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भारतकोश
बृहन्नारदीय पुराण (संस्कृत मूल व हिन्दी व्याख्या)

बृहन्नारदीय पुराण (संस्कृत मूल व हिन्दी व्याख्या)

Brihan Naradiya Purana with Sanskrit & Hindi Commentary

महर्षि व्यास द्वारा

स्रोत: चौखम्बा संस्कृत संस्थान · चौखम्बा संस्कृत संस्थान (उद्गम)

DevanagariSanskritpublished1,008 पृष्ठ

पृष्ठ 994, कुल 1008 में से

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पृष्ठ 994

अथ त्रिशत्यधिकशततमोऽध्यायः ६७५ स्वयं च लभितं कालमेवं कुर्याद्व्रतोत्तमम् । सितसर्ववर्णैस्तं वत उद्यापयेत्सुधीः ॥२७॥ मंडलं सर्वतोभद्रं भव्यवर्णैः प्रकल्प्य च । सुशोभने न्यसेत्तत्र कलशं ताम्रजं शुने ॥२८॥ तस्योपरि न्यसेद्धेमानंतप्रतिमां शुभाम् । पीतपट्टांशुकाच्छन्नां तत्र तां विधिना यजेत् ॥२९॥ गणेशं मातृकाः खेटॉल्लोकपांश्च यजेत्पृथक् । ततो होमं हविष्येण कृत्वा पूर्णाहुतिं चरेत् ॥३०॥ शय्यां सोपस्करां धेनुं प्रतिमां च द्विजोत्तम । प्रदद्याद्गुरवे भक्त्या द्विजान्यांश्चतुर्दश ॥३१॥ संयोज्य मिष्टपक्वान्नैर्दक्षिणाभिः प्रतोषयेत् । एवं यः कुरुतेऽनंतव्रतं प्रत्यक्षमादरात् ॥३२॥ सोऽप्यनंतप्रसादेन जायते भुक्तिमुक्तिभाक् । कदलीव्रतमन्यत तद्विधानं च मे शृणु ॥३३॥ नरो वा यदि वा नारी रंभापुपवनस्थिताम् । स्नात्वा संपूजयेद्गंधपुष्पधान्यांकुरादिभिः ॥३४॥ दधिदूर्वाक्षतैर्दीपैर्वस्त्रपक्वान्नसंशयैः । एवं संपूज्य मंत्रेण ततः संप्रार्थयेद्व्रती ॥३५॥ अप्सरोरूपकल्याणिगोविन्दानननिर्गते । शरीरारोग्यलावण्यं देहि देवि नमोऽस्तु ते ॥३६॥ इति संप्रार्थ्य कन्यास्तु चतस्रो वा सुवासिनीः । संभोज्यांशुकसिंदूरकज्जलक्तकचर्चिताः ॥३७॥ नमस्कृत्य निजं गेहं संनाय्य नियमं व्रजेत् । एवं कृते व्रते विप्र लब्ध्वा सौभाग्यमुत्तमम् ॥३८॥ इह लोके विमानेन स्वर्गलोके व्रजेत्परम् । इषकृष्णचतुर्दश्यां विषशस्त्रांबुवह्निभिः ॥३९॥ सर्पश्वापदवज्राद्यैर्हतानां ब्रह्मघातिनाम् । चतुर्दशी क्रियाश्राद्धमेकोद्दिष्टविधानतः ॥४०॥ कर्तव्यं विप्रवर्या च भोजयेन्मिष्टपक्व कैः । तर्पणं च गवां ग्रासं बलिं चैव श्वकाकयोः ॥४१॥ कृत्वाऽचम्य स्वयं पश्चाद्भूञ्जीयाद्वंधुभिः सह । एवं यः कुरुते विप्र श्राद्धं संपन्नदक्षिणम् ॥४२॥ स उद्धृत्य पितृन्गच्छेद्देवलोकं सनातनम् । इषशुक्लचतुर्दश्यां धर्मराजं द्विजोत्तम ॥४३॥ इस उत्तम व्रत को करके उद्यापन करे। मुने ! घूपवर्णों से मनोहर सर्वतोभद्रमंडल बनाकर उसके ऊपर तांबे का कलश रखे। उसके ऊपर सुवर्ण की पवित्र अनंतप्रतिमा रखकर उसे पीले रेशमी-वस्त्र से आच्छा- दित कर विधिवूर्वक अर्चना करे। यजमान गणेश, सूर्यादि पंचदेवता तथा लोकपालों का पृथक्-पृथक् पूजन करे। तदनन्तर हविष्यान्न से हवन कर पूर्णाहुति दे। द्विजवर्य ! तोपकरण शय्या, धेनु एवम् प्रतिमा गुरु को भक्तिपूर्वक समर्पित कर अन्य चौदह ब्राह्मणों को मिष्टान्न खिला कर दक्षिणा से संतुष्ट करे ॥२३-३१॥ इस प्रकार जो प्रत्यक्ष अनंतव्रत को आदरपूर्वक करता है, उसे अनंत की कृपा से भुक्ति-मुक्ति की प्राप्ति होती है। उस दिन कदलीव्रत भी किया जाता है, उसका विधान सुनो। नर या नारी स्नान कर गंध, पुष्प, धान्य के अंकुर, दधि, दूर्वा, अक्षत, दीप, वस्त्र तथा पक्वानों से उद्यान-स्थित कदलीवृक्ष का पूजन करके "अप्सरा..." इस मंत्र से प्रार्थना करे। तदनन्तर चार कुमारिकाओं या सधवाओं को खिलाकर अगर, सिंदूर, काजल तथा अलता से विभू- षित करे। फिर उन्हें प्रणाम करके व्रत समाप्त करे ॥३२-३७॥ विप्र ! इस प्रकार व्रत करने वाला व्यक्ति इस लोक में उत्तम सौभाग्य को प्राप्त कर विमान से स्वर्ग- लोक को जाता है। आश्विन-कृष्ण-चतुर्दशी में विधिपूर्वक गयाश्राद्ध तथा एकोद्दिष्ट करने से उन जीवों का भी उद्धार हो जाता है, जो विष, शस्त्र, जल, अग्नि, सर्प, व्याघ्र, वज्र आदि से निहत हुए हों या ब्रह्मघाती हों। उस दिन ब्राह्मणों को मिष्टान्न खिलाकर गौ, कुत्ते एवम् कौए को बलि दे। उसके बाद आचमन करके बंधुओं के साथ स्वयं भोजन करे। विप्र ! इस प्रकार जो प्रचुर दक्षिणा देकर श्राद्ध करता है, वह पितरों का उद्धार करके सनातन देवलोक को जाता है ॥३८-४२॥ द्विजश्रेष्ठ आश्विन-शुक्ल-चतुर्दशी में गंध आदि उपचारों से धर्मराज

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