुर्दशी के व्रतों को बता देता हूँ, जिनके अनुष्ठान से मनुष्य ऐहलो- किक सकल कामनाओं को प्राप्त करता है। चैत्र-शुक्ल-चतुर्दशी में कुंकुम, अगर, चन्दन, गंध, वस्त्र, मणि, चंदवा, पताका और छत्र आदि से शिव की पूजा कर मातृगण को अर्चना करे । विप्र ! व्रती उस दिन उपवास करते हुए एक भुक्त में यव भोजन करे । पृथ्वी पर ऐसा करने वाला मानव अश्वमेध आदि यज्ञों का पुण्य लाभ करता है। उसी दिन दमनार्चा भी की जाती है । गंध, पुष्प आदि से दंड की पूजा कर पूर्णिमा में कल्याणरूप शिव को समर्पित करना चाहिये ।।१-४३।। वैशाख-कृष्ण-चतुर्दशी में उपवास करते हुए प्रदोषकाल में शिवलिंग की अर्चना करे। अर्थात् स्नान कर स्वच्छ वस्त्र पहन कर गंध आदि उपचारों से एवम् विल्वपत्रों से शिव की आराधना कर दूसरे दिन उत्तम ब्राह्मण को खिलाकर स्वयं भोजन करे। द्विजवर्य ! जो व्यक्ति धन एवम् संतान के इच्छुक हैं, उन्हें प्रत्येक मास की कृष्ण-चतुर्दशी में इसी तरह शिव व्रत करना चाहिये। वैशाख-शुक्ल-चतुर्दशी में श्रीनृसिंहव्रत करना चाहिये ।।५-८।। समर्थ व्यक्ति उस दिन उपवास करे और यदि अशक्त हो तो एकभुक्त करे । नारद ! प्रदोष काल में दैत्यों के विध्वंसक नृसिंह को पंचामृत आदि से स्नान कराकर षोडशोपचार पूजन करे। तदनन्तर “तप्तहाटककेशान्त...." इस मंत्र को पढ़कर क्षमा प्रार्थना करे। प्रार्थनोपरान्त व्रती भूमि पर