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भारतकोश
बृहन्नारदीय पुराण (संस्कृत मूल व हिन्दी व्याख्या)

बृहन्नारदीय पुराण (संस्कृत मूल व हिन्दी व्याख्या)

Brihan Naradiya Purana with Sanskrit & Hindi Commentary

महर्षि व्यास द्वारा

स्रोत: चौखम्बा संस्कृत संस्थान · चौखम्बा संस्कृत संस्थान (उद्गम)

DevanagariSanskritpublished1,008 पृष्ठ

पृष्ठ 996, कुल 1008 में से

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पृष्ठ 996

षड्विंशत्यधिकशततमोऽध्यायः ६७७ प्राश्यं गन्धादिभिर्गौरीं घृतपद्ममुपाहरेत् । व्रतमेतच्चरित्वा तु यथोक्तं द्विजसत्तम ॥५९॥ ऐश्वर्यसौख्य सौभाग्य रूपञ्चापि प्राप्नुयान्नरः । मार्गशुक्लचतुर्दश्यामथैकभुक्तः पुरोदितम् ॥६०॥ निराहारो वृषं स्वर्णं प्रार्च्य दद्याद्द्विजातये । परेऽह्नि प्रातस्त्थाय स्नात्वा सोमं महेश्वरम् ॥६१॥ पूजयेत्कमलैः पुष्पैर्गन्धमाल्यानुलेपनैः । द्विजात्सम्भोज्य मिष्टान्नंस्तोषयेद्दक्षिणादिभिः ॥६२॥ एतच्छिवव्रतं विप्र भुक्तिमुक्तिप्रसाधकम् । कर्तॄणाञ्चप्रवक्तॄणां श्रोतॄणामनुमोदिनाम् ॥६३॥ पौषशुक्लचतुर्दश्यां विरूपाक्षव्रतं स्मृतम् । कपर्दीश्वरसान्निध्यं प्राप्स्याम्यद्य विचिन्त्य च ॥६४॥ स्नात्वागाधजले विप्र विरूपाक्षं शिवं यजेत् । गन्धमाल्यनमस्कारधूपदीपान्नसम्पदा ॥६५॥ तत्सर्वं द्विजातये दत्त्वा मोदते दिवि देववत् । माघकृष्णचतुर्दश्यां यमतर्पणमीरितम् ॥६६॥ अनर्काभ्युदिते काले स्नात्वा संतर्पयेद्यमम् । द्विसप्तनामभिः प्रोक्तैः सर्वपापविमुक्तये ॥६७॥ तिलदर्भांबुभिः कार्यं तर्पणं द्विजभोजनम् । कृशराणां स्वयं चापि तदेवाश्नीत् वाग्यतः ॥६८॥ अन्त्यकृष्णचतुर्दश्यां शिवरात्रिव्रतं द्विज । निर्जलं समुपोष्यथ दिवानक्तं प्रपूजयेत् ॥६९॥ स्वयंभू वादिकं लिंगं पार्थिवं वा समाहितः । गंधाद्यैरुपचारैश्च सांबुबिल्वदलादिभिः ॥७०॥ धूपैर्दीपैश्च नैवेद्यैः स्तोत्रपाठैर्जपादिभिः । ततः परेऽह्नि संपूज्य पुनरेवोपचारकैः ॥७१॥ संभोज्य विप्रान्मिष्टान्नैर्विसृजेल्लभतेऽखिलान् । एवं कृत्वा व्रतं मर्त्यो महादेवप्रसादतः ॥७२॥ अमर्त्यभोगान् लभते दैवतैः सुसभाजितः । अन्त्यशुक्लचतुर्दश्यां दुर्गां संपूज्य भक्तितः ॥७३॥ गन्धाद्यैरुपचारैस्तु विप्रान्संभोजयेत्ततः । एवं कृत्वा व्रतं विप्र दुर्गायाश्चैकभोजनः ॥७४॥ मनुष्य को ऐश्वर्य, सुख, सौभाग्य तथा रूप की प्राप्ति होती है ॥५२-५९१/२॥ अगहन-शुक्ल-चतुर्दशी में एकभुक्त या उपवास करते हुए सोने के वृष की पूजा कर विप्र को दे दे । दूसरे दिन प्रातःकाल उठकर स्नानोपरान्त कमलपुष्प, गंध, माला तथा लेप से उमा और महेश्वर की अर्चना कर द्विजों को मिष्टान्न खिलाकर दक्षिणा आदि से संतुष्ट करे । विप्र ! यह शिवव्रत कर्ता, उपदेष्टा, श्रोता तथा अनुमन्ता को भोग-मोक्ष देता है ॥६०-६३॥ पौष-शुक्ल-चतुर्दशी में विरूपाक्षव्रत किया जाता है । उस दिन “मैं शिव के समीप जाऊँगा” ऐसी चिन्ता करते हुए अगाध जल में स्नान करे । तदुपरान्त गंध, माला, नमस्कार, धूप, दीप, अन्न आदि वस्तुओं से विरूपाक्ष शंकर की अर्चना करे । फिर सब सामग्रियां द्विज को अर्पित कर दे । ऐसा करने वाला व्यक्ति स्वर्ग में देवता की तरह विहार करता है ॥६४-६५१/२॥ माघ-कृष्ण-चतुर्दशी में यमतर्पण किया जाता है । उस दिन सूर्योदय होने से पहले ही स्नान करके अखिल पापों के नाश के लिये चौदह नामों से यम का तर्पण करे । तर्पण तिल, जल, कुश से करना चाहिये । अनन्तर ब्राह्मण को खिचड़ी खिलाये और स्वयं भी मौन होकर वही खाये । द्विज ! फाल्गुन-कृष्ण-चतुर्दशी में शिवरात्रिव्रत करना चाहिये । दिन में निर्जल उपवास कर रात्रि में गंध आदि उपचारों से तथा जल, विल्वपत्र, धूप, दीप, नैवेद्य, स्तुतिपाठ एवम् जप आदि से स्वयंभू शिवलिंग या पार्थिव लिंग की पूजा करे । दूसरे दिन पुनः उपचारपूर्वक शंकर का पूजन कर ब्राह्मणों को मिष्टान्न खिलाकर दक्षिणा दे विदा करे । इस प्रकार व्रत करने वाला मानव महादेव की कृपा से देवताओं के साथ दिव्य भोगों को भोगता है ॥६६-७२१/२॥ फाल्गुन-शुक्ल-चतुर्दशी में भक्तिपूर्वक गंध आदि उपचारों से दुर्गा की पूजा कर ब्राह्मणों को भी भोजन कराये । नारद ! इस प्रकार एकभुक्त करके जो दुर्गा का व्रत करता है, वह इस लोक में तथा १२३ ना० पु०

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