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भारतकोश
बृहन्नारदीय पुराण (संस्कृत मूल व हिन्दी व्याख्या)

बृहन्नारदीय पुराण (संस्कृत मूल व हिन्दी व्याख्या)

Brihan Naradiya Purana with Sanskrit & Hindi Commentary

महर्षि व्यास द्वारा

स्रोत: चौखम्बा संस्कृत संस्थान · चौखम्बा संस्कृत संस्थान (उद्गम)

DevanagariSanskritpublished1,008 पृष्ठ

पृष्ठ 995, कुल 1008 में से

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पृष्ठ 995

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६७३ नारदीयपुराणम् गन्धाद्यैः सम्यगभ्यर्च्य सौवर्णं भोज्य बाडवम् । दद्यात्सर्वं धर्मराजस्त्रायतां भुवि नारद ॥४४॥ एवं यः कुरुते धर्मप्रतिमादानमुत्तमम् । स भुक्त्वेह नरान्भोगांस्तद्वं राजाज्ञा व्रजेत् ॥४५॥ ऊर्जकृष्णचतुर्दश्यां तैलाभ्यङ्गं विलोक्य । कृत्वा स्नात्वाचंयेद्धर्मं नरकान्न भयं लभेत् ॥४६॥ प्रदोषे तैलदीपांस्तु दीपयेद्यमतुष्टये । अनुपथे गृहाद्वाह्याप्रदेशे वा समाहितः ॥४७॥ वत्सरे हेमलब्धाख्ये मासि श्रीमर्ति कार्तिके । शुक्लपक्षे चतुर्दश्यामरुणोदयमुदयं प्रति ॥४८॥ स्नात्वा विश्वेश्वरो देवो देवैः सह मुनीश्वर । मणिकर्णिकातीर्थे च त्रिपुंड्रं भस्मना दधत् ॥४९॥ स्वात्मानं स्वयमभ्यर्च्य चक्रे पाशुपतव्रतम् । ततस्तत्र महापूजां लिंगे गन्धादिभिश्चरेत् ॥५०॥ द्रोणपुष्पैर्बिल्वदलैरर्कपुष्पैश्च केतकैः । पुष्पैः फलैर्मिष्टपक्वैर्नैवेद्यैर्विविधैरपि ॥५१॥ एवं कृत्वैकभुक्तं तु व्रतं विश्वेशतोषगम् । लभते वांच्छितान्कामानिहामुत्र च नारद ॥५२॥ ब्रह्मकूर्चव्रतं चात्र कर्तव्यंतुद्विजिच्छता । सोपवासः पञ्चगव्यं पिबेद्रात्रौ जितेंद्रियः ॥५३॥ कपिलायास्तु गोमूत्रं कृष्णाया गोमयं तथा । श्वेतायाः क्षीरमुदितं रक्तायाश्च तथा दधि ॥५४॥ गृहीत्वा कर्बुरायाश्च घृतमेकत्र मेलयेत् । कुशांबुना ततः प्रातः स्नात्वा संतर्प्य देवताः ॥५५॥ ब्राह्मणांस्तोषयित्वा च सन्जीवाद्यान्ग्रतः स्वयम् । ब्रह्मकूर्चव्रतं ह्येतत्सर्वपातकनाशनम् ॥५६॥ यच्च बाल्ये कृतं पापं कौमारे याद्धकेऽपि यत् । ब्रह्मकूर्चोपवासेन तत्क्षणादेव नश्यति ॥५७॥ पाषाणव्रतमप्यत्र प्रोक्तं तच्छृणु नारद । सोपवासो दिवा नक्तं पाषाणाकारपिष्टकम् ॥५८॥ की स्वर्णमयी प्रतिमा का पूजन कर "धर्मराज मेरी रक्षा करे" यह कहते हुए विप्र को भोजन कराकर वह प्रतिमा दे दे । जो इस प्रकार प्रतिमादान संबन्धी उत्तम धर्म करता है, वह इस लोक में दिव्य भोगों को भोग कर अंत में धर्मराज की आज्ञा से स्वर्ग को जाता है ॥४४-४५॥ कार्तिक-कृष्ण-चतुर्दशी में चन्द्रोदय होने पर तेल लगा कर स्नान करने के उपरान्त धर्मराज की पूजा करने से नरक नहीं जाना पड़ता है । उस दिन प्रदोषकाल में समाहित होकर यम की प्रसन्नता के लिये घर के बाह्य-प्रदेश में तेल से दीपक जलाये । मुनीश्वर ! हेमलब्ध नामक वर्ष के शोभन कार्तिक मास के शुक्लपक्ष को चतुर्दशी में अरुणोदय के समय विश्वेश्वर देव ने देवताओं के साथ मणिकर्णिक तीर्थ में स्नान कर त्रिपुंड्र धारण करके पाशुपत व्रत करते हुए स्वयं अपनी पूजा की थी । इसलिये, उस दिन गंध आदि से तथा द्रोणपुष्प, बिल्वपत्र, अर्कपुष्प, केतकीपुष्प, मीठे एवम् सुपक्व फल और विविध नैवेद्यों से शिवलिंग की महापूजा कर एक भुक्त करते हुए विश्वेशतोषणव्रत को समाप्त करे । नारद ! जो इस व्रत को करता है, वह इस लोक में तथा परलोक में वांछित फलों को प्राप्त करता है ॥४६-५२॥ धन के इच्छुक व्यक्ति को उस दिन ब्रह्मकूर्चव्रत करना चाहिये । उपवास एवम् इन्द्रिय-संयम करते हुए रात्रि में पंचगव्य पीना चाहिये। केली गौ का मूत्र, काली गौ का गोबर, उजली गौ का दूध, लाल गौ का दही और चितकबरी गौ का घी एकत्रित कर देने से पंचगव्य बनता है । प्रातःकाल कुशोदक से स्नान कर देवतर्पण करे । फिर ब्राह्मणों को संतुष्ट कर स्वयं वाक्संयमपूर्वक भोजन करे । इस तरह ब्रह्मकूर्चव्रत करने से सकल पातकों का नाश होता है । बाल्यावस्था, कौमार-अवस्था और वृद्धावस्था में जो पाप किये गये हों, वे ब्रह्मकूर्चव्रत करने से तत्क्षण नष्ट हो जाते हैं । नारद ! उस दिन पाषाणव्रत भी किया जाता है, उसके बारे में सुनो । दिन में उपवास कर रात्रि में गंध आदि से गौरी की पूजा कर घी में पकायी हुई पाषाण के आकार की पिट्ठी उनको भोग लगाये । द्विजवर्य ! इस व्रत के यथोक्तरीति से करने से