बृहन्नारदीय पुराण (संस्कृत मूल व हिन्दी व्याख्या)
Brihan Naradiya Purana with Sanskrit & Hindi Commentary
महर्षि व्यास द्वारा
स्रोत: चौखम्बा संस्कृत संस्थान · चौखम्बा संस्कृत संस्थान (उद्गम)
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संदर्भ में पढ़ें६७४ नारदीयपुराणम् इति संप्रार्थ्य देवेशं व्रती स्वाप्यंडिलेशयः । जितेंद्रियो जितक्रोधः सर्वभोगविवर्जितः ॥१२॥ एवं यः कुरुते विप्र विधिवद्व्रतमुत्तमम् । वर्षे वर्षे स लभते सुरतभोगो हरेः पदम् ॥१३॥ ओंकारेश्वरयात्रा च कार्यात्वेव मुनीश्वर । दुर्लभं दर्शनं तस्य दर्शनं पापनाशनम् ॥१४॥ किमत बहुनोक्तेन पूजाध्यानजवेक्षणम् । यद्भावेत्तत्फलंदिष्टं ज्ञानमोक्षप्रदं नृणाम् ॥१५॥ अत्र लिंगव्रतं चापि कर्त्तव्यं पापनाशनम् । पंचामृतैस्तु संस्नाप्य विलिप्याथ कुंकुमैः ॥१६॥ नैवेद्यैश्च फलैर्धूपैर्दीपैर्वस्त्रैर्विभूषणैः । एवं यः पूजयेदिष्टं लिंगं सर्वार्थसिद्धिदम् ॥१७॥ मुक्तिं भुक्तिं च लभते महादेवप्रसादतः । ज्येष्ठशुक्लचतुर्दश्यां दिवा पंचाथ निष्कः ॥१८॥ मुखे दवेद्धेमधैनुं रुद्रव्रतमितं स्मृतम् । शुचिशुक्लचतुर्दश्यां शिवं संपूज्य मानवः ॥१९॥ देशकालोद्भवैः पुष्पैः सर्वसंपदमाप्नुयात् । नभःशुक्लचतुर्दश्यां पवित्रारोपणं भतम् ॥२०॥ तत्स्वशाखोक्तविधिना कर्त्तव्यं द्विजसत्तम । शतमभिमंत्रितं कृत्वा ततो देवीं विसर्जयेत् ॥२१॥ पवित्रारोपणं कृत्वा नरो नार्यथवा यदि । महादेव्याः प्रसादेन भुक्तिं मुक्तिमवाप्नुयात् ॥२२॥ भाद्रशुक्लचतुर्दश्यामनंतव्रतमुत्तमम् । एकसवनमेकभुक्तं हि गोधूमस्य प्रितकम् ॥२३॥ विपाच्य शर्करयाज्येनसर्षताय निवेदयेत् । गंधाद्यैः प्राक् समभ्यर्च्य कार्पास्यं पट्टजं तु वा ॥२४॥ चतुर्दशग्रंथियुतं सूत्रं कृत्वा सुशोभनम् । ततः पुरानमुत्तार्य सूत्रं क्षिप्त्वा जलाशये ॥२५॥ निबध्नीयान्नवं नारी बामे दक्षे पुमांस्तथा । विपाच्य विप्रहस्ते तत्प्रदद्याद्दक्षिणान्वितम् ॥२६॥ शयन करे। उसे जितेन्द्रिय, जितक्रोध तथा सकल भोगों से रहित होना चाहिये। विप्र ! इस प्रकार जो उक्त व्रत को प्रतिवर्ष विधिपूर्वक करता है, वह सकल भोगों को प्राप्त कर शिवलोक को जाता है ॥१२-१३॥ मुनीश्वर ! उस दिन ओंकारेश्वर की यात्रा भी की जाती है। उनका दुर्लभ दर्शन-पूजन पापों का नाशक है। बहुत क्या कहा जाय, उनके पूजन, ध्यान, जप तथा दर्शन से मनुष्यों को ज्ञान एवम् मोक्ष की प्राप्ति होती है। उस दिन पापनाशी लिंगव्रत भी करना चाहिये। पंचामृत से शिवलिंग का स्नपन कर कुंकुम लेप कर फल, धूप, दीप, वस्त्र तथा आभूषण अर्पित करे। इस प्रकार जो सकल कामनादायक शिवलिंग का पूजन करता है, वह महादेव की कृपा से भोग-मोक्ष को प्राप्त करता है। ज्येष्ठ-शुक्ल-चतुर्दशी के प्रदोषकाल में पाँच सुवर्ण- धेनु दान करे, यह रुद्रव्रत कहलाता है। आषाढ़-शुक्ल-चतुर्दशी में देश-कालोत्पन्न पुष्पों से शिव की पूजा करने वाला मानव सकल संपत्तियों को प्राप्त करता है ॥१४-१९३॥ श्रावण-शुक्ल-चतुर्दशी में पवित्रारोपण करना चाहिये। द्विजश्रेष्ठ ! अपनी शाखा में बताई हुई विधि से पवित्रारोपण करना चाहिये। सौ बार पवित्रो अभि- मंत्रित कर देवी को समर्पित करे। पवित्रारोपण करने वालानर वा नारी महादेवी की कृपा से भोग-मोक्ष को प्राप्त करता है ॥२०-२२॥ भाद्र-शुक्ल-चतुर्दशी में अत्युत्तम अनंतव्रत किया जाता है। उस दिन एक भुक्त करते हुए एक सेर गेहूँ के आटे को घी एवम् शक्कर में पका कर अनंत भगवान् को समर्पित करे। पहिले गंध आदि से अनंत की पूजा कर कपास या रेशम का सुन्दर डोरा, जिसमें चौदह गाँठें हों, बाँह पर बाँध ले और पुराने डोरे को उतार कर जलाशय में फेंक दे। नारी नवीन डोरे को बायीं भुजा में और पुरुष दाहिनी भुजा में बाँधे। दक्षिणा सहित पकवान विप्र को देकर स्वयं भी उसी परिमाण में भोजन करे। पुरुष कार्तिक चौदह वर्षों तक